‘नेपाल आता हूं, तो लगता है घर में बांसुरी बजा रहा हूं’

82 साल के हो गए बांसुरी के पर्याय बन चुके पंडित हरिप्रसाद चौरसिया

  • अतुल सिन्हा

अभी एक साल भी नहीं बीता है… भारत के 73वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मशहूर बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया कांठमांडू गए तो उनका वहां के तमाम युवा कलाकारों ने बांसुरी बजाकर अभिनंदन किया, भारतीय दूतावास की ओर से आयोजित उनके शो में नेपाल के उप प्रधानमंत्री से लेकर विदेश मंत्री और तमाम मंत्रिगण मौजूद रहे, पूरा हॉल तालियों से गूंज रहा था… नेपाल और भारत के बीच पारंपरिक सांस्कृतिक रिश्तों की एक अद्भुत मिसाल नज़र आ रही थी।

लेकिन इन चंद महीनों में बहुत कुछ बदल गया। नेपाल और भारत के रिश्तों में खटास आ गई। कोरोना काल के पिछले 4-5 महीनों में तो हालात बद से बदतर हो गए। ऐसे वक्त में अगर उस दौरान पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की बातों को याद करें और आज के हालात देखें तो वो चर्चित गीत की पंक्तियां याद आ जाती हैं… ‘वो जो कहते थे, बिछड़ेंगे हम ना कभी, बेवफा हो गए देखते देखते.. क्या से क्या हो गए देखते देखते।‘

‘अगली बार नेपाल आउंगा तो लगता है हर हाथ में बांसुरी होगी’

पंडित हरिप्रसाद चौरसिया 82 साल के हो गए। इस दौरान कई दफा नेपाल गए। लेकिन 81 साल की उम्र में पिछले साल अगस्त में उन्होंने वहां जाकर संगीत का जो समां बांधा, बांसुरी पर जो धुनें सुनाईं, उससे सरहदों की सारी दीवारें खत्म हो गईं… बाद में दूरदर्शन न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा – हमें तो भारत-नेपाल में कभी कोई फर्क नहीं लगता, लगता है अपने घर में बजा रहा हूं। यहां के लोगों में भी संगीत से और खासकर बांसुरी से खासा प्रेम है। बांसुरी एक माध्यम है. भारत और नेपाल में कोई फर्क है ही नहीं। चेहरे एक से हैं, भाषा एक सी है, खाना एक सा है। मुझे लगता ही नहीं कि कोई अलगाव है।

लेकिन ज़मीन के चंद टुकड़े के साथ अपनी अस्मिता को लेकर जो संघर्ष शुरु हुआ, उसने एक सदियों पुराने दोस्ती के रिश्तों में आज दरार ला दी। बेशक हरिप्रसाद चौरसिया सरीखे तमाम शख्सियतों के लिए ये दिल में चुभने वाला माहौल है।

हर मर्ज़ का इलाज है संगीत

हालात चाहे जैसे भी हों, लेकिन संगीत सभी मर्ज़ का इलाज है। पंडित हरिप्रसाद चौरसिया 82 साल की उम्र में भी लगातार रियाज़ करते हैं। कोई दिन ऐसा नहीं होता जब उनकी फूंक कई तरह की छोटी बड़ी बांसुरियों से कोई धुन न छेड़ दे। 1952 में पहली बार आकाशवाणी के साथ बाकायदा अपना करियर शुरु करने वाले पंडित जी को इस बात की तकलीफ है कि अब आकाशवाणी से बांसुरी या संगीत कहीं किनारे हो गया है, संगीत के नए कार्यक्रम नहीं बनते और पुराने रिकॉर्ड ही गाहे बगाहे चला करते हैं। पहले संगीत ही आकाशवाणी की खास पहचान होती थी, लेकिन अब उसका चेहरा भी बदल गया है, लेकिन फिर भी लगता है कि आकाशवाणी मेरा घर है।

एक जुलाई 1938 को प्रयागराज में जन्में हरिप्रसाद चौरसिया को उनके पिता छेदीलाल चौरसिया अपनी तरह पहलवान बनाना चाहते थे। लेकिन 5 साल की नन्हीं उम्र में मां के गुजर जाने के बाद से उनके भीतर का अकेलापन उन्हें संगीत की तरफ खींच लाया। उनके घर में संगीत का कोई माहौल भले ही न रहा हो, लेकिन उनके पड़ोस से आने वाली संगीत की धुन हमेशा उनके कानों में गूंजती और उन्हें रोमांचित करती। उनके पड़ोसी थे उस वक्त के संगीतप्रेमी राजाराम जी। नन्हे हरिप्रसाद जी के लिए राजाराम जी की शागिर्दी से बढ़कर कुछ नहीं था। उनसे ही संगीत की बारीकियां सीखीं और बाद में बनारस चले गए और पंडित भोलेनाथ प्रसन्ना जैसे मशहूर बांसुरीवादक ने उनके हुनर को तराशा। आखिरकार उनकी जिद और लगन ने उनके भीतर एक ऐसे कलाकार को आकार देना शुरु किया जिसका कोई सानी नहीं था। चंद ही सालों में उनकी बांसुरी की धुनें दुनिया के तमाम देशों में गूंजने लगीं। बाद के दिनों में संतूर के सबसे बड़े कलाकार पंडित शिवकुमार शर्मा के साथ उनकी जोड़ी ने शिव हरि के नाम से सिलसिला, चांदनी, लम्हे, जर जैसी फिल्मों में संगीत दिया और फिल्म संगीत में नए शास्त्रीय प्रयोग किए। लेकिन उन्हें वो दुनिया कुछ रास नहीं आई और लगने लगा कि फिल्मवाले जाने किस तरह का संगीत चाहते हैं, जिसका संगीत की मूल आत्मा से कोई खास सरोकार नहीं होता। वहां तो साउंडट्रैक का अपना संसार है।

बहरहाल शास्त्रीय संगीत की तो अपनी ही दुनिया होती है और उसके पारखी भी अलग ही होते हैं। सम्मानों की लंबी फेहरिस्त तो पंडित जी के साथ है ही, पद्मभूषण, पद्मविभूषण के अलावा देश विदेश के तमाम अहम सम्मान उन्हें मिले।

सबसे खास बात ये है कि अब भी उन्हें यही लगता है कि उनके लिए हर दिन एक नया दिन है, कुछ न कुछ नया सीखने और करने का दिन है। वो अब भी खुद को एक छात्र मानते हैं, लेकिन ये चाहते हैं कि नई पीढ़ी संगीत की आत्मा को, इसकी शुद्धता को समझे, इसे आत्मसात करे, हर हाथ में बांसुरी हो, जीवन का संगीत हो, और दुनिया के तमाम तनावों से दूर एक बेहतर खुशहाल दुनिया हो… ‘राग देस’ की गहराइयों की तरह…. ।

पंडित हरिप्रसाद चौरसिया को उनके 82वें जन्मदिन पर 7 रंग परिवार की सादर शुभकामनाएं…

Posted Date:

July 1, 2020

6:11 pm Tags: , , , , , , ,

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