चूंचूं अंकल इनदिनों गुमसुम हैं। मन बहुत उद्गिन और व्यथित है। उनकी पीड़ा देखकर मैं भी द्रवित हो गया सो पूछ लिया- अंकल, आप इतने दुखी क्यों हैं? बार-बार पूछने पर उनकी आंखें भर आईं। वे बस इतना ही बोल पाए-मंदिर…चढ़ावा…। मुझे उनका दर्द समझते देर नहीं लगी कि अंकल का मन अयोध्या में लगा है। जब से चढ़ावा चोरी का मामला रोशनी में आया है, उन्हें अंधेरा नजर आ रहा है। उनकी आस्था, श्रद्धा और विश्वास खूनखच्चर हैं। वे बीच-बीच में हे राम, हे राम रटने लगते हैं। अनिल त्रिवेदी का ताज़ा व्यंग्य -
Read More