किसी भी देश की संस्कृति को विकसित करने, इसे सहेजने और खुद को अभिव्यक्त करने का एक बेहतरीन ज़रिया है साहित्य। साहित्य वो विधा है जिसके कई आयाम हैं। कहानियां, कविताएं, गीत, शायरी, लेख, संस्मरण, समीक्षा, आलोचना, नाटक, रिपोर्ताज, व्यंग्य – अभिव्यक्ति के तमाम ऐसे माध्यम हैं जिनसे साहित्य बनता है और समृद्ध होता है। साहित्य में समाज और जीवन के हर पहलू की झलक होती है। संवेदनाओं और दर्शन का बेहतरीन मेल होता है। संस्कृति और तमाम कालखंडों की और राजनीति से लेकर बेहद निजी रिश्तों तक की अद्भुत अभिव्यक्ति होती है। भाषा का एक विशाल संसार गढ़ता है साहित्य। साहित्य के मौजूदा स्वरूप, नए रचनाकर्म और छोटे बड़े साहित्यिक आयोजनों के अलावा आप इस खंड में पाएंगे साहित्य का हर रंग…

यूपी के अदबी शहर इलाहाबाद की शिनाख्त है उर्दू अदब के तंजोमिज़ाह के नामचीन शायर अकबर इलाहाबादी। अपनी शायरी से समाज को वक्त वक्त पर आगाह करने वाले इस शायर को उनके अपने ही शहर और अदब के लोग भूल गए। यह चुभन इसलिए भी सबसे ज्यादा होगी क्योंकि अकबर इलाहाबादी साहब को गुज़रे इसी 9 सितंबर को सौ साल हो गए।
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भारतीय जन नाट्य संघ (इंडियन प्रोग्रेसिव थिएटर एसोसिएशन) यानी इप्टा ने बहुत ही संज़ीदगी के साथ जाने माने लेखक, पत्रकार, और फिल्मकार ख्वाज़ा अहमद अब्बास को याद किया... इसी कड़ी में अब्बास की फिल्मों और खासकर उनकी फिल्म हिना को केन्द्र में रखकर उनकी रचनात्मक दृष्टि पर चर्चा हुई... इसकी रिपोर्ट इप्टा की ओर से 7 रंग के लिए अर्पिता ने भेजी है...
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हिन्दी के जिन चार बड़े समकालीन कवियों की चर्चा अक्सर होती है उनमें त्रिलोचन, केदार नाथ अग्रवाल, शमशेर और नागार्जुन शामिल हैं। दरअसल प्रगतिशील धारा के इन कवियों को एक ऐसे दौर का कवि माना जाता है जब देश राजनीतिक उथल-पुथल के साथ तमाम जन आंदोलनों के दौर से गुजर रहा था।
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आज कबीरदास का जन्मदिन है। आम तौर पर कबीरदास को कबीर ही कहते हैं और उनके अनुयायियों को कबीरपंथी। आज जिस सूफ़ी संगीत की दुनिया दीवानी है, वह सूफ़ीवाद भी कबीर से ही आता है। ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर...यानी सबसे प्यार करो, सबकी मदद करो, बहुत की चाह मत करो। कबीर की नज़र में जीवन के अपने मायने हैं और उनके दोहे कहीं न कहीं आपको ब्रह्म और आध्यात्म की व्यावहारिक दुनिया से जोड़ते हैं।
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जाने माने कवि ज्ञानेंद्रपति को इस बार का नागार्जुन सम्मान दिया जा रहा है। इससे जुड़ी विस्तृत जानकारी मशहूर कवि और निर्णायक मंडल के सदस्य मदन कश्यप ने मीडिया को दी। अपनी अनूठी काव्यभाषा में रचनात्मक प्रतिरोध के लिए सुप्रसिद्ध कवि ज्ञानेन्द्रपति निराला, नागार्जुन और मुक्तिबोध की काव्य संवेदना को विस्तार देने वाले कवि हैं।
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अपनी कविता के माध्यम से प्रकृति की सुवास सब ओर बिखरने वाले कवि सुमित्रानंदन पंत का जन्म कौसानी (जिला बागेश्वर, उत्तराखंड) में 20 मई, 1900 को हुआ था। जन्म के कुछ ही समय बाद मां का देहांत हो जाने से उन्होंने प्रकृति को ही अपनी मां के रूप में देखा और जाना। दादी की गोद में पले बालक का नाम गुसाई दत्त रखा गया; पर कुछ बड़े होने पर उन्होंने स्वयं अपना नाम सुमित्रानंदन रख लिया। सात वर्ष की अवस्था से
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बिहार में नुक्कड़ कविता आंदोलन का जब भी ज़िक्र होगा, जब भी जेपी आंदोलन के दौरान कविता की नई धारा की चर्चा होगी, डॉ रवीन्द्र राजहंस का नाम बेहद गर्व के साथ लिया जाएगा। याद आते हैं 1974 आंदोलन के वो दिन जब पटना में हर शाम किसी न किसी नुक्कड़ पर हिन्दी के सुप्रसिद्ध कहानीकार फणीश्वरनाथ रेणु की अगुवाई में डॉ रवीन्द्र राजहंस के साथ सत्यनारायण, गोपी वल्लभ, बाबूलाल मधुकर, परेश सिन्हा समेत कई य
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आखिर राहुल सांकृत्यायन में ऐसा क्या है जो उन्हें बार बार पढ़ने और याद करने की ज़रूरत महसूस होती है? आखिर मौजूदा दौर में राहुल सांकृत्यायन क्यों ज़रूरी हैं? क्यों उनकी किताब 'वोल्गा से गंगा' का ज़िक्र हमेशा आता है और क्यों एक ब्राह्मण होने के बाद भी उन्होंने ब्राह्मणवाद और ढकोसलों का खुलकर विरोध किया? उनके तार्किक विश्लेषणों और समाज को देखने के उनके नज़रिये ने कैसे एक नए समाज की परि
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लॉकडाउन के दौरान शुरुआत के कुछ दिनों की निराशा-हताशा और डर को छोड़कर फिर जो सोशल मीडिया साहित्य का दौर शुरु हुआ, वर्चुअल संवाद, वेबिनार और लाइव का सिलसिला शुरु हुआ, वह दिसंबर आते आते हरेक के जीवन का हिस्सा बन गया। इस मायने में कोरोना काल इतिहास में दर्ज किया जाएगा कि कैसे एक झटके में इसने सबको डिजिटल बना दिया और फासलों के बावजूद इस ‘काल’ ने आभासी दुनिया में सबको एक दूसरे के पास पहुंचा
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मंगलेश डबराल ने कभी हार नहीं मानी। रचनाकर्म और अपनी जीवनशैली में पूरी ईमानदारी के साथ आखिरी वक्त तक डटे रहे। उनकी कविताएं उनके जीवन के इर्द गिर्द रही हैं जहां पहाड़ भी है और समतल ज़मीन भी, गांव का मुश्किल जीवन भी है और शहरों- महानगरों की आपाधापी भी। रिश्तों की बारीकियां भी हैं, बदलती हुई सामाजिक व्यवस्थाओं और सत्ता के अधिनायकवाद के चेहरे भी हैं। एक अकेलापन और कहीं कुछ छूट जाने का एह
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