Month: April 2020
ऋृषि कपूर और इरफ़ान: विरासत और संघर्ष की दास्तान
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April 30, 2020

बॉलीवुड ही नहीं पूरा देश सदमे में है। आखिर ये क्या हो रहा है। इरफ़ान के जाने का ग़म और अब बेहद ज़िंदादिल ऋषि कपूर के ऐसे चले जाने का सदमा। एक ऐसे कलाकार जिसकी सूरत में एक मुस्कराहट और सकारात्कता की झलक हमेशा रही... इरफ़ान और ऋषि कपूर में बुनियादी फर्क ये कि ऋषि को बॉलीवुड विरासत में मिला तो इरफ़ान ने इसे अपने संघर्षों से हासिल किया... एक राजस्थान के छोटे से शहर टोंक से जयपुर और एनएसडी (दि

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सामाजिक चेतना से लैस एक अभिनेता का जाना
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April 29, 2020

इरफान खान का जाना एक सदमे की तरह है। महज 53 साल की उम्र में इस कलाकार ने अपने संघर्षों और खास अंदाज़ की वजह से अपनी जगह बनाई। बॉलीवुड के साथ साथ करोड़ों दर्शकों के दिलों में अपनी छाप छोड़ी। बिंदास अंदाज़ में ज़िंदगी को लेने वाले और बेहद संवेदनशील तरीके से समाज को देखने वाले इस अभिनेता ने अपनी खास शैली बनाई...चाहे वह अपनी बेहद गंभीर और गहरी आंखों से बहुत कुछ कह देने का अंदाज़ हो या फिर डॉ

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जी हां, ‘वध काल’ में मैं सिर्फ मौत बेचता हूं…
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April 25, 2020

बहुत दिनों से प्रिंट मीडिया का चेहरा सलीके से नहीं देखा था। दिन निकलते ही खबरिया चैनल अपने पिटे पिटाये अंदाज़ में खबरें परोसने में लगे रहते हैं। बेगम की चाय की प्याली से पहले "हॉट सीट" तक की यात्रा यह आसान बना देते हैं। मौत के आंकड़ों का गणित आपको लगातार खौफज़दा करता रहता है। इस "वध काल" में चचा गालिब की सलाह मानना ही बेहतर..

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‘थिएटर की अपनी स्वतंत्र भाषा होती है’
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April 24, 2020

उषा गांगुली का गुज़र जाना रंगमंच के लिए आखिर क्यों इतना बड़ा शून्य पैदा करता है.. दरअसल उषा जी उन सुलझी हुई रंगकर्मियों में रही थीं जिन्होंने रंगकर्म को सामयिक संदर्भों में जोड़ने के साथ ही समाज और सियासत को भी बेहद बारीकी से देखा, समझा। दिसंबर 2018 में नवभारत टाइम्स ने उषा गांगुली का यह इंटरव्यू छापा था... दिलीप कुमार लाल ने उनसे लंबी बातचीत की थी जिसमें उन्होंने तमाम मुद्दों पर कई अहम

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फिल्म ‘रेनकोट’ की पटकथा लिखी थीं उषा गांगुली ने
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April 24, 2020

बहुत कम लोगों को मालूम होगा ऋतुपर्ण घोष की हिंदी फिल्म 'रेनकोट' (2004) की पटकथा उषा गांगुली ने लिखी थीं। सर्वश्रेष्ठ सिनेमा के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म में ऐश्वर्या राय और अजय देवगन ने बेहद डूबकर अभिनय किया था। देश और देश के कई फिल्म महोत्सव में यह शामिल भी थीं। निर्देशक ऋतुपर्ण घोष से इसकी पटकथा को लेकर उषा जी अनेक बार मिली थी। तब जाकर फाइनल पटकथा तैयार हुई थी।

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उषा गांगुली का जाना और रंगमंच का सूनापन…
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April 24, 2020

पश्चिम बंगाल में हिन्दी रंगमंच को स्थापित करने वाली और अपने रंगकर्म से देश और दुनिया में खास मुकाम बनाने वाली उषा गांगुली अब नहीं रहीं। उनका जाना तमाम संस्कृतिकर्मियों और रंगमंच से जुड़े लोगों के भीतर एक गहरा सूनापन छोड़ गया है। सोशल मीडिया और खासकर फेसबुक पर उषा जी को करीब से जानने वाले, उनके रंगकर्म को समझने वालों ने अपने अपने तरीके से लिखा, उन्हें याद किया। 7 रंग परिवार उषा जी को

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साधारण से असाधारण होने की कहानी हैं तीजन बाई…
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April 24, 2020

यूरोपीय धरती से निकले ओपेरा, बैले, सिम्फ़नी और फ़्लेमिंको विशुद्ध शास्त्रीय हैं. पर बेहद लोकप्रिय हैं. और इनमें से कुछ भी देख रहे हों तो दर्शक सहज रूप से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, अक्सर भावुक हो जाते हैं और आत्मविभोरता में रोंगटे खड़े हो जाते हैं. ठीक वही अनुभव होता है जब आप तीजन बाई से पंडवानी सुनते हैं. पंडवानी यानी महाभारत के अलग अलग प्रसंगों की संगीतमय प्रस्तुति. एकल नाट्य की तरह.

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फिल्मकार सत्यजीत राय के भीतर का कलाकार…
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April 23, 2020

एक संवेदनशील चित्रकार कैसे एक बेहतरीन फिल्मकार बन सकता है, सत्यजित राय इसके अद्भुत मिसाल हैं। उन्हें गुज़रे 18 साल हो गए... आने वाली 2 मई से उनके जन्म शताब्दी वर्ष की शुरुआत हो जाएगी। आज उन्हें याद करते हुए ये सोचने को हम बरबस मजबूर हो जाते हैं कि कम्प्यूटर ग्राफिक्स और एनिमेशन के इस आधुनिकतम दौर में क्या किसी फिल्मकार में इतना सब्र, इतनी गहरी दृष्टि, हर दृश्य और हर फ्रेम को पहले चित्रो

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पूरब का खाना, ज़ायके का ख़ज़ाना…
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April 22, 2020

मशहूर खानपान विशेषज्ञ और लेखक केटी अचाया ने इंडियन फूड में देश के हर इलाकों के खानपान, कृषि और खानपान के इतिहास की बात की है. उसी किताब में कहा गया है, 16वीं सदी में उत्तर प्रदेश के गंगा के किनारे के इलाकों में जो खाने लोकप्रिय थे, उसमें सत्तू, जौ का आटा ज्यादा प्रचलन में था, दालें खूब होती थीं. लिहाजा उनसे मुंगोड़ी और बड़ियां बनाई जाती थीं. इनका उपयोग सब्जियों के साथ होता था.

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कोरोना काल के बहाने शानी की याद…
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April 22, 2020

कोरोना संकट में भी चारों तरफ हिंदू मुस्लिम चल रहा है। इस मुश्किल समय में भी नफरत की खेती करने के बजाय क्यों न मुस्लिम अंतर्मन को समझा जाए, इसीलिए शानी को पढ़ने बैठा हूं। जिस गांव में पैदा हुआ और पला बढ़ा, वहां केवल एक मुस्लिम परिवार था, जो बाद में कहीं दूसरी जगह चला गया। वकील मियां जब तक गांव में रहे, मुहर्रम पर तजिया भी गांव के लोगों के परिवार के सहयोग से ही निकलता था। लिहाजा मुसलमानों

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