चाय की दुकान पर चर्चा छिड़ी है। बहस के लिए रोज कोई न कोई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दा मिल ही जाता है। गांव से लेकर दिल्ली की राजनीति तक और गली-मुहल्ले के कुत्तों से लेकर ट्रंप तक। कुछ नहीं तो मौसम तो है ही बहस का शाश्वत विषय। नीट का मामला तो कुछ हद तक नीट एंड क्लीन हो गया है इसलिए आज की बहस का विषय है-गालियां। इनदिनों गालियां एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा है। इनकी गालियां-उनकी गालियां, गंदी गालियां-अच्छी गालियां। अत: इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर तो चर्चा होनी ही चाहिए। बहस चल रही है। वे उन्हें गालियां दे रहे थे, यह ठीक नहीं था। क्यों ठीक नहीं था, भाई कोई गालियां क्यों नहीं दे सकता? विरोध करने की स्वतंत्रता है या नहीं? कोई गालियां खाने के लायक हो तो भी गालियां न दी जाएं, यह कौन सी बात हुई। अरे, गालियां देना ही है तो दीजिए मगर गालियों की भी कुछ मर्यादा होती है। देखा नहीं, कितनी गंदी-गंदी गालियां थीं, छी। कौन सी गाली गंदी थी, क्या ये गालियां पहली बार दी गई थीं? गालियां तो ऐसी ही होती हैं। न गंदी, न अच्छी। गालियां तो सिर्फ गालियां होती हैं। यह तो आप पर है, जो चाहें समझें।... अनिल त्रिवेदी का व्यंग्य
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