वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोक दीप की नज़र में सर्वेश्वर

जाने माने पत्रकार और दिनमान के शुरुआती दिनों से ही अज्ञेय, रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जैसे साहित्यकारों के साथ काम करने वाले त्रिलोक दीप आज भी जब उन दिनों की याद करते हैं तो मानो वो सारी तस्वीरें सजीव हो जाती हैं। त्रिलोक जी ने 7 रंग से फोन पर अपने अनुभव साझा किए जिसे हम उनकी आवाज़ में पेश कर रहे हैं… साथ ही उन्होंने अपने फेसबुक पर उन दिनों के बारे में और सर्वेश्वर जी के साथ अपने अनुभवों के बारे में जो लिखा..वह भी पढ़िए…

त्रिलोक जी से सर्वेश्वर जी के बारे में हुई बातचीत आप इस लिंक पर सुन सकते हैं…

https://youtu.be/9vZZbqmvtjE

 

जब मैंने लोकसभा सचिवालय की नौकरी छोड़ ‘दिनमान’ से जुड़ने का निर्णय किया तो कुछ लोग मुझे डराने लगे। वहां बहुत दिग्गज हैं, तड़ीबाज हैं,धाँसू हैं वहां के माहौल में तुम अनफिट हो। बिन मांगे जबरन सलाह देने वाले ऐसे लोगों से पिंड छुड़ा कर मैं पहली जनवरी, 1966 में दिनमान से जुड़ गया ।मुझे वहां का वातावरण बहुत ही सुखद और सुकून भरा लगा। अज्ञेय जी ने सभी से मेरा परिचय कराया – मनोहर श्याम जोशी, जितेन्द्र गुप्त, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, श्रीकांत वर्मा, श्यामलाल शर्मा, योगराज थानी, रमेश वर्मा, जवाहरलाल कौल, श्रीमती शुक्ला रुद्र आदि। सर्वेश्वर जी ने मुझे अपने पास बिठाते हुए कहा, आप निश्चिंत होकर काम करें, भाई यानी अज्ञेय जी आपको लाये हैं , उनका सही पात्र आपको सिध्द करना होगा। सर्वेश्वर जी के मार्गदर्शन में काम शुरू कर दिया। जो कुछ लिखने को कहते लिख कर उन्हें या अज्ञेय जी को सौंप देता। हम लोग उन दिनों नयी बिल्डिंग यानी 7, बहादुर शाह जफर मार्ग में बैठा करते थे। हफ्ते में एक दिन के लिए मैं सर्वेश्वर जी के साथ 10,दरियागंज स्थित प्रेस जाता,उनके साथ गैलिया प्रूफ पढ़ता। आज जैसी कंप्यूटर व्यवस्था थी नहीं, हैण्ड कोम्पोज़ींग का ज़माना था। कुछ महीनों में उन्होँने मुझे दक्ष कर दिया था। सर्वेश्वर जी में एक सिफत और थी। प्रूफ पढ़ते पढ़ते कब वह किसी और दुनिया में पहुंच जायें, कह पाना मुश्किल है। एक बार मैं तो प्रूफ पढ़ने मे तल्लीन था और सर्वेश्वर जी प्रूफ वाली गैली के खाली स्थान पर कविता लिखे जा रहे थे। वह अपने आसपास के माहौल से बेखबर थे। कविता समाप्त करने के बाद बोले, काश भाई होते। अज्ञेय जी तब दिनमान छोड़ चुके थे ।

