‘महफ़िल-ए-बारादरी’: नारी की पीड़ा को मिली आवाज़
चंद लम्हात भी सदियों की सिफ़त रखते हैं, वक़्त के टुकड़े का वाज़िब है कहानी होना : गुलशन
किसी को देखूं मगर मुझको तू नज़र आए, अब अपने नूर से ऐसा भी दे जमाल मुझे : रेणु हुसैन
गाज़ियाबाद। सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल की नेहरू नगर शाखा में आयोजित ‘महफ़िल-ए-बारादरी’ में कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ. सीता सागर ने कहा कि “महफ़िल ए बारादरी” ने अदब की दुनिया में जल्द ही ऊंचा मुकाम हासिल कर लिया है। अपने मुक्तक एवं गीतों पर उन्होंने जमकर सराहना बटोरी। उन्होंने कहा “आईने पर नज़र नहीं रहती, फिक्र इधर कोई नहीं रहती, मेरी दीवानगी का आलम है, खुद को खुद की खबर नहीं रहती।” अगले मुक्तक में उन्होंने कहा “दोस्तों, दुश्मनों से रही बेखबर, न जाने कब ये सफ़र बन गया हमसफ़र, तिनके-तिनके से मैं नीड़ रचती रही, घर से निकली मगर मन से निकला नहीं घर।”
 कार्यक्रम की मुख्य अतिथि रेनू हुसैन ने फरमाया “कफ़स में नहीं होगा कभी मलाल मुझे, किसी के नाम से आता है ये खयाल मुझे,
किसी को देखूं मगर मुझको तू नज़र आए, अब अपने नूर से ऐसा भी दे जमाल मुझे, तुझे फलक में सितारों में मैं नजर आऊं, कोई तो लम्हा अता कर बेमिसाल मुझे, खड़ी हूं ख्वाब में तेरे आईना बन कर, कोई तो आए जो ख्वाबों से दे निकाल मुझे।” बारादरी के अध्यक्ष गोविंद गुलशन ने कहा “चंद लम्हात भी सदियों की सिफ़त रखते हैं, वक़्त के टुकड़े का वाज़िब है कहानी होना। कोई पूछे तो सही ठहरी हुई लहरों से, कितना दुश्वार है दरिया में रवानी होना। बेबसी क्या है पता चलता है उस वक्त, भूख एक तार पर चलती हुई रह जाती है।”
वरिष्ठ शायर सुरेंद्र सिंघल ने कहा “तेरे लबों पे खिले हैं जो फूल नकली हैं, तो इनका क्या करूं मुझ में यह मछलियां जो हैं। खुद अपने आप पर मुझको था ऐतबार बहुत, अब अपने आप से रहता हूं होशियार बहुत।” सरस्वती वंदना से कार्यक्रम की शुरूआत करने वाली संस्था की  संयोजक डॉ. माला कपूर ने कहा “कुछ बात करो, कुछ बात करो, बात से ही बात बन जाएगी, खोई हुई वो यादें, सोई हुई सी तमन्ना, फिर दहलीज खटखटाएंगी, कुछ बात करो।”
कार्यक्रम का संचालन उर्वशी अग्रवाल उर्वी ने किया। उन्होंने अपनी पंक्ति “शबनम की एक बूंद दहकते अंगारों से क्या लड़ती, एक अकेला जुगनू थी मैं अंधियारों से क्या लड़ती, एक अकेली मछली थी मैं, मछुआरों से क्या लड़ती” पर जमकर दाद बटोरी। मासूम गाजियाबादी ने कहा “गुर भी तैराकी के आने चाहिए वरना कैसे तूफा से लड़ेंगे खाली पतवारों से आप, हो गए मासूम बच्चे अब कमाई की मशीन, रोएंगे तन्हा लिपटकर घर की दीवारों से आप।” उत्कर्ष ग़ाफ़िल ने कहा “हर आस टूटना लाज़िम थी तेरे साए में, उम्मीद यूं भी फरेबों की कर्ज़दारी थी। पड़ी हुई थी ज़रा दूर जिस्म से बाहर, वो लाश रूह की जो ग़ालिबन हमारी थी।”
मनु लक्ष्मी मिश्रा ने कहा “कोई मेरे पांवों में मनुहारों की पायल बांध गया, बीती रात संकोचों की सीमा लांघ गया।” वी.के. शेखर ने अपने शेरों के माध्यम से कोरोनाकाल को रेखांकित किया। तरुणा मिश्रा ने कहा “देखिए रुक के ज़िंदगी के रंग, उसके चेहरे पर रोशनी के रंग, फूल हसरत से देखा करते हैं उसकी होठों की नाजुगी के रंग, जब्त से आता है ग़मों पे निखार, दर्द से बढ़ते हैं हंसी के रंग।” कीर्ति रतन ने कहा “आप से मिलना मेरा था अज़ब इक वाक़िया, आपने अच्छा किया जो मुझे ठुकरा दिया। उनको ये गफ़लत हुई, ढेर सी कह दीं ग़ज़ल, पर नहीं मिलता किसी में रदीफ़ो-काफ़िया।”
आलोक यात्री, डॉ. संजय शर्मा, सुभाष चंदर, रूपा राजपूत, अर्चना शर्मा, आशीष मित्तल ने भी अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम की अतिविशिष्ट अतिथि आकांक्षा सिंह ने कहा कि बारादरी जैसे कार्यक्रम गंगा जमुना संस्कृति का प्रतीक हैं। जो सौहार्द बढ़ाने का काम करते हैं। संयोजक डॉ. स्मिता सिंह ने कहा कि बारादरी में आकर हम जिंदगी की हकीकत से अवगत होते हैं। ऐसे कार्यक्रम अवसादों को मिटाने के साथ-साथ लोगों में नई ऊर्जा का संचार करते हैं। इस अवसर पर मकरंद प्रताप सिंह, देवेंद्र गर्ग, रविंद्र कांत त्यागी, वागीश शर्मा, श्वेता त्यागी, सोनम यादव, अशहर अब्राहिम, सुशील शर्मा, साजिद खान, कुलदीप, दीपा वर्मा, वैभव शर्मा, तिलक राज अरोड़ा,  कविता अरोड़ा, अजय वर्मा व धर्मपाल समेत बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद थे।
Posted Date:

March 15, 2021

5:53 pm

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