साहित्य की अनवरत यात्रा और समाज की रचनात्मक अभिव्यक्ति
♦ अतुल सिन्हा
जब भी आप जाने माने कथाकार, व्यंग्यकार और बेहद संवेदनशील लेखक से रा यात्री से मिलेंगे, आपको इस 88 बरस के नौजवान के भीतर अपार रचनात्मक ऊर्जा मिलेगी... सेहत बेशक साथ नहीं देती, ज्यादातर वक्त बिस्तर पर गुज़रता है और कुछ बीमारियों ने उन्हें बरसों से जकड़ रखा है, लेकिन जब यात्री जी अपनी रौ में
♦ रवीन्द्र त्रिपाठी
इस कोरोना समय में समाज के जिन वर्गों को और भी अधिक सीमांत की तरफ धकेला है उसमें कलाकार भी हैं। हर विधा के कलाकार- चाहे वे रंगकर्मी हों, पेंटर हों, मूर्तिशिल्पी हों, गायक हों, वादक हों, नर्तक या नृत्यांगना हों। या लोक कलाकार हों। फिल्मों
अतीत का आईनावरिष्ठ पत्रकार के. विक्रम राव की कलम से
एक दौर था जब “संपादक के नाम पत्र” का महत्व समाचार पत्रों में अग्रलेखों के ठीक बाद हुआ करता था| चर्चित पत्र अंतिम होता, तो श्रेष्ट पत्र पर पारितोष की परम्परा भी थी| ज़मान
अकबर के दरबार में रहीम मीर अर्ज थे। वही अब्दुर रहीम खानखाना जो हिंदी साहित्य में अपने नीति दोहों की वजह से बड़ा ही सम्मानजनक स्थान रखते हैं। इन रहीम के सेवक थे फ़हीम खान। फ़हीम खान बहुत चर्चित नहीं हैं मगर एक वज
देख तमाशा दुनिया का...आलोक यात्री की कलम से
मैं छोटा सा रहा होउंगा। यही कोई पांच सात बरस का। गर्मी की एक दोपहर पिताश्री और मोटा ताऊ जी (पिताश्री के कॉलेज के सहयोगी श्री एम.डी.शर्मा जी) के साथ पहली बार किसी गांव के रोमांचक सफर पर निकलने का अवसर मिला था। इससे
‘नेपाल आता हूं, तो लगता है घर में बांसुरी बजा रहा हूं’
82 साल के हो गए बांसुरी के पर्याय बन चुके पंडित हरिप्रसाद चौरसिया
अतुल सिन्हा
अभी एक साल भी नहीं बीता है... भारत के 73वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मशहूर बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया कांठमांडू गए तो उनका वहां के तमाम युवा कलाकारों न
अतीत का आईनात्रिलोक दीप की कलम से
1969 में पहली बार लद्दाख गया था फौजियों के साथ। रास्ते में मुझे दो जानकारियां ऐसी मिलीं जो उस समय मेरे लिए नई थीं। एक, द्रास दुनिया का दूसरा सबसे ठंडा स्थान है और दूसरी लद्दाख में एक ऐसा यूरोपीय
जब अतीत में झांकते हैं जाने माने पत्रकार त्रिलोक दीप….
एक वक्त था जब ‘दिनमान’ को रघुवीर सहाय के साथ साथ त्रिलोक दीप के नाम से भी पहचाना जाता था। सत्तर का दशक था और दिनमान तब की सबसे बेहतरीन, गंभीर और सामयिक समाचार साप्ताहिक पत्रिका हुआ करती थी। टाइम्स ग्रुप की हिन्दी पत्रिकाओं में तब धर्मयुग, दिनमान, सारिका. माधु