60 मास्टर कलाकारों की प्रदर्शनी
भारत में आधुनिकता का जन्म कैसे हुआ, इसको लेकर पहले यह अवधारणा रही कि यह आधुनिकता पश्चिम से आयातित है यानी जब भारत का संपर्क पश्चिमी देशों से हुआ और वहां से ज्ञान विज्ञान की शाखाएं भारत में फैली तो यहां आधुन
ब्रिक्स थिएटर फेस्टिवल से नौ देशों के बीच सांस्कृतिक रिश्ते और मजबूत
सरदार पटेल के जीवन पर आधारित नाटक “लौह पुरूष” के मंचन के साथ ही 2026 का ब्रिक्स थिएटर फेस्टिवल खत्म हो गया। ‘साझा कहानियां, साझा भविष्य’ की थीम पर आयोजित इस तीन दिवसीय महोत्सव में ब्रिक्स के नौ सदस्य और साझेदार देशों के कलाकारों, रंगकर्मियों और थिएटर संस्थानों ने हिस्सा लिया। संस्कृत
पिछले दिनों राजधानी में एक ऐसी शाम बीती जो हिंदुस्तानी संगीत की एक तपस्विनी के नाम रही जिसने संगीत के तीन घराने की गायकी की और वह एक जीता जागता इतिहास बन चुकी हैं। 23 दिसम्बर 1927 को राजस्थान में जन्मी शन्नो खुराना ने लाहौर रेडियो से 25 रुपए के पारिश्रमिक से 1945 में अपने �
समय से वैचारिक साक्षात्कार करते हैं कवि कौशल किशोर - शकील सिद्दीकी
लखनऊ में आयोजित पुस्तक मेले के दौरान हर रोज़ कोई न कोई किताब अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रही है और उसपर चर्चा किताबों के इस फलक का विस्तार कर रही है। इसी कड़ी में कवि कौशल किशोर की नई किताब �
फासीवादी सत्ता संस्कृति के खिलाफ संघर्ष के संकल्प के साथ जसम बिहार का सम्मेलन सम्पन्न। जितेन्द्र कुमार अध्यक्ष तथा दीपक सिन्हा सचिव चुने गए।कवि कौशल किशोर ने कहा - बुलडोजर फासीवाद का प्रतीकRead More
…और अब ‘हमारी कहानियाँ, हमारा भविष्य’ थीम पर ब्रिक्स थिएटर फेस्टिवल
नई दिल्ली। भारत में हुए ब्रिक्स समिट के बाद संस्कृति मंत्रालय ब्रिक्स में अपनी अध्यक्षता के तहत ‘ब्रिक्स थिएटर फेस्टिवल’ 2026 के साथ एक और महत्वपूर्ण महोत्सव करने जा रहा है। यह महोत्सव 12 से 14 अक्टूबर, 2026 तक नई दिल्ली में होगा और इसमें भारत, थाईलैंड, इंडोनेशिया, रूस, विय�
जीडीपी पर एंकर का इतिहास ज्ञान – मिर्ची खा क्यों रहे हो …?
समसामयिक सवालों पर अपनी तीखी नज़र डालने वाले रचनाकार आलोक यात्री ने देख तमाशा दुनिया का कॉलम की शुरुआत की थी... कुछ साल पहले तक लगातार आलोक यात्री ने इस सिलसिले का बरकरार रखा.. फिर इसे आगे बढ़ाने का काम किया अनिल त्रिवेदी ने... और अब एक बार फिर आपके सामने है आलोक यात्री की ताज़ा रचना... देश की मुख्यधारा की मीडिया कहे जाने वाले चैनलों और उनके महान एंकरों के �
सतीश आनंद का जाना बेशक हिन्दी रंगमंच और खासकर पटना और बिहार के रंगमंच के लिए एक बड़ा शून्य पैदा करता है... बेशक तीश आनंद ने उस दौर में पटना में रंगमंच को एक नई दिशा दी और रंगकर्मियों को एक बड़ा मंच दिया जब साहित्य संस्कृति और खासकर रंगमंच एक मुश्किल दौर में था, दर्शकों को मंच तक लाना एक चुनौती थी और इसे समाज से जोड़कर एक सार्थक मिशन की तरह आगे ले जाना भी आसान नहीं था.. वो दौर था जब कालीदास