
कायस्थों का खाना-पीना (चौथी कड़ी)
--- संजय श्रीवास्तव

कहा जाता है कि जिन दिनों अंग्रेजों के जमाने में दिल्ली देश की राजधानी के तौर पर एक बड़ा शहर बन रहा था,तब राजस्थान के कुछ माथुर यहां आकर बसे. जिन्होंने का

1974 आंदोलन को बहुत करीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त ने कालजयी रचनाकार फणीश्वर नाथ रेणु के साथ साथ उस दौर के तमाम साहित्यकारों को गहराई से महसूस किया है। अपने अनुभव और उस दौरान की स्थितियों के साथ मौजूदा हालात को बेबाकी से लिखने वाले जयशंकर गुप्त ने रेणु को उनकी पुण्यतिथि पर कुछ इस तरह याद किया। न्यूज़ पोर्टल न्यूज़ क्लिक में



नेशनल गैलरी ऑफ माडर्न आर्ट में जामिनी रॉय के चित्रों का खास संग्रह आप देख सकते हैं।
कायस्थों का खान-पान (तीसरी कड़ी)
-- संजय श्रीवास्तव
खाना अक्सर पुरानी यादों को जोड़ता है. ये भी कहते हैं कि खाना एक-दूसरे को जोड़ता है. खाना हमारे तौरतरीकों, लिहाज और परंपराओं को जाहिर करता है. कायस्थों का खाना भी ऐसा ही है. हम आज जो खाते-पीते हैं, वो कई कल्चर्स का फ्यूजन है. ये विदेशी व्यापारियों,

बेशक गांधी जी देश के लिए महात्मा और राष्ट्रपिता हों, लेकिन अगर कस्तूरबा गांधी का सहयोग, साथ और भरोसा उन्हें नहीं मिलता तो शायद आज गांधी जी की ये स्वीकार्यता न होती। आम तौर पर कस्तूरबा गांधी भुला दी गई हैं, उनके योगदान को उस तरह शायद नहीं समझा गया और उस दौर के भारतीय रूढ़ीवादी समाज में जिस तरह महिलाओं को त्याग की मूर्ति, पतिव्रता और पुरुषों की त

विजय विनीत एक बेहतरीन और समर्पित पत्रकार हैं। जनसरोकार की पत्रकारिता करने वाले विजय विनीत इन दिनों वाराणसी में जनसंदेश टाइम्स के राजनीतिक संपादक हैं। वाराणसी और आसपास के इलाकों से वहां की संस्कृति, समाज, सियासत और आम आदमी से जुड़ी बेहतरीन खबरें भेजते हैं, सरकार और प्रशासन से डरकर काम नहीं करते। कई बार धमकियां भी मिलीं, मुकदम


शास्त्रीय गायन में उनकी आवाज़, किसी राग के भीतर तक उतर जाने और श्रोताओं को एक नई दुनिया में ले जाने की उनकी कला का जवाब नहीं था। किशोरी अमोनकर अगर आज होतीं तो 89 बरस की हो रही होतीं... 10 अप्रैल 1931 को मुंबई

कायस्थों का खाना-पीना (दूसरी कड़ी)
-- संजय श्रीवास्तव


चाहे खेल हो, संस्कृति हो, परंपराएं हों या फिर इतिहास के पन्नों में बिखरी ढेर सारी जानकारियां वरिष्ठ पत्रकार संजय श्रीवास्तव बहुत बारीकी से उनपर नज़र डालते हैं। इन दिनों अपने फेसबुक वॉल पर कायस्थों के खान-पान पर अपनी शोधपरक और दिलचस्प जानकारियों के साथ कुछ कड़ियां लिख रहे हैं। हालांकि अब कायस्थ के तमाम परिवार इन परंपरागत खान पान से दूर हो चुके

आज के दौर में पत्रकारिता जिस दौर में पहुंच चुकी है, उसमें इस पेशे में रहकर अपनी भीतर की संवेदनशीलता और दृष्टि को बचाकर रखना एक चुनौती से कम नहीं... जो लोग इस चुनौती को कबूल करते हैं उनमें से एक अहम नाम है प्रभात सिंह का... लंबे समय तक 'अमर उजाला 'के ज़िम्मेदार पदों पर रहने के बाद अब वह अपने मन की पत्रकारिता कर रहे हैं अपनी वेबसाइट संव