एक दिन बुरी खबर आयी सर्वेश्वर जी की पत्नी के निधन की। अज्ञेय जी सहित दिनमान के सभी लोग मॉडल टाउन स्थित उनके घर पहुंचे ।तब शायद कपिला जी भी आईं थीं । सर्वेश्वर जी अज्ञेय जी के कंधे पर सिर रखकर फफक फफक कर रो रहे थे ।पहली बार सर्वेश्वर जी को हम लोगों ने इस कद्र भावुक होते देखा था ।वह संवेदनशील तो थे लेकिन इस हद तक शायद उनके बच्चे भी नहीं जानते थे ।कपिला जी ने उन्हें दिलासा देते हुए समझाया कि अब इन दो अबोध बच्चियों विभा और शुभा को आपको संभालना है ।हिम्मत रखिये ।पत्नी के देहांत के बाद ही सर्वेश्वर जी ने मॉडल टाउन छोड़ने का फैसला ले लिया ।कुछ मित्रों की सहायता से उन्होने बंगाली मार्किट में एक मकान किराए पर ले लिया ।नयी बिल्डिंग से बंगाली मार्केट ज़्यादा दूर नहीं था ।फिर भी बच्चों की सुरक्षा की दृष्टि से वह घर पर फ़ोन लगवाना चाहते थे ।एक दिन बोले,’दीप,यह काम तुम्हीं कर सकते हो ।’मैंने महानगर टेलीफोन निगम के तब के महाप्रबंधक जौहरी साहब से बात की और अगले दिन सर्वेश्वर जी के साथ हम लोग खुर्शीदलाल भवन उनके ऑफ़िस पहुंच गये ।सर्वेश्वर जी को आया देख जौहरी साहब ने अपनी सीट से उठकर दोनों हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हुए कहा कि अहोभाग्य हमारे हैं ।हम सपरिवार आपकी कवितायें पढ़ते हैं और दिनमान भी ।उन्होँने तुरंत अपने एसडीओ को बुलाकर निर्देश दिया कि शाम तक सर्वेश्वर जी के घर फ़ोन की घंटी बज जानी चाहिए ।जौहरी साहब ने अपनी बात रखी और सर्वेश्वर जी ने अपने फ़ोन की पहली घंटी मुझे दी ।उन दिनों पत्रकारों और अधिकारियों तथा पत्रकारों और राजनेताओं के बीच परस्पर विश्वास का माहौल हुआ करता था जो दुर्भाग्य से आजकल देखने को नहीं मिलता ।

घर की तरफ से बेफिक्र हो सर्वेश्वर जी अपने काम में नयी उर्जा के साथ जुट गये ।वह अपने नियमित कॉलम के अलावा भी सभी विषयों पर लिखा करते थे सिवाय खेल और खिलाड़ी के ।साहित्य,कला,रंगमंच , पर्यटन तो उनके प्रिय कॉलम थे ही ।कभी कभी राजनीति पर भी लिख लिया करते थे ।किसी विशिष्ट व विख्यात व्यक्ति के प्रति श्रधान्जलि अर्पित करने के लिए उन दिनो obituary अक्सर सर्वेश्वर जी ही लिखा करते थे ।डॉ. कामिल बुल्के पर उनकी obituary की बहुत सराहना हुई थी ।’चरचे और चरखे’ वाला कॉलम उन्होंने बाद में शुरू किया था ।उनसे मिलने वाले दिन भर आया करते थे जिसकी वजह से कभी कभी उन्हें घर पर बैठ कर ही अपने कॉलम लिखने पड़ते थे ।उनके टेबल के आसपास अक्सर विनोद और कविता नागपाल, राम गोपाल बजाज,दिनेश ठाकुर,भानु भारती और साहित्यकारों में डॉ विद्यानिवास मिश्र,विजय देव नारायण साही ,शमशेर बहादुर सिंह, भगवतीशरण सिंह, शिक्षाविद कृष्णकुमार,चित्रकार राम कुमार आदि बैठे हुए देखे जाते थे । एक समारोह में अशोक चक्रधर मिले और बोले कि’ आज भी सर्वेश्वर जी की बहुत याद आती है । उनके साथ जुड़ी बहुत सी यादें हैं ।’1977 में मैं तत्कालीन सोवियत संघ की यात्रा पर जा रहा था । उन्हें जब मैंने यह खबर दी तो उन्होंने अपनी एक पुस्तक ‘कुछ रंग कुछ गंध ‘देते हुए लिखा ‘दीप जी को सोवियत संघ यात्रा के पूर्व , सप्रेम भेंट।सर्वेश्वर 25.7.17. । उन्होंने 1972 में वहां की यात्रा की थी सोवियत लेखक संघ के निमंत्रण पर पुश्किन काव्य समारोह में भाग लेने के लिये ।

