किसी भी देश की संस्कृति को विकसित करने, इसे सहेजने और खुद को अभिव्यक्त करने का एक बेहतरीन ज़रिया है साहित्य। साहित्य वो विधा है जिसके कई आयाम हैं। कहानियां, कविताएं, गीत, शायरी, लेख, संस्मरण, समीक्षा, आलोचना, नाटक, रिपोर्ताज, व्यंग्य – अभिव्यक्ति के तमाम ऐसे माध्यम हैं जिनसे साहित्य बनता है और समृद्ध होता है। साहित्य में समाज और जीवन के हर पहलू की झलक होती है। संवेदनाओं और दर्शन का बेहतरीन मेल होता है। संस्कृति और तमाम कालखंडों की और राजनीति से लेकर बेहद निजी रिश्तों तक की अद्भुत अभिव्यक्ति होती है। भाषा का एक विशाल संसार गढ़ता है साहित्य। साहित्य के मौजूदा स्वरूप, नए रचनाकर्म और छोटे बड़े साहित्यिक आयोजनों के अलावा आप इस खंड में पाएंगे साहित्य का हर रंग…

हिंदी साहित्य जगत के पुरोधा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का हिंदी साहित्य में योगदान कभी नकारा नहीं जा सकता। कबीर जैसे महान संत को दुनिया से परिचित कराने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। द्विवेदी जी हिंदी निबंधकार, आलोचक और उपन्यासकार थे। उत्तर प्रदेश में बलिया जिले के छपरा गांव में 19 अगस्त 1907 को जन्मे द्विवेदी जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत में ग्रहण की। सन 1930 में इंटरमीडिए
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हम कोई कहानी अथवा किताब क्यों पढ़ते हैं? पढ़कर यदि हम समझते हैं तो उस पर अमल क्यों नहीं करते हैं? हो सकता है कि इन दिनों मेरा दिमाग खराब हो गया हो. इसलिए शायद मैं बहकी-बहकी बातें सोचने लगा हूं. हर साल की तरह इस साल भी 31 जुलाई को हम प्रेमचंद जयंती मनाएंगे. उनकी कहानियों पर चर्चा करेंगे और शांत बैठ जाएंगे. हम उन कहानियों से कुछ सीखते क्यों नहीं हैं? यदि सीखना नहीं है तो फिर पढ़ना क्यों है
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जो लोग थोड़ा बहुत पंजाबी साहित्य को करीब से जानते हैं उनके लिए शिव कुमार बटालवी का नाम उतना अनजाना नहीं है.. लेकिन हिन्दी या अन्य भाषाओं के साहित्य जगत के लोगों के लिए बटालवी कुछ दिनों पहले तक बहुत नहीं जाने जाते थे.. कुछ साल पहले एक फिल्म आई उड़ता पंजाब.. और उसमें एक गीत इस्तेमाल किया गया... नए संदर्भों में... दर्द और तड़प से भरा हुआ... इक कुड़ी जि दा नां मोहब्बत.. गुम है..गुम है...गुम है.. ये गी�
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करीब 6 सदी पहले के भारत और मौजूदा हिन्दुस्तान के बीच के फासले को देखें तो लगता है कि अगर कबीर आज होते तो क्या आज हमारे आसपास का संसार ऐसा ही होता ? 6 सौ साल पहले वो जो लिख गए, उनका जो चिंतन और दर्शन या यों कहिए कि पंथ अपने आप में एक बेहतरीन दुनिया की कल्पना और सोच से भरा है, क्या अब भी हम ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं? दरअसल कबीर सिर्फ कबीर नहीं थे.. उन्हें युग प्रवर्तक यूं ही नहीं कहा जाता । आज
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कोरोना संकट में भी चारों तरफ हिंदू मुस्लिम चल रहा है। इस मुश्किल समय में भी नफरत की खेती करने के बजाय क्यों न मुस्लिम अंतर्मन को समझा जाए, इसीलिए शानी को पढ़ने बैठा हूं। जिस गांव में पैदा हुआ और पला बढ़ा, वहां केवल एक मुस्लिम परिवार था, जो बाद में कहीं दूसरी जगह चला गया। वकील मियां जब तक गांव में रहे, मुहर्रम पर तजिया भी गांव के लोगों के परिवार के सहयोग से ही निकलता था। लिहाजा मुसलमानों
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1974 आंदोलन को बहुत करीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त ने कालजयी रचनाकार फणीश्वर नाथ रेणु के साथ साथ उस दौर के तमाम साहित्यकारों को गहराई से महसूस किया है। अपने अनुभव और उस दौरान की स्थितियों के साथ मौजूदा हालात को बेबाकी से लिखने वाले जयशंकर गुप्त ने रेणु को उनकी पुण्यतिथि पर कुछ इस तरह याद किया। न्यूज़ पोर्टल न्यूज़ क्लिक में लिखे अपने संस्मरणात्मक लेख में उन्होंने ये
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वरिष्ठ पत्रकार और बीबीसी से लंबे वक्त तक जुड़े रहे क़ुरबान अली ने अपने शुरुआती दिनों में डॉ राही मासूम रज़ा के साथ कई मुलाकातें कीं, बहुत सा वक्त गुज़ारा... तब से लेकर आजतक देश के हालात को करीब से देखने वाले कुरबान अली ने डॉ रज़ा के गुज़रने के बाद ये आलेख संडे ऑब्जर्वर में लिखा था... उन्होंने डॉ राही मासूम रज़ा को कैसे देखा.. आप भी पढ़िए..
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डॉ राही मासूम रज़ा को लेकर संवाद ने कुंवरपाल सिंह का एक आलेख छापा है। दरअसल यह ‘राही मासूम रज़ा से दोस्ती : हिन्दुस्तानियत का पैग़ाम ’ नाम की किताब में लिखी कुंवरपाल सिंह की भूमिका है जिसमें डॉ रज़ा के बारे में बहुत सी बेहतरीन जानकारियां हैं। '7 रंग ' के पाठकों के लिए भी हम संवाद से यह लेख साभार ले रहे हैं।
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गुलज़ार साहब की नज़्में हों या उनकी कविताई का अंदाज़, उनकी ज़िंदगी के फ़लसफ़े हों या साहित्यिक शख्सियतों से उनकी मुलाकातों के किस्से... आप सुनेंगे तो सुनते रह जाएंगे... अमृता प्रीतम की सौंवी सालगिरह मनाते हुए उन्हें चाहने वाले बेशक अमृता जी को अपने अपने तरीके से याद कर रहे हैं, लेकिन ज़रा गुलज़ार साहब और अमृता जी की मुलाकात के ये किस्से भी पढ़िए...
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अथाह ज्ञान का भंडार रहे त्रिलोचन बातचीत करते करते साहित्य, संस्कृति और राजनीति के इतने आयाम बिखेर देते थे कि उन्हें समेट पाना मुश्किल हो जाता था। आप सवाल कविता पर कीजिए तो त्रिलोचन आपको कई देशों की समृद्ध साहित्यिक परंपरा का परिचय कराते हुए वहां की संस्कृति और राजनीति के बारे में बताएंगे और तब कविता पर आंएंगे। अब आप आपना सही उत्तर तलाश लीजिए। विचारों के धरातल पर आप इस 77 साल के नौजव�
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