पाश : हमारे वक्त का ‘सबसे खतरनाक कवि’

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हम लड़ेंगे
कि लड़ने के बग़ैर कुछ भी नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सज़ा कबूलने के लिए
लड़ते हुए मर जानेवालों
की याद ज़िन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे साथी… 

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ये पंक्तियां चंद मिसालें हैं.. अवतार सिंह पाश के भीतर धधकती आग की… महज़ 38 साल की छोटी सी जिंदगी में पाश ने इतना कुछ लिख डाला और उनकी हर लाइन में एक बेहतर समाज का सपना, बदलाव की छटपटाहट और क्रांति का एक ऐसा जज्बा नजर आया कि पंजाब के इस नौजवान कवि की तुलना चिली के मशहूर क्रांतिकारी कवि पाब्लो नेरुदा से की जाने लगी…

अवतार सिंह संधू यानी पाश 9 सितंबर 1950 में जालंधर के तलवंडी सलेम गांव में जन्में। पिता सोहन सिंह संधू फौज में थे और बेटा नन्हीं सी उम्र में ही कलम में बारूद भरने लगा था।

यह संभव है कि उज्जवला योजना का मुफ्त सिलेंडर खत्म हो जाए और फिर कभी रिफिल न हो; या नाम पर चढ़ जाए और कभी घर ही न पहुंचे; यह भी संभव है कि जंगल की किसी लकड़ी पर गरीब का हक न रहे; मगर पाश की कविताएं वह चिंगारी हैं, जो हर बुझे चूल्हे को उस धुएं के साथ सुलगाती हैं, जो बहुत जल्द उड़कर दिल्ली पहुंच जाता है। गरीब के चूल्हे से उठे हर धुएं से दिल्ली का दम घुटता है। वहां इसे प्रदूषण माना जाता है और सत्ता के गलियारों में ‘अर्बन नक्सल’ का शोर मच जाता है। संगीनें निकल आती हैं। नेता राजनीति करने निकल पड़ते हैं।

कविता की इस आग पर गरीब की रोटी ही सिक सकती है, जो राजनीति की रोटी सेंकना चाहते हैं, वे सिर्फ अपने हाथ जलाते हैं। यही आग कवि का हुनर है, जो उसे क्रांतिकारी का दर्जा देती है।

सितंबर साल का नौंवा महीना है। भारत के लिए यह बदलाव और क्रांति की उम्मीदों का महीना है। मौसम यहीं से करवट लेता है। 28 सितंबर को भगत सिंह का जन्मदिन आता है। सन 1950 में इसी महीने की 9 तारीख को जालंधर के तलवंडी सलेम गांव में अवतार सिंह संधू का जन्म हुआ, जिस पर पंजाबी कविता पाश के नाम से गर्व करती है।

भाषणबाज नेताओं के लिए पाश आफत थे। खतरा थे। वह उनके सत्तालोलुप मंसूबों के रास्ते के बीच एक ‘लोहकथा’ थे। पाश ने बड़ी बेबाकी से ऐसे नेताओं को बताया कि तुम्हारे भाषणों और गरीब के दुख-दर्द की भाषा एक नहीं है। तुम्हारी सरकार की भाषा भी हमारे मन की भाषा से मेल नहीं खाती। पाश ने कभी अपने मन की बात नहीं कही, वह हमेशा गरीब-मजलूमों के मन के बात कहते रहे -:

“अलग हुंदी है भाषा भाषणा दी सदा

पर रौंदियां मांवां ते भैणा (बहनों) दी भाष इक हुंदी है

अलग हुंदी है भाषा जो भरी मरदमशुमारी दे रजिस्टर विच

घरां तो उठदियां वैणा (मातम का रुदन) दी भाषा इक हुंदी है।

उन्होंने ने समाज के दबे-कुचले तबके को बताया कि जमींदार तुम्हारी फसल छीन लेता है, यह ख़तरनाक नहीं है। उसके मुट्ठी गर्म करने पर पुलिस झूठे आरोप में तुम्हें पकड़ती है। पीटती है। यह भी उतना ख़तरनाक नहीं है, सबसे ख़तरनाक यह है कि तुम्हारे सपने मर चुके हैं – :

