देश विदेश के अलग अलग हिस्सों में भारतीय साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े तमाम कार्यक्रम होते हैं, ढेर सारी गतिविधियां होती हैं। कई ख़बरें भी होती हैं जो हम तक नहीं पहुंच पातीं। गोष्ठियां, कार्यशालाएं होती हैं, रंगकर्म की तमाम विधाओं की झलक मिलती है और लोक संस्कृति के कई रूप दिखते हैं। नए कलाकार, नई प्रतिभाएं और संस्थाएं साहित्य-संस्कृति को समृद्ध करने की कोशिशों में लगे रहते हैं लेकिन उनकी जानकारी कम ही लोगों तक पहुंच पाती है। हमारी कोशिश है कि इस खंड में हम ऐसी ही गतिविधियों और ख़बरों को शामिल करें … चित्रों और वीडियो के साथ।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक चितरंजन त्रिपाठी ने कहा है कि अभी भारतीय रंगमंच को ए आई (कृतिम बुद्धिमत्ता ) से कोई खतरा नहीं है क्योंकि उसमें अभी वह सृजनात्मकता नहीं है। उन्होंने कहा कि मुंबई में 5 लाख रुपए में एनएसडी छात्रों को प्रशिक्षित करेगी और डिप्लोमा देगी। त्रिपाठी ने एनएसडी के ग्रीष्मकालीन थिएटर समारोह की जानकारी देते हुए पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में यह बात कही।
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इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर के जलसे में अपनी किताब The Essential Miir पर हुई चर्चा के दौरान कही। हार्पर कोलिन्स ने इस वर्ष जनवरी में यह किताब छापी है। उनकी नज्मों और गज़लों के अंग्रेजी अनुवाद भी छप चुके हैं। मीर की पैदाइश 1723 में आगरा में हुई जबकि इंतकाल 1810 में लखनऊ में हुआ।
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साहित्य अकादेमी की सामान्य परिषद की 30 मार्च 2026 को हुई बैठक में डॉ. प्रतिभा राय (ओड़िआ), श्री लख्मी खिलाणी (सिंधी) तथा श्री अब्दुस समद (उर्दू) को साहित्य अकादेमी की महत्तर सदस्यता प्रदान करने के प्रस्ताव को अनुमोदित किया गया। साहित्य अकादेमी महत्तर सदस्यता: भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन कार्यरत साहित्य अकादेमी द्वारा प्रदान किया जाने वाला सर्वाेच्च साहित्यिक सम्मान महत्त
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साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष डॉ. माधव कौशिक ने रवींद्र भवन परिसर में आयोजित एक भव्य समारोह में 30 मार्च से 4 अप्रैल तक चलने वाले ‘साहित्योत्सव-2026’ का उद्घाटन किया। इस मौके पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव अमिता प्रसाद साराभाई, साहित्य अकादेमी की उपाध्यक्ष प्रो. कुमुद शर्मा, सचिव पल्लवी प्रशांत होळकर, संस्कृति मंत्रालय के निदेशक अनीश पी. राजन और कई सारे साहित्यकार
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साहित्य अकादेमी पुरस्कार इस बार शुरु से विवादों में रहे, खासकर उसपर पड़ने वाली संस्कृति मंत्रालय की छाया और सरकारी दबावों में आए अकादेमी के कामकाज को लेकर। बेशक जो पुरस्कार नवंबर में घोषित होने थे, वो मार्च में घोषित हुए, लेकिन इसे लेकर भी लेखकों और साहित्यकारों में अलग अलग राय देखने को मिली। हिन्दी की जानी मानी लेखिका ममता कालिया बेशक अकादेमी पुरस्कार की हकदार रही हैं, उनका साहि
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इस बुरे और हताशा से भरे समय में रजा फाउंडेशन ने विश्व कविता समारोह का आयोजन कर अंधेरे में एक रौशनी फैलाने का काम किया।भले ही यह रोशनी थोड़ी हो टिमटिमाती हो पर उसने जीने की उम्मीद और उल्लास को जगाया दुख और पीड़ा का बयान करते हुए प्रेम की खोज की।आलिंगन और चुम्बन में जीवन के रंग को शब्दों में चित्रित किया युद्ध और विध्वंस के मलबे में फूल खिलाने की कोशिश की।
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राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक और “कहानी के रंगमंच” के प्रणेता देवेंद्र राज अंकुर ने कहा है कि भरत मुनि के” नाट्यशास्त्र” पर जब भी चर्चा हुई है उसमें वर्णित अभिनय पक्ष पर चर्चा बहुत कम हुई है जबकि भरत मुनि के उस ग्रन्थ में सर्वाधिक जिक्र अभिनय का ही किया गया है। भारंगम के श्रुति कार्यक्रम में देवेन्द्र राज अंकुर ने ये बात कही। उनकी लिखी पुस्तक 'भरत मुनि के नाट्यशास्त्र
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राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका “रंग प्रसंग” के 59वें अंक के लोकार्पण के दौरान वक्ताओं ने सांस्कृतिक पत्रकारिता के तमाम पहलुओं पर चर्चा की और आज के दौर में इसे हाशिए पर पहुंच जाने के संकट पर भी बात की। भारंगम के ’श्रुति ‘ कार्यक्रम में “रंग प्रसंग” के पूर्व संपादक और प्रसिद्ध कवि तथा कला समीक्षक प्रयाग शुक्ल, एनएसडी के निदेशक चितरंजन त्रिपाठी, पत्रिका की अतिथि संपादक शशि प्
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प्रसिद्ध रंग समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी ने कहा है कि हमेशा से रंगमंच का संकट मौजूद रहा है, यहां तक कि भरत मुनि के काल में भी और नाटक करने वालों के भीतर भी एक नाटक होता रहता है। उनका कहना है कि यह सच है कि एनएसडी से इब्राहिम अल्का जी के ज़माने में एक से एक दिग्गज कलाकार सामने आए पर हिंदी रंगमंच का कभी कोई स्वर्णकाल नहीं रहा और स्वर्ण काल की अवधारणा भी एक तरह का भ्रम है लेकिन उन्होंने इस बा
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आंद्रे बेते नहीं रहे। हिंदी मीडिया के लिए भले ये खबर हो या ना हो या कोई छोटी मामूली सी खबर हो लेकिन एकेडमिक वर्ल्ड में आंद्रे बेते का नहीं रहना एक बहुत बड़ी खबर है और इस बात को दीपांकर गुप्ता ,वीणा दास, अभिजीत पाठक और आनंद कुमार जैसे प्रख्यात समाज शास्त्री समझ सकते हैं जो अभी सक्रिय हैं। भले ही हमारे टीवी एंकरों को न पता हो कि आंद्रे बेते , . कौन थे या यूट्यूबरो को ना पता हो आंद्रे बेते कौ
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