फोसवाल महोत्सव में सामने आए साहित्य, संस्कृति की मौजूदा चिंतन के कई रंगनई दिल्ली:एक तरफ देश में चुनावी नतीजों के बाद सियासी सरगर्मियां तेज़ हैं, दूसरी तरफ इससे अलग साहित्य और संस्कृति की दुनिया में कुछ नई और रचनात्मक कोशिशें जारी हैं। सार्क देशों के
नई दिल्ली: साहित्य और कला को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता। पड़ोसी देशों की कला, साहित्य और संस्कृति को
एक मंच पर लाने वाला फोसवाल साहित्य महोत्सव इस बार 3 से 6 दिसंबर तक नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा
है। फोसवाल (पहले इसे सार्क महोत्सव कहते थे)का यह 64वां महोत्सव है। इसका आयोजन फाउंडेशन ऑ
वरिष्ठ कथाकार, उपन्यासकार, संपादक और अपनी लंबी साहित्यिक यात्रा के अनुभवों से भरे से रा यात्री का जाना साहित्य जगत के लिए एक सदमे की तरह है। यात्री के जाने से देश की हिन्दी पट्टी का साहित्य संसार जहां वीरान हो गया वहीं यात्री जी की साहित्यिक यात्रा पर पूर्ण विराम लग गया। बेशक या
स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र नंदवाना सम्मान अवधेश प्रधान को
चित्तौड़गढ़। साहित्य संस्कृति के संस्थान संभावना द्वारा स्वतन्त्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना स्मृति सम्मान की घोषणा कर दी गई है। संभावना के अध्यक्ष डॉ के सी शर्मा ने बताया कि वर्ष 2023 के लिए स्वतन्त्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना स्मृति सम्मान बनारस निवासी प्रसिद्ध आलोचक अवधेश प्रधान को उनकी चर्चित कृति 'सीता की खोज' के लिए दिया जाएगा। डॉ शर्मा ने बताया कि जोशी की
आनंद स्वरूप वर्मा बेशक अस्सी बरस के हो गए हों, लेकिन उनके भीतर का जुझारू पत्रकार, लेखक और जनांदोलनों के प्रति उनका समर्पित एक्टिविज्म अब भी किसी उत्साही युवा की तरह बरकरार है। वो लगातार लिखते हैं, अनुवाद करते हैं, आज के तमाम जरूरी सवालों पर उसी शिद्दत के साथ बोलते हैं, साथ ही एक जनपक्षधर पत्रकारिता क
इधर किताबें खूब आ रही हैं। वक्त के साथ लेखकों के भीतर के भाव सोशल मीडिया पर तो अभिव्यक्त तो हो ही रहे हैं, किताबों का प्रकाशन भी बड़ी संख्या में हो रहा है। पर कुछ किताबें ऐसी हैं जिनपर चर
‘परंपरा में बंधने के बजाय मुक्त भाव से लिखे रचनाकार’
ललित कला अकादमी के राष्ट्रीय पुरस्कारों का ऐलानसम्मानित होंगे 20 कलाकार63वें राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में शामिल होंगी 297 कृतियां
नई दिल्ली। अपनी कला को एक खास मुकाम तक पहुंचाने और उनमें विविध आयाम
सदी के बदलाव का बयान है आज की कहानी : अब्दुल बिस्मिल्लाह
ऐसे समारोह नए रचनाकारों को आगे बढ़ने का हौसला देते हैं : मैत्रेयी पुष्पा
गाजियाबाद 21 मई को साहित्य की कुंभ नगरी बन गया। पांच सत्रों में कहानी से लेकर रंगमंच और साहित्य की तमाम विधाओं पर बेहद रचनात्मक चर्चा हुई। 'कथा रंग' की ओर से आयोजित कहानी मह
रंगमंच के क्षेत्र में आखिर महिलाओं की संख्या या जगह इतनी कम क्यों है? क्या इसके पीछे कोई वर्णवादी सोच है या पुरुषवादी वर्चस्व का आदिकालीन नज़रिया? क्या आज के दौर में भी रंगमंच नाट्यशास्त्र के उन्हीं मान्यताओं पर चल रहा है जिसे भरतमुनि ने रचा था? क्या ब्राह्मणवादी साहित्य की अवधारणाओं में महिलाओं का स्थान शूद्रों की तरह रहा है और रंगमंच में भी कहीं न कहीं ये अवध