साहित्य की दुनिया 2020
हर साल की तरह इस बार भी जनवरी में जब दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले की शुरुआत हुई तो लगा जैसे 2020 साहित्य और लेखन के क्षेत्र में कुछ नए बदलाव लाएगा। लोगों में किताबें पढ़ने की ललक भी बढ़ेगी और साहित्यिक चर्चाओं और बहसों का सिलसिला और तेज होगा। कुछ हद तक ऐसा हुआ भी। कम से कम पुस्तक मेले के दौरान सौ से ज्यादा नई किताबों का विमोचन हुआ, चर्चाएं ह
स्वागत कीजिए 2021 का...क्या खोया, क्या पाया... जीवन शैली, सोच और रचनात्मकता के नए तौर तरीके‘ज़िंदगी और मौत तो ऊपर वाले के हाथ में है जहांपनाह, हमसब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिनकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है... कब, कौन, कैसे उठेगा कोई नहीं जानता...
आज जिस इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के सदस्य सचिव के तौर पर डॉ सच्चिदानंद जोशी के कंधे पर संस्कृति के इस विशाल केन्द्र की जिम्मेदारी है, वह केन्द्र अगर बना तो उसके पीछे कपिला वात्स्यायन की दूरदृष्टि थी। कपिला जी इसके संस्थापकों में रहीं और जोशी जी उनकी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। जोशी जी ने जो बेहतरीन काम किया वो ये कि उन्होंने कपिला जी को पूरा सम्मा
इस कोरोना काल ने बहुतों को हमसे छीना है। कुछ तो उम्र के उस पड़ाव पर थे, तो कुछ असमय ही अलविदा कह गए। देश में सांस्कृतिक चेतना और इसके विस्तार के क्षेत्र में अद्भुत योगदान देने वाली कपिला वात्यायन भी आखिरकार चली गईं।
कपिला जी बे
जाने माने पत्रकार और दिनमान के शुरुआती दिनों से ही अज्ञेय, रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जैसे साहित्यकारों के साथ काम करने वाले त्रिलोक दीप आज भी जब उन दिनों की याद करते हैं तो मानो वो सारी तस्वीरें सजीव हो जाती हैं। त्रिलोक जी ने 7 रंग से फोन पर अपने अनुभव साझा किए जिसे हम उनकी आवाज़ में पेश कर रहे हैं... साथ ही उन्होंने अपने फेसबुक पर उन दिनों के बारे में और
जाने माने रंगकर्मी और अपने दौर के जबरदस्त नाटककार हबीब तनवीर पर बहुत कुछ लिखा जाता रहा है... उनके नाटकों पर, उनके व्यक्तित्व पर और कभी समझौता न करने वाले उनके मिजाज़ पर। उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि पर उन्हें रंगकर्मी अपने अपने तरीके से याद करते हैं... कोई उनके तमाम नाटकों की बात करता है, कोई उनके सामाजिक सरोकार को याद करता है तो कोई नाटकों के प्रति उनके समर्पण के बारे में ब
देख तमाशा दुनिया का....आलोक यात्री की कलम से
"अकल बड़ी या भैंस?" यह जुमला आपने भी अक्सर सुना होगा। दुनिया के तमाम सियाने आज तक इस सवाल का जवाब नहीं तलाश पाए। आए दिन हमारे सामने कई ऐसे मसले आते हैं जो अटकल लगाने पर मजबूर कर देते हैं कि अकल बड़ी या भैंस? अब ताजा म
आज भी बहुत प्रासंगिक हैं आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी....उनकी रचनाओं में सांस्कृतिक-साहित्यिक अभिव्यक्तियों के तमाम आयाम हैं...-- प्रेरणा मिश्रारजनी–दिन नित्य चला ही किया मैं अनंत की गोद में खेला हुआ