किसी भी देश की संस्कृति को विकसित करने, इसे सहेजने और खुद को अभिव्यक्त करने का एक बेहतरीन ज़रिया है साहित्य। साहित्य वो विधा है जिसके कई आयाम हैं। कहानियां, कविताएं, गीत, शायरी, लेख, संस्मरण, समीक्षा, आलोचना, नाटक, रिपोर्ताज, व्यंग्य – अभिव्यक्ति के तमाम ऐसे माध्यम हैं जिनसे साहित्य बनता है और समृद्ध होता है। साहित्य में समाज और जीवन के हर पहलू की झलक होती है। संवेदनाओं और दर्शन का बेहतरीन मेल होता है। संस्कृति और तमाम कालखंडों की और राजनीति से लेकर बेहद निजी रिश्तों तक की अद्भुत अभिव्यक्ति होती है। भाषा का एक विशाल संसार गढ़ता है साहित्य। साहित्य के मौजूदा स्वरूप, नए रचनाकर्म और छोटे बड़े साहित्यिक आयोजनों के अलावा आप इस खंड में पाएंगे साहित्य का हर रंग…

परसाई जी ने व्यंग्य को जो नए आयाम दिए, उन्होंने देश, समाज, रिश्ते-नाते, राजनीति और साहित्य से लेकर मध्यवर्ग की महात्वाकांक्षाओं को अपनी चुटीली शैली में जिस तरह पेश किया, वह अब के लेखन में आप नहीं पा सकते। हरिशंकर परसाई के विशाल रचना संसार से गुजरते हुए आपको उनके व्यक्तित्व की पूरी झलक मिल जाएगी। ये भी पता चलेगा कि दौर चाहे कोई भी हो, अगर आपका नज़रिया साफ हो, समाज और व्यक्ति को देखने की
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त्रिलोचन जी को याद करना एक पूरे युग को याद करने जैसा है। उनका विशाल रचना संसार और बेहद सरल व्यक्तित्व अब आपको कहीं नहीं मिलेगा। उनकी कविताओं को, उनकी रचना यात्रा को और उनके साथ बिताए गए कुछ बेहतरीन पलों को साझा करना शायद बहुत से लोग चाहें, लेकिन बदलते दौर में, नए सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में और साहित्यिक जमात की खेमेबाजी में त्रिलोचन आज भी हाशिए पर हैं। उनकी जन्म शताब्दि की औपचारि
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इन आखिरी सांसों में अटल जी के पीछे का पूरा अतीत है... जीवन की जंग है... अस्पताल का वेंटिलेटर है.. कृत्रिम सांसें हैं ... लेकिन अब एक एक पल भारी है... 7 रंग ने अटल जी को हमेशा पूरे सम्मान और संवेदना से अपने साथ पाया है.. आज भी हम उनके अतीत को याद करते हैं.. खुशनुमा और जीवंत लेकिन अकेले व्यक्तित्व को महसूस करते हैं... उनकी चंद कविताएं और तस्वीरें फिर से आपके लिए...
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साहित्य उत्सवों की श्रृंखला में अब अब हल्द्वानी का नाम भी जुड़ने जा रहा है। यहां 15 अप्रैल को हेने जा रहे साहित्य उत्सव में कई जाने माने पत्रकार, लेखक और साहित्य-संस्कृति से जुड़े लोग हिस्सा ले रहे हैं। इस दौरान टीवी पत्रकार दिनेश मानसेरा की किताब – ‘मंगली – एक पटकथा’ का विमोचन भी होगा। कहानी, कविता, उपन्यास समेत साहित्य के तमाम विधाओं और मीडिया में हाशिए पर पहुंच चुके साहित्य जैसे स
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केदार जी का जाना बेशक मीडिया की तमाम खबरों की तरह न रहा हो, सियासत और बयानबाजियों से भरे अखबार और चैनल बेशक साहित्य, संस्कृति और कला के लिए जगह न निकाल पाते हों और केदार नाथ सिंह का नाम बेशक आज के युवा पत्रकार और मीडियाकर्मी न जानते हों, लेकिन अब भी एक पीढ़ी है जो इस परंपरा को निभा रही है। अब भी कुछ अखबार हैं जहां साहित्य और संस्कृति को समझने वाले संवेदनशील लोग बचे हुए हैं। कुछ अखबारों न
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केदार जी का जाना एक सदमे की तरह है। उनसे न मिल पाने की कसक हमेशा रहेगी। कई बार मिलते मिलते रह गया। उनके साथ ठीक वैसे ही खुलकर और पारिवारिक तरीके से हर मसले पर बात करने की तमन्ना रह गई जैसे त्रिलोचन जी के साथ किया करता था। अपने बेहद अज़ीज बड़े भाई राजीव जी के साथ अक्सर यह तय हुआ कि एक दिन उनके घर पर ही केदार जी के साथ कुछ घंटे बिताए जाएं, लेकिन वह संयोग नहीं बन पाया।
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साहित्य अकादमी के वार्षिक समारोह साहित्योत्सव का 12 फरवरी से आगाज हो गया। छह दिवसीय इस आयोजन के पहले दिन साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेताओं को अवॉर्ड दिए गए। हिंदी के रमेश कुंतल मेघ समेत 24 लोगों को अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। साहित्य प्रेमियों को उनसे रूबरू होने और सवाल पूछने का मौका भी मिला।
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कुंवर नारायण बेशक 90 साल के हो गए हों, बीमार भी रहे हों, लेकिन उनका चले जाना कई स्मृतियों को फिर से ताजा कर गया। लखनऊ में हुई उनसे एकाध मुलाकातें और कुछ समारोहों में उनकी बेहद संज़ीदा और सरल उपस्थिति। वो किसी वाद के शिकार नहीं थे फिर भी वो जनवादी थे। वो किसी विचारधारा में बंधे नहीं थे लेकिन लिखने में वो आपके बेहद करीब खड़े दिखते थे, एकदम हमारे आपके पास, ज़िंदगी की उलझनों और हकीकतों के सा
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मैं कार से उतर कर हेमंत जी के पीछे-पीछे घर की सीढ़िया चढ़ने लगा. सीढ़ियां एक बड़े से ड्राइंग रूम के सामने जाकर रुकीं. दायें हाथ की ओर घूमा तो देखा- फर वाली टोपी लगाए, सोफ़े पर एक बुज़ुर्ग बैठे हैं. मेरी तरफ़ उनकी पीठ थी. मैं घूम कर जैसे ही सामने पहुंचा, दंग रह गया. वे मनु शर्मा थे. एकाएक मेरी स्मृतियों में ‘राणा सांगा’, ‘छत्रपति’ और ‘मरीचिका’ मुस्कुराने लगे. 'दौपदी', 'द्रोण', 'कर्ण' और 'कृष्ण' आ
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जाने माने साहित्यकार मनु शर्मा अपने पीछे साहित्य की एक ऐतिहासिक विरासत छोड़कर पंचतत्व में विलीन हो गए। वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर उन्हें अंतिम विदाई देने वालों की आंखें नम थीं। पद्मश्री मनु शर्मा को पौराणिक कथाओं और पात्रों को आधुनिक संदर्भ में उपन्यासों-कहानियों के जरिए जीवंत करने वाला हिंदी साहित्य का पुरोधा माना जाता था। 89 वर्षीय शर्मा ने वाराणसी के बड़ी पियरी स्थित आवास
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