वैचारिक विभाजन की डिजिटल रचनात्मकता का साल

साहित्य की दुनिया 2020

हर साल की तरह इस बार भी जनवरी में जब दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले की शुरुआत हुई तो लगा जैसे 2020 साहित्य और लेखन के क्षेत्र में कुछ नए बदलाव लाएगा। लोगों में किताबें पढ़ने की ललक भी बढ़ेगी और साहित्यिक चर्चाओं और बहसों का सिलसिला और तेज होगा। कुछ हद तक ऐसा हुआ भी। कम से कम पुस्तक मेले के दौरान सौ से ज्यादा नई किताबों का विमोचन हुआ, चर्चाएं हुईं। 9 फरवरी तक कोलकाता पुस्तक मेले तक भी सबकुछ ठीक ठाक रहा। कोलकाता पुस्तक मेले में ममता बनर्जी की किताब नागरिकत्तो आतंको (नागरिकता का डर) बेस्ट सेलर साबित हुई और इस दौरान नागरिकता संशोधन कानून के पक्ष और विपक्ष में लिखी किताबों की खूब मांग रही।

फरवरी में हुए साहित्योत्सव और साहित्य अकादमी पुरस्कार समारोह और वहां मुख्य अतिथि कवि-गीतकार गुलज़ार के आने तक साहित्यिक हलचलें अपनी उम्मीदों और संभावनाओं के साथ बरकरार रहीं। गुलज़ार का इशारों इशारों में ये कहना कि ‘दिल्ली से आने वालों से डर लगता है’ खासी चर्चा में रहा। खासकर सीएए और एनआरसी के खिलाफ शाहीन बाग के आंदोलन के संदर्भ में देखे गए इस बयान के कई मायने निकाले गए। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप सपरिवार भारत घूमने आए और दिल्ली में भयानक दंगे हुए। इन सबका असर हमारे साहित्य जगत में साफ दिखा।

शाहीन बाग के आंदोलन ने साहित्यकारों और लेखकों की खेमेबाजी और बढ़ाई और 2020 के साहित्य सृजन में शाहीन बाग तमाम कवियों, लेखकों के लिए एक टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। जिन अन्य घटनाओं का साल के शुरुआती महीनों में साहित्य जगत पर खास असर दिखा वो थे कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना, जम्मू कश्मीर को दो हिस्सों में बांटना और वहां के नेताओं को कई महीनों तक नजरबंद करना, सीएए और एनआरसी कानून जैसे तमाम फैसलों के साथ ही अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी। एक के बाद एक धुआंधार फैसलों के बीच सत्ता समर्थक और विरोधी लेखक-साहित्यकार पूरी तरह विभाजित दिखाई देने लगे। रचनाकर्म में हिटलर से लेकर मुसोलिनी तक और दुनिया के तमाम तानाशाह प्रतीक रूपों में जीवंत हो उठे।

कोरोना के शुरुआती आतंक से भरा मार्च का महीना और 22 मार्च को प्रधानमंत्री के जनता कर्फ्यू और 24 मार्च से लॉकडाउन के ऐलान ने तो मानो सबकुछ बदल डाला। रातोंरात देश अपने अपने घरों में सिमट गया और फिर शुरु हुआ लाखों किसानों-मजदूरों की पैदल घर वापसी और इससे जुड़ी सियासत का महीनों तक चलने वाला सिलसिला। किसान मजदूरों के दर्द को और सरकार के रवैये पर लेखकों और साहित्यकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी जबरदस्त अभिव्यक्ति दी।

‘आपदा में अवसर’ के नारे, ‘कोरोनावीरों’ के लिए ताली थाली बजाने से लेकर, दिवाली मनाने और आसमान से फूल बरसाने तक के ‘इवेंट’ ने भी रचनाकारों के लिए लेखन के नए विषय उपलब्ध कराए। किसी ने इसे बहुत ही सुनियोजित तरीके से रचा गया अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र बताया तो किसी ने इसे तमाम ज़रूरी सवालों से भागने और लोगों के भीतर भय और आशंकाओं से भरकर एक दूसरे से दूर करने की सोची समझी साजिश करार दिया। कविताओं, कहानियों और गोष्ठियों में कोरोना और इसके टीके को लेकर किए जा रहे खरबों रुपए के खेल और दुनिया को आर्थिक मंदी में झोंककर, लोगों को सड़कों पर लाने, विरोध की आवाजों को दबाने की कोशिश भी करार दिया गया।

लेकिन विरोध की इन तमाम रचनात्मक अभिव्यक्तियों के बावजूद हर कोई अपने भीतर की आशंकाओं और कोरोना के खौफ से खुद को नहीं बचा पाया और घरों में सिमटने को मजबूर कर दिया गया। हताशा और निराशा का मारक दौर भी दिखा और कमजोर दिल दिमाग वाले बहुत से लोग इसके शिकार भी हुए। हालत ये हो गई कि जो तमाम रचनाकार इस काल को बड़े पूंजीवादी देशों, बड़े औद्योगिक घरानों और खुद को दुनिया का महानतम नेता साबित करने वालों की मिलीभगत और साजिश करार देते थे, वह भी बाद के दिनों में खुलकर इस बारे में बोलने से बचने लगे। जो कोरोना कागजी और आंकड़ों की बाजीगरी दिखता था, वह जब आसपास के तमाम लोगों और परिजनों तक पहुंचने लगा तो लिखने वाले भी बच बचकर कलम चलाने लगे।

फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब और सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म रचनाकारों के सबसे असरदार मंच साबित हुए। कोरोना काल जैसा ऐतिहासिक वक्त हर कोई अपने अपने अनुभवों के आधार पर किसी न किसी रूप में दर्ज़ कर लेना चाहता था। लॉकडाउन के दौरान शुरुआत के कुछ दिनों की निराशा-हताशा और डर को छोड़कर फिर जो सोशल मीडिया साहित्य का दौर शुरु हुआ, वर्चुअल संवाद, वेबिनार और लाइव का सिलसिला शुरु हुआ, वह दिसंबर आते आते हरेक के जीवन का हिस्सा बन गया। इस मायने में कोरोना काल इतिहास में दर्ज किया जाएगा कि कैसे एक झटके में इसने सबको डिजिटल बना दिया और फासलों के बावजूद इस ‘काल’ ने आभासी दुनिया में सबको एक दूसरे के पास पहुंचा दिया। इस दौरान राजकमल प्रकाशन जैसे तमाम जाने माने प्रकाशकों ने व्हाट्सएप ग्रुप के जरिये रोजाना बेहतरीन साहित्य लोगों तक मुफ्त पहुंचाना शुरु किया। तमाम पत्र-पत्रिकाएं डिजिटल फॉर्मेट में आ गईं। फेसबुक पर दिनभर लाइव गोष्ठियां होने लगीं। जो साहित्यिक आयोजन सभागारों में होते थे और लोगों को जुटाना मुश्किल होता था, वह अब रोजाना कोई न कोई कार्यक्रम आपको घर बैठे उपलब्ध कराने लगे। समकालीन जनमत, जन संस्कृति मंच, इप्टा, टी विद अरविंद कुमार, 7 रंग, लिखावट, कवि विमल कुमार, हंस, लमही, पाखी जैसे तमाम डिजिटल मंचों पर लॉकडाउन के दौरान लगातार बेहतर साहित्य और साहित्यिक गतिविधियों को जीवंत रखने की कोशिशें जारी रहीं। इस दौरान गिरिराज किशोर, राहत इंदौरी, कृष्ण बलदेव वैद्य, उषा गांगुली, सौमित्र चटर्जी, विष्णुचंद्र शर्मा, कपिला वात्स्यायन, मृदुला सिन्हा और मंगलेश डबराल जैसी शख्सियतों के गुज़रने की दुखद खबरें भी आती रहीं, लेकिन डिजिटल मंचों पर इन रचनाकारों के योगदान को याद करने और इनकी प्रासंगिकता और लेखन पर चर्चाएं भी चलती रहीं।

इसी साल गीतकार, लेखक, फिल्मकार, कवि और बेहद संजीदे गुलजार साहब पर राधाकृष्ण प्रकाशन ने एक बेहतरीन किताब छापी – बोस्कीयाना। जाने माने लेखक-पत्रकार यशवंत व्यास ने बहुत ही खूबसूरती से गुलजार साहब के साथ अंतरंग बात मुलाकात और उनके तमाम आयामों पर ये अद्भुत किताब कॉफी टेबलबुक की तर्ज पर पेश की है।

कोरोना काल में तमाम पत्रकारों ने भी अपने अनुभवों के आधार पर साहित्य रचा। इस दौरान कई पुस्तकें भी आईं। हेमंत शर्मा की लॉकडाउन के चार महीनों में लिखी पुस्तक ‘एकदा भारतवर्षे’ में उन्होंने पौराणिक संदर्भों को आज से जोड़ते हुए छोटी छोटी 114 कहानियों में कुछ संदेश देने की कोशिश की है। या पत्रकार विजय विनीत का ‘बनारस लॉकडाउन’ जिसमें लॉकडाउन के दौरान बनारस की संस्कृति, कला, परंपरा, उद्योग और रहन सहन पर पड़ने वाले असर को करीब से देखा और खुद कोरोना का दर्द झेलने का अपना अनुभव बांटा। कोरोना काल में रची गई कविताओं में से कुछ चुनिंदा कविताओं का संग्रह कौशल किशोर के संपादन में आया – दर्द के काफिले। लेखक कार्टूनिस्ट राजकमल का उपन्यास ‘पोखर पार’ आया, सुभाष अखिल का उपन्यास – ‘नंगे शहर का सफ़रनामा’ ने भी चर्चा बटोरी। जो रचनाकार सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय रहे उनमें –विष्णु नागर, मैत्रेयी पुष्पा, चित्रा मुद्गल, अशोक वाजपेयी, रवींद्र त्रिपाठी, गीताश्री, धीरेन्द्र अस्थाना, आलोक यात्री जैसे तमाम नाम हैं जिन्होंने इस कोरोना काल में खुद को जीवंत रखा और साहित्य जगत में कोई ठहराव महसूस न होने दिया।

जाहिर है विश्व पुस्तक मेला से शुरु हुआ ये सफर साल के गुजरते गुजरते वर्चुअल दिल्ली पुस्तक मेले तक पहुंच गया जिसमें दुनिया भर के करीब ढाई लाख लोगों ने हिस्सा लिया और जिसमें करीब सौ प्रकाशकों की नौ हजार पुस्तकें प्रदर्शित की गईं। तमाम सरकारें और उनकी साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाएं और विभाग कोरोना काल के दौरान से ही डिजिटल हो गए और धुआंधार तरीके से हर महीने सैंकड़ों वर्चुअल कार्यक्रम करते रहे जिससे कोरोना काल में साहित्य, संस्कृति का एक नया स्वरूप उभर कर सामने आया। अब आप इसे पसंद करें या न करें, लेकिन इस दौर ने ये एक नई संस्कृति तो पैदा की ही है और बेशक 2020 इसके लिए याद किया जाएगा।

(‘दैनिक ट्रिब्यून’ में अतुल सिन्हा का आलेख)

Posted Date:

December 31, 2020

10:25 pm Tags: , , ,

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