

वो जहां जाते थे, जिससे मिलते थे, सबके बहुत अपने हो जाते थे... उनकी सादगी और संघर्ष की कहानियां तमाम हैं... हर साथी की अपनी अपनी यादें हैं, अपने अपने अनुभव हैं... सबके लिए वो चितरंजन भाई थे.. हमारे लिए भी... गमछा गले में लपेटे या कभी कभार पगड़ी की तरह बांध लेते, पान खाते, गोल मुंहवाले बहुत ही प्यारे से लेकिन सबके संघर्ष के साथी... खुद की तकलीफों की कभी परवाह नहीं की... बातें करने से ज्याद

कविता पोस्टर एक कला है और प्रगतिशील आंदोलन का एक मजबूत हथियार ♦ रवीन्द्र त्रिपाठी पिछले तीस पैंतीस बरसों से हिंदी भाषी इलाके में कविता को लेकर एक नई तरह की उत्सुकता पैदा हुई है। कविता पोस्टरों के रूप में। कई ऐसे कविता प्रेमी सामने आए हैं जो कविताओं या काव्य पंक्तियों के पोस्टर बनाते हैं। कुछ इनकी प्रदर्शनियां भी लगाते हैं। कुछ, बल्कि ज्यादातर, स�


आनंद मोहन जुत्शी उर्फ गुलज़ार देहलवी साहब बेशक 94साल के रहे हों, लेकिन उनके भीतर का शायर बदस्तूर अपनी पूरी रवानगी के साथ मौजूद था। उनके गुज़रने से दिल्ली वालों का अज़ीम शायर तो चला ही गया, शायरी की दुनिया का वो शख्स भी चला गया जिसकी मौजूदगी का एहसास हर आम ओ खास महफ़िल में ज़रूर होता था। गुलज़ार देहलवी साहब तमाम मंचीय शायरों की उस फ़ौज का हिस्सा नहीं थे, जिनकी मार्केटिंग औ�

दिल्ली में आखिर किस हाल में हैं रहीम... चलिए, लॉकडाउन में देखते हैं...
♦ सुधीर राघव
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय।
टूटे पे फिर न जुरे, जुरे गांठ परी जाय।।
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