भए कबीर, कबीर…
आज कबीरदास का जन्मदिन है। आम तौर पर कबीरदास को कबीर ही कहते हैं और उनके अनुयायियों को कबीरपंथी। आज जिस सूफ़ी संगीत की दुनिया दीवानी है, वह सूफ़ीवाद भी कबीर से ही आता है। ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर…यानी सबसे प्यार करो, सबकी मदद करो, बहुत की चाह मत करो। कबीर की नज़र में जीवन के अपने मायने हैं और उनके दोहे कहीं न कहीं आपको ब्रह्म और आध्यात्म की व्यावहारिक दुनिया से जोड़ते हैं। कबीर के बारे में वरिष्ठ पत्रकार, बेहतरीन लेखक और भाषा के धनी हेमंत शर्मा क्या लिखते हैं, आप भी पढ़िए… 
कबीर अपने ज़माने की बेमिसाल अभिव्यक्ति थे। कबीर को लेकर एक विस्तृत वैचारिक संसार है। ख़ूबी यह है कि कबीर विश्वविघालयों में अध्ययन केन्द्र में तो हैं ही। वे दर्शन में हैं , वेदान्त में हैं। अद्वैत में हैं। साथ ही भिखारियों की भिक्षा का माध्यम भी हैं। गुरू वाणी के पाठ में भी हैं।ओंकार नाथ ठाकुर से लेकर कुमार गन्धर्व तक गायन में हैं। कबीर के यहॉं एक है दो नहीं। उनके यहॉं सुनना है। कहना नहीं। वे एक तरह के वाद्य हैं। और वाद्य शब्दों की भाषा से परे होते हैं। कबीर जीवन की तरफ़ से नहीं। मृत्यु की ओर से संसार को देखते हैं।
छ: सौ साल से कबीर भाषा के आर पार हर कहीं मिलते हैं। कबीर मठों मे बाबा की तरह ,पंथों में पंथ गायक की तरह, ग्रन्थों में ग्रन्थ विरोधी की तरह, मुसलमानों में ना मुसलमान की तरह, पंडितों में कर्मकाण्ड के ख़िलाफ़ खड्गहस्त,सूफ़ियों में सूफ़ी, साधुओं मे साधु , भिखारियों में कभी मॉंगने और कभी देते हुए। कामगारों मे दस्तकार के रूप में स्थापित हैं। कबीर सॉंरगी में, ख़ज़ंडी में, घुँघरू में, करताल में, खडताल में, रेबाब में, किंगरी में हर कही मिलेगें। वे दुख में, विषाद में, धूल और मिट्टी में भी आपको मिल जायेंगें।
कबीर पढ़े लिखे नही थे पर उनकी रचनाएँ हर पढे लिखे के लिए आदर्श हैं। वे वेदान्त और अद्वैत के प्रतिपादक थे।
छ: सौ सालों की मौखिक परम्परा में कबीर जीवित हैं। कबीर की रचनाओं में तीन भेद हैं। साखी ,सबद और रमैनी। रमैनी में मुख्यत: दोहा चौपाई का प्रयोग। कबीर के नाम पर क्या और कितना है इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके नाम छ लाख से ज्यादा दोहे हैं। “छ: लाख छानबे सहस्त्र रमैनी एक जीभ पर होय “ चेलों ने भी उनके नाम पर खूब क्षेपित किया ।
जब हिन्दी बोलियों के सहारे थी तो कबीर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हिन्दी को भाषा बनाने की पहल की। उन्होंने सभी भाषाओं और बोलियों से कुछ कुछ लेकर एक सधुक्ड्डी भाषा का ईजाद किया। यानी साधुओं की घुमक्कड़ी वृत्ति से हर जगह के शब्द ले उससे नई सधुक्कडी भाषा बनाना। उन्होंने दुनिया को ठेंगे पर रख एक फक्काड़ाना मस्ती को अपनी शैली बनाई। उस ज़माने में कुरीतियो के ख़िलाफ़ जंग के लिए लुकाठी हाथ में लेकर अपना घर फूँकने की तत्परता कबीर ने दिखायी। वे सुधार चाहते थे। चाहे व्यवस्था टूट जाय। बीसवीं शताब्दी में लोहिया “ सुधरो या टूटो “ का एलान कर रहे थे जबकि कबीर ने यह एलान सोलहवीं सदी में ही कर दिया था।
कबीर ने मोटी मोटी पोथियों के अस्तित्व को नकारा था। इन पोथियों के बरक्स ढाई अक्षर की प्रतिस्थापना की। उस वक्त लोकतांत्रिक समाज बना नहीं था। नेता विरोधी दल के पद की कल्पना नहीं थी। फिर भी कबीर ने “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय “ का उद्घोष किया। मार्क्स के चार शताब्दी पहले कबीर का साम्यवाद देखिए। “ सॉंई इतना दीजिए। जामै कुटुंब समाय। मैं भी भूखा न रहूँ साधु न भूखा जाय। मॉंग और आपूर्ति का यह फ़तवा मार्क्सवाद के जन्म से पॉंच सौ साल पहले का था। कबीर ने हमें जो साम्यवाद दिया जो प्लेटो और मार्क्स के साम्यवाद से भिन्न है। प्लेटो का साम्यवाद वंश पर आधारित है और मार्क्स का साम्यवाद अर्थ पर। कबीर का साम्यवाद जीवन मूल्यों पर आधारित है और मानव को जीने का समान अधिकार दिलाता है। इस साम्यवाद में मनुष्य साध्य है, और अर्थ साधन। और यह साधन मानव कल्याण के लिए प्रयुक्त होता है। कबीर ने कहा कि “उदर समाता अन्न लै, तनहिं समाता चीर। अधिक संग्रह ना करै, ताको नाम फकीर”।
आज से छ: सौ साल पहले भी समय के महत्व को समझते हुए कबीर दास ने कहा कि ‘‘काल करे जो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होयगी, बहुरी करोगे कब। ” इस दोहे में कबीर ने समय के महत्व को थोड़े शब्दों में ही समझा दिया था। वे काल से परे सार्वकालिक है।
जो सबमें हैं वह कबीर में है। और जो कबीर में हैं। वह सबमें है। फिर भी वे अकेले हैं। कबीर अपने दोस्त हैं। मुहल्ले के है। आज उनका जन्म दिन है।
( वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हेमंत शर्मा के फेसबुक वॉल से साभार)
Posted Date:

June 24, 2021

5:09 pm

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