(एक बेहद जीवंत और उम्मीदों से भरे कवि-गीतकार कुंअर बेचैन का जाना आहत करने वाली ख़बर है... गाज़ियाबाद में अमर उजाला का संपादक रहते हुए मैं डॉ बेचैन के करीब आया... उनसे मुलाक
जो धर्म भाई को बेगाना बनाता है, ऐसे धर्म को धिक्कार!
आखिर राहुल सांकृत्यायन में ऐसा क्या है जो उन्हें बार बार पढ़ने और याद करने की ज़रूरत महसूस होती है? आखिर मौजूदा दौर में राहुल सांकृत्यायन क्यों ज़रूरी हैं? क्यों उनकी किताब 'वोल्गा से गंगा' का ज़िक्र हमेशा आता है और क्यों एक ब्राह्मण होने के बाद भी उन्होंने ब्राह्मणवाद और ढकोसलों का खुलकर विरोध किया? उनके तार्किक विश्लेषणों और समाज को देखने के उनके नज़रिये ने कैसे ए
वो पाकीज़ा की साहिबजान थीं... वो साहिब बीवी और गुलाम की छोटी बहू थीं...वो बैजू की गौरी थीं.. दो बीघा ज़मीन की ठकुराइन थीं...परिणीता की ललिता थीं...और सबसे बड़ी उनकी पहचान थी ट्रेजेडी क्वीन की... लेकिन असल में वो महज़बीं बानो थीं...एक बेहतरीन शायरा...एक तड़पती हुई बेचैन अदाकारा...बह
सागर सरहदी का जाना एक ऐसे तरक्कीपसंद शख्स का जाना है जिसकी झोली में सिलसिला, कभी कभी और चांदनी भी है तो बाज़ार और चौसर भी... सागर सरहदी में यश चोपड़ा की ज़रूरतों के मुताबिक ढलने की कला भी है तो वक्त के साथ देश और समाज को बारीकी से देखने का अपना नज़रिया भी... सरहदी साहब बीमार चल रहे थे... 88 साल के हो चुके थे... लेकिन अब भी बेहद संज़ीदे तरीके से वक्त को देखते समझते थे। '7 रंग' के लिए सा
रेणु पर केन्द्रित 10 पत्रिकाओं का विमोचन, फिल्म का प्रदर्शनबिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली समेत कई जगहों पर हुए रेणु जन्मशती पर कई कार्यक्रम
नई दिल्ली। आंचलिक साहित्य को मुख्य धारा में स्थापित कर देने वाले कालजयी कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु की जन्मशती पर बंद हॉल में आयोजित महत्वपूर्ण कार्यक्रम को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी क
‘मैं भी उठूं, तुम भी उठो, चलो दीवार में इक खिड़की खोलें’
गाजियाबाद में साहित्य की एक स्वस्थ और समृद्ध परंपरा रही है और इसे आज के दौर में जीवंत रखने का अद्भुत काम कर रहा है मीडिया 360 लिट्ररी फाउंडेशन। कोरोना काल के दौरान करीब एक साल तक बंद पड़ी गतिविधियों के बाद जब इस संस्था ने 7 फरवरी को गाजियाबाद में कथा संवाद को फिर से शुरु किया तो मानो हर किसी के भीतर का साहित्यकार और साहित्य के प्रति उसकी जायज चिंता फिर से जाग उठी। बड़ी संख्
भारतीय रंगमंच के वरिष्ठ निर्देशक बंसी कौल का हिन्दी रंगमंच में अविस्मरणीय और महत्वपूर्ण योगदान है। पिछले कुछ समय से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था, वह कैंसर से जुझ रहे थे, पर उनकी जिजीविषा और जिंदादिली अद्भुत थी। सबको उम्मीद थी कि वह इस स्थिति से उबर कर दोबारा सक्रिय हो जाएंगे। प
बंसी कौल का यूं चले जाना रंगमंच की दुनिया के लिए एक गहरे सदमे की तरह है। अस्मिता थिएटर ग्रुप के संस्थापक और जाने माने रंगकर्मी अरविंद गौड़ ने बंसी कौल को कुछ इस तरह याद किया....
2020 ने जिस तरह कलाकारों समेत पूरी दुनिया को घरों में कैद कर दिया और खासकर कला और कलाकारों के लिए अभिव्यक्ति के रास्ते बंद हो गए, उससे तमाम कला संस्थान, कला अकादमियां और संग्रहालयों बुरी तरह प्रभावित हुए। नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट (एनजीएमए), ललित कला अकादमी और कला संग्रहालयों ने खु