कस्तूरबा गांधी को याद करने के मायने…

बेशक गांधी जी देश के लिए महात्मा और राष्ट्रपिता हों, लेकिन अगर कस्तूरबा गांधी का सहयोग, साथ और भरोसा उन्हें नहीं मिलता तो शायद आज गांधी जी की ये स्वीकार्यता न होती। आम तौर पर कस्तूरबा गांधी भुला दी गई हैं, उनके योगदान को उस तरह शायद नहीं समझा गया और उस दौर के भारतीय रूढ़ीवादी समाज में जिस तरह महिलाओं को त्याग की मूर्ति, पतिव्रता और पुरुषों की तमाम कमियों के बावजूद उन्हें आगे बढ़ने में मदद करने वाली माना जाता रहा, उसमें कस्तूरबा का व्यक्तित्व उस तरह से उभर कर आ नहीं पाया।

उनके जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए हम एक बार फिर नीलिमा डालमिया आधार की उस किताब की चर्चा करेंगे जिसमें उन्होंने कस्तूरबा गांधी के जीवन के उन पहलुओं को सामने लाने की दस्तावेजी कोशिश की है, जो आम तौर पर कोई नहीं जानता। ये किताब एक तरह से कस्तूरबा गांधी की डायरी है। एक डायरी में वो तमाम घटनाएं, भावनाएं, सोच और निजी जानकारियां होती हैं जो अगर ईमानदारी से लिखी जाए तो आपके पूरे व्यक्तित्व का आईना होती है।

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कस्तूरबा गांधी 11 अप्रैल 1889 को उसी पोरबंदर में पैदा हुई थीं जहां तकरीबन 6 महीने बाद 2 अक्तूबर को मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म हुआ। यानी गांधी जी से छह महीने बड़ी थीं कस्तूरबा। उस ज़माने में लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाता था और बचपन में ही शादी कर दी जाती थी। कस्तूरबा की सगाई भी मोहनदास के साथ 7 साल की उम्र में हो गई और 13 साल की उम्र में शादी। शादी के बाद कुछ सालों तक उन्हें भी परंपरागत तरीके से घर में ही रहने को कहा जाता और गांधी जी नहीं चाहते थे कि वो उनकी मर्ज़ी के बगैर कोई भी काम करें। लेकिन कस्तूरबा ने उस वक्त से ही खुद को एक मज़बूत और आज़ाद ख्यालों वाली, लेकिन पारिवारिक और पति की ज़रूरतों और इच्छाओं को समझने वाली एक अलग व्यक्तित्व का धनी बनाया।

तेरह साल की उम्र में शादी के कुछ समय बाद का चित्र

दक्षिण अफ्रीका से लोटने के बाद जब गांधी जी की सोच और व्यक्तित्व में जो बदलाव आया और अंग्रेज़ों के खिलाफ जिस तरह उन्होंने तमाम आंदोलनों के साथ अपना एक चिंतन और दर्शन विकसित किया, बेशक उसमें भी कस्तूरबा गांधी की अहम भूमिका थी। देश की हालत, महिलाओं की स्थिति और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण सवालों पर कस्तूरबा गांधी ने अपनी समाजसेवा की एक खास शैली विकसित की। जहां संवेदना के साथ साथ आत्मनिर्भरता की अद्भुत प्रेरणा थी।

महिला शिक्षा की उनकी इसी कोशिश को समझते हुए, आज़ादी के कई दशक बाद 2004 में सरकार ने उनके नाम से एक योजना शुरु की कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय योजना। इसे सर्व शिक्षा अभियान के तहत जोड़ा गया और इसकी खासियत थी कि इसके ज़रिये अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े वर्ग की लड़कियों को मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराई जाए, पढ़ाई के साथ उनके हुनर को विकसित किया जाए। अब उस योजना की ज़मीनी हकीकत क्या है, यह तो जांच का विषय है, लेकिन हमारी सरकारें जैसे तमाम लोगों को याद करती हैं, उसी तरह एक कोशिश कस्तूरबा गांधी के नाम को ज़िंदा रखने के लिए ज़रूर की गई।

बहरहाल उनके बारे में बहुत सी बाते हैं जो आज भी उन्हें सामयिक बनाती हैं और सामंती- रूढ़िवादी सोच से ऊपर उठकर महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे लाने और उनकी ताकत और ज़रूरत को समझने में मदद करती हैं। कस्तूरबा गांधी को 7 रंग परिवार की ओर से नमन।

Posted Date:

April 11, 2020

9:24 am Tags: , , ,

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