सर्वेश्वर जी केवल बेहतरीन कवि ही नहीं थे उनकी ‘काठ की घन्टियां ‘ पुस्तक में अज्ञेय जी ने अपनी भूमिका मे एक जगह लिखा है कि ‘इस पुस्तक में कहानियों,कविताओं और उपन्यास को एक साथ छापा गया है । अज्ञेय लिखते हैं कि’ कहानीकार और कवि दोनॉ ही देशकाल से बंधे हैं ।किन्तु निरपवाद होने का आग्रह न किया जाये तो यह कहा जा सकता है कि कहानीकार की दृष्टि देश की ओर अधिक रहती है और कवि के कान,काल की झनकार की ओर अधिक लगे रहते हैं ।दूसरे शब्दों में कहानीकार का संदर्भ समाज और उसका विस्तार होता है,कवि का संदर्भ जीवन और उसकी गहराई ।इस दृष्टि से भी सर्वेश्वर पहले कवि हैं ।’ सर्वेश्वर जी अज्ञेय जी को बहुत मिस किया करते थे ।बेशक़ रघुवीर सहाय उनके गुरु भाई थे लेकिन उन में वह अज्ञेय का अक्स नहीं देख पाते थे ।जिस तरह बेझिझक और बेबाकी से अज्ञेय से अपनी बात वह कहते थे रघुवीर जी के साथ उनका उस तरह का रिश्ता नहीं बन पाया था । खुले तौर पर तो उनके बीच किसी तरह का तनाव या दुराव परिलक्षित नहीं होता था लेकिन भीतर ही भीतर कोई ऐंठन तो थी ही ।दोनों शब्दों के जादूगर थे इसलिए बाहर के किसी व्यक्ति के लिए यह झीनी-सी ऐंठ का पता लगा पाना न सहज था और न सरल ही ।उन के बुनियादी रिश्ते सामान्य थे ।

सर्वेश्वर जी और श्यामलाल शर्मा के बीच स्वस्थ नोकझोंक सुबह ऑफ़िस आते ही शुरू हो जाती थी ।कैसे हो श्यामलाल जी ।कैसे हैं आपके इमाम अब्दुल्ला बुखारी ।आजकल तुम्हरा उधर जाना नहीं होता क्या? श्यामलाल जी जवाब देते ।आते जाते रहते हैं ।सर्वेश्वर जी कहते नहीं ,मैंने वैसे ही पूछ लिया ।आजकल तुम्हारे कपड़े साफ सुधरे हैं ।वहाँ से आते हो तो कपड़ों पर शोरबे के दाग होते हैं ।कभी कहेंगे और भाई श्यामलाल चाय पियोगे।जब वह कभी जवाब नहीं देते तो कहते नंदन ने पिला दी होगी ।दोनों के बीच की चुहलबाज़ी से दफ्तर का माहौल बोझिल नहीं लगता था ।सभी लोग दोनों की बातचीत का आनंद लिया करते थे । चंचल उनके दूसरे चहेते थे ।उन्हें वह पंडित कह कर संबोधित किया करते थे । चंचल उन्हें बहुत मानते हैं । चंचल ने’ दिनमान’ में रह कर पत्रिका का लेआउट बनाया,रेखाकन बनाये,लेखन कार्य किया और वह बेहतरीन पेंटेर हैं ।सर्वेश्वर जी के सभी आदेशों-निर्देशों को वह शिरोधार्य किया करते थे ।सर्वेश्वर जी ‘पराग ‘बाल पत्रिका को संपादित भी करते रहे हैं ।उस में बच्चों के लिए बाल कवितायें लिखीं और नर्सरी में पढ़ाई जाने वाली कविताएं भी । जब मैंने ‘संडे मेल ‘ जाने का मन बनाया और इस बाबत उनसे बात की तो उनहोंने अपनी शुभकामनाएं देते हुए कहा था कि अब वह ‘दिनमान ‘ तो रहा नहीं जिस में भाई तम्हें लाये थे।अपने पिता को उनकी दोनों बेटियां विभा और शुभा सदा ही मिस करती हैं लेकिन उनके जन्मदिन पर वह गरीबों को खाना खिलाना नहीं भूलतीं और न ही ज़रूरतमंदों की मदद करना ।वृधों और अपंग लोगों की कपड़ों से भी सहायता करती हैं ।आज उनके 94वे जन्मदिन पर मेरा सादर नमन ।

Posted Date:

September 15, 2020

8:26 pm Tags: , , ,

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