देश विदेश के अलग अलग हिस्सों में भारतीय साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े तमाम कार्यक्रम होते हैं, ढेर सारी गतिविधियां होती हैं। कई ख़बरें भी होती हैं जो हम तक नहीं पहुंच पातीं। गोष्ठियां, कार्यशालाएं होती हैं, रंगकर्म की तमाम विधाओं की झलक मिलती है और लोक संस्कृति के कई रूप दिखते हैं। नए कलाकार, नई प्रतिभाएं और संस्थाएं साहित्य-संस्कृति को समृद्ध करने की कोशिशों में लगे रहते हैं लेकिन उनकी जानकारी कम ही लोगों तक पहुंच पाती है। हमारी कोशिश है कि इस खंड में हम ऐसी ही गतिविधियों और ख़बरों को शामिल करें … चित्रों और वीडियो के साथ।

भारत में आधुनिकता का जन्म कैसे हुआ, इसको लेकर पहले यह अवधारणा रही कि यह आधुनिकता पश्चिम से आयातित है यानी जब भारत का संपर्क पश्चिमी देशों से हुआ और वहां से ज्ञान विज्ञान की शाखाएं भारत में फैली तो यहां आधुनिकता का जन्म हुआ लेकिन अब इस आधुनिकता को लेकर एक नई तरह की अवधारणा विकसित हो रही है कि भारतीय आधुनिकता का उत्स भारत में ही है,उसका उत्स पश्चिम में नहीं है भले ही पश्चिम के साथ उसका स
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पिछले दिनों राजधानी में एक ऐसी शाम बीती जो हिंदुस्तानी संगीत की एक तपस्विनी के नाम रही जिसने संगीत के तीन घराने की गायकी की और वह एक जीता जागता इतिहास बन चुकी हैं। 23 दिसम्बर 1927 को राजस्थान में जन्मी शन्नो खुराना ने लाहौर रेडियो से 25 रुपए के पारिश्रमिक से 1945 में अपने गायन की शुरुआत की थी। पद्मविभूषण से सम्मानित शन्नो खुराना 1956 में शीला भाटिया के हीर रांझा ओपेरा से मशहूर हुई थीं। उन्हों�
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लखनऊ में आयोजित पुस्तक मेले के दौरान हर रोज़ कोई न कोई किताब अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रही है और उसपर चर्चा किताबों के इस फलक का विस्तार कर रही है। इसी कड़ी में कवि कौशल किशोर की नई किताब समय, समाज और साहित्य ने भी पाठकों का ध्यान खींचा। जन संस्कृति मंच (जसम) ने इस किताब पर एक गंभीर चर्चा का कार्यक्रम रखा। वरिष्ठ साहित्यकार और अनुवादक शकील सिद्दीकी ने इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करते ह�
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बीते जमाने की मशहूर कथक नृत्यांगना रोशन कुमारी नहीं रही। 5 अक्तूबर को मुंबई में 89 साल की इस नृत्यांगना ने आखिरी सांस ली। संगीत और नृत्य की शुरुआती शिक्षा उन्होंने अपनी मां और अपने ज़माने की मशहूर गायिका जोहराबाई अंबालेवाली और अपने तबलावादक पिता चौधरी फ़कीर मोहम्मद से ली थी। आपको सत्यजीत राय की क्लासिक फिल्म जलसाघर याद होगी, रोशन कुमारी ने उसमें अपनी यादगार भूमिका से लोगों के दिल
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बंगाल में नटी विनोदिनी को एक कल्चरल आइकॉन माना जाता है लेकिन गौहर जान को वह दर्जा नहीं मिला जबकि उनक़ा कद नटी विनोदिनी से कम नहीं था। कल शाम कोलकत्ता के भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के सत्यजीत राय सभागार में देश में ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग के 125,वर्ष के मद्दे नजर पहली ग्रोमोफोन क्वीन गौहर जान की स्मृति में आयोजित एक शानदार डांस ड्रामा से पूर्व चर्चा में यह सवाल शिक्षयतन कालेज में सह
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जन संस्कृति मंच (जसम) का दो दिवसीय सातवां बिहार राज्य सम्मेलन 26 व 27 सितंबर को समस्तीपुर कालेज के सभागार में नयी राज्य कमेटी के चुनाव के साथ सम्पन्न हुआ। 'फासीवादी सत्ता संस्कृति के खिलाफ शहीद भगत सिंह और डॉक्टर अंबेडकर के सपनों का भारत ' -- इस थीम पर हुए सम्मेलन की शुरुआत शहीद-ए- आजम भगतसिंह और डा अम्बेडकर की मूर्ति पर माल्यार्पण तथा 'कारवां चलता रहेगा' शहीद गीत के साथ हुई। सांस्कृतिक म�
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भारत में हुए ब्रिक्स समिट के बाद संस्कृति मंत्रालय ब्रिक्स में अपनी अध्यक्षता के तहत ‘ब्रिक्स थिएटर फेस्टिवल’ 2026 के साथ एक और महत्वपूर्ण महोत्सव करने जा रहा है। यह महोत्सव 12 से 14 अक्टूबर, 2026 तक नई दिल्ली में होगा और इसमें भारत, थाईलैंड, इंडोनेशिया, रूस, वियतनाम, ईरान, साउथ अफ्रीका, कज़ाकिस्तान, इथियोपिया और ब्रिक्स के सदस्य और पार्टनर देशों के सौ से अधिक कला-प्रेमी शामिल होंगे। यह महो�
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आचार्य शिवपूजन सहाय के उपन्यास “देहाती दुनिया ‘ के सौ साल होने पर तीन दिवसीय समारोह संपन्न हो गया और इसके साथ ही इस उपन्यास को लेकर एक नया विमर्श खड़ा हो गया। 1926 में प्रकाशित यह उपन्यास हिंदी की चौथी कृति है जिसके सौ साल होने पर चर्चा हो रही है।कोई इसे कथा डायरी बता रहा तो कोई इसे विनोद कुमार शुक्ल की दीवार में एक खिड़की रहा करती थी की तरह प्रयोगधर्मी और नवाचारी उपन्यास बता रहा है।कोई प
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अरुंधति रॉय अगर कुछ लिखती हैं तो उसके कुछ मायने होते हैं... बेशक उनका लेखन उनके निजी जीवन और अनुभवों से फूटने वाली वह अभिव्यक्ति है जो सीधे सीधे मौजूदा समाज और रिश्तों की जटिलताओं के साथ साथ समकालीन राजनीति और खासकर कट्टरवादी सियासत करने वालों पर चोट करती है... ज़ाहिर है दक्षिणपंथी ताकतों की नज़र में वो हमेशा खटकती हैं लेकिन उनके जीवन के जो उतार चढ़ाव रहे हैं, वो उन्हें एक ऐसी जीवट वाल
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