‘किरत दी लुट्ट सब तों खतरनाक नहीं हुंदी

पुलस दी कुट्ट सब तों खतरनाक नहीं हुंदी

गद्दारी लोभ दी मुठ सब तों खतरनाक नहीं हुंदी

बैठे सुत्तियां फड़े जाना- बुरा तां है

डरू जिही चुप्प विच मड़े जाना – बुरा तां है

सब तों खतरनाक नहीं हुंदा

कपट दे शोर विच

सही हुंदियां वी दब जाणा, बुरा तां है

किसी जुगनू दी लोअ विच पड़न लग जाणा- बुरा तां है

सब तों खतरनाक नहीं हुंदा।

सब तों खतरनाक हुंदा है

मुरदा शांति नाल भर जाना,

ना होणा तड़प दा, सब सहन कर जाना

घरां तो निकलना कम्म ते

ते कम्म तों घर जाणा,

सब तों खतरनाक हुंदा है

साडे सुपिनयां दा मर जाणा।’

साठ-सत्तर का दशक पंजाब में नक्सली आंदोलन के उभार का समय था। हरित क्रांति हो रही थी मगर इसके सारे लाभ मुट्ठीभर जमींदारों तक सीमित थे। गरीब मजदूरों के हिस्से में कड़ी मेहनत, धूप में झुलसे शरीर, फटी बिवाई और रिसते जख्म थे। उस दौर में गांव तलवंडी सलेम में फौजी सोहन सिंह संधू का 18 साल का बेटा अवतार इन भूमिहीन मजदूरों की कविता लिखने लगा था। पिता सोहन सिंह भी कविता लिखने के शौकीन थे। उनकी कविताएं सरहद पर रखवाली के एकाकी पलों से पैदा होती थीं। दूसरी ओर संयुक्त किसान परिवार में पल रहा बेटा अवतार अपने आसपास की हर चीज को समझ रहा था। दुखियारे लोगों के लिए तड़प रहा था। यही तड़प शब्दों में ढल रही थी और कविता बन रही थी। 1970 में  20 वर्ष की उम्र में अवतार सिंह पाश का पहला कविता संग्रह ‘लोहकथा’ आया। हर कविता सत्ता में बैठे लोगों का सकून छीन लेने वाली थी। हर शब्द मेहनतकश के लिए उसका हिस्सा मांग रहा था। सरकार को उनके विचार इतने उत्तेजक लगे कि उन्हें झूठे आरोप में जेल में डाल दिया गया। वह जेल में भी कविताएं लिखते रहे-

‘मैं सलाम करदा हां

आदमी दे मिहनत विच लग्गे रहिन नूं

मैं सलाम करदा हां

आउनवाले खुशगवार मौसमां नू।’

करीब दो साल बाद जेल से रिहा हुए और रिहा होते ही 1972 में पाश पंजाब के नक्सल आंदोलन से जुड़ गए। उन्होंने रसाला ‘सिराह’ संपादक की हैसियत से शुरू किया। सिराह शब्द का अर्थ होता है हल के फल की नोक से खेत में बनी कतार, जिसमें बीज डाले जाते हैं। 1973 में उनका दूसरा कविता संग्रह ‘उडदेयां बाजां मगर’ यानी उड़ते बाजों के पीछे और 1978 में तीसरा ‘साड्डे समयां विच आया’! उनकी प्रसिद्धि पंजाब और देश के बाहर पहुंच चुकी थी।

आजकल जैसे देश में हिंदू राज की बातें हो रही हैं, अस्सी के दशक में पंजाब में कुछ दक्षिणपंथी अलग खालसा राज की मांग करने लगे थे। फर्क इतना है कि अब हिंदू राज की बात कहने वाले दक्षिणपंथी झुंड में निकलते हैं और लाठी-डंडों से खास तबके को किसी अकेले-दुकेले को निशाना बनाकर लिंचिंग करते हैं। मगर तब खालसा राज की मांग करनेवाले दक्षिणपंथी एके-47 लेकर एक-दो की संख्या में निकलते थे और भीड़ को निशाना बनाते थे। लोगों को बसों से उतार कर गोली मारी देते थे। वह दहशतगर्दी का समय था।

हिंसा के उस दौर में जब कुछ पत्रकारों को छोड़कर, अच्छे-अच्छे साहित्यकारों की हिम्मत जवाब दे गई थी और कलमें खामोश हो गई थीं, तब पाश ने  भिंडरावाले को संबोधित करते हुए एक व्यंग्य कविता लिखी “धर्म दीक्षा के लिए निवेदन पत्र’। उन्होंने आतंकियों को भी सीधे चुनौती दी, मैं तो घास हूं, तुम्हारे हर किये कराये पर उग आऊंगा।

सन 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब एक कौम को निशाना बनाकर दंगे हुए तब भी पाश ने उतनी ही बेबाकी और साहस से लिखा -:

‘…मैंने उम्र भर उसके खिलाफ सोचा और लिखा है

अगर आज उसके शोक में सारा देश शामिल है

तो इस देश से मेरा नाम काट दो

मैं उस पायलट की धूर्त आँखों में चुभता हुआ भारत हूं।

हाँ मैं भारत हूं’ चुभता हुआ उसकी आंखों में

अगर उसका अपना कोई खानदानी भारत है

तो मेरा नाम उसमें से अभी काट दो’

(पाश के बारे में और जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें….https://youtu.be/ml73x_BYkno )

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पंजाब में आतंकवाद तेजी से बढ़ रहा था। अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड से फंड आ रहा था और पाकिस्तान से हथियार। कनाडा और अमेरिका आतंकवादियों को शरणार्थी मानकर शरण दे रहे थे। ऐसे में 1985 में पाश ने पहले इंग्लैंड और फिर अमेरिका जाकर आतंकवाद की जड़ों पर सीधे वैचारिक प्रहार किया। अमेरिका जाकर तो वह बिना डरे और हिचकिचाए उस पंजाबी संपादक के घर पर जाकर ठहर गये, जिसे अमेरिका में आतंकवादी लहर का प्रवक्ता माना जाता था।

अमेरिका में उन्होंने आतंकवाद की विचारधारा के खिलाफ ‘एंटी-47’ फ्रंट बनाया। यहां 47 असल में एके-47 का प्रतीक था। इसी नाम से मैगजीन भी शुरू की। उनके इस प्रयास से पहली बार विदेश में बसे पंजाब के लोग आतंकवाद की विचारधारा के खिलाफ एकजुट होना शुरू हुए।  डेढ़ साल बाद वह भारत लौटे। तब इंसान को गुलाम बनाने की प्रवृत्ति के खिलाफ उनकी कलम शोले उगल रही थी -:

‘मेरी बुलबुल अपने कम्म हुण कुझ होर तरां दे हन

हुण आपां जीन वरगी हर शर्त नू हार चुके हां

मैं हुण बंदे दी बजाय घोड़ा बनना चाहूंदा हां

इन्ना इनसानी हड्डां ते तां काठी बहुत चुभदी है’

पाश की हत्या से चंद रोज पहले तलवंडी सलेम के पास मल्लियां गांव में 4 प्रवासी खेत-मजदूरों की दहशतगर्दों ने हत्या कर दी। पाश मौके पर गया और वहां उसने गांव वालों के सामने चिल्लाकर कहा, “काश! जे मैं हुंदा तां उन्हां थे टुट पैना सी”  (काश! मैं यहां होता तो उन कातिलों पर टूट पड़ता। दहशतगर्दों को यह उसकी खुली ललकार थी।

23 मार्च  1931 को अंग्रेजों ने देश से भगतसिंह को छीना था। सन 1988 में इसी दिन गांव के ट्यूबवैल पर नहाने जा रहे पाश की छुपकर आए आतंकियों ने पीठ पर गोलियां बरसाकर हत्या कर दी। वे उससे नजरें नहीं मिला सकते थे।

24 मार्च 1988 को पाश को फिर से अमेरिका रवाना होना था,  आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक वैचारिक युद्ध के लिए। मगर खौफजदा आतंकियों ने उसे पहले ही मार डाला। पाश ने अपनी मौत की बात बहुत पहले ही लिख दी थी  -:

‘मैंने सुना है कि

मेरे क़त्ल का

मंसूबा राजधानी में मेरी

पैदाइश से पहले ही

बन चुका था’

पाश की मौत के बाद उनकी कविताओं का एक और संग्रह ‘खिलरे होए वरके’ प्रकाशित हुआ। वह अपने पीछे एक सवाल छोड़ गये कि आखिर लोहे को बम और बंदूक की शक्ल क्यों लेनी पड़ी? इस पर समाज को विचार करना चाहिए -:

‘लेकिन आखिर लोहे को,

बंदूकों और बमों की

शक्‍ल लेनी पडी है

आप लोहे की चमक में चुंधियाकर

अपनी बेटी को बीबी समझ सकते हैं,

(लेकिन) मैं लो‍हे की आंख से

दोस्‍तों के मुखौटे पहने दुश्‍मन भी पहचान सकता हूं

क्‍योंकि मैंने लोहा खाया है

आप लोहे की बात करते हो’।

आलेख — सुधीर राघव (वरिष्ठ पत्रकार)

Posted Date:

September 9, 2020

11:32 am Tags: , , , , ,

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