लखनऊ का ज़ायका और टिकैत राय

कायस्थों का खाना-पीना (पांचवी कड़ी)

— संजय श्रीवास्तव

लखनऊ को नफ़ासत और तहज़ीब की नगरी कहा जाता है. अगर आप कई शहरों में जीवन गुजार चुके हों. उसमें एक शहर लखनऊ भी हो तो आपसे बेहतर उस शहर को कौन समझ सकता है. पुराने शहर की पुरानी हवेलियों से लेकर पहनावा और बोली से लेकर खानपान तक में खास नफासत और अंदाज. वैसे लखनऊ अब भी काफी हद तक अपनी पुरानी बातों को बचाकर रखा भी है. कम से कम खानपान के मामले में.

चाहे लखनऊ के नान वेज की बात करिए या फिर चाट की या फिर हर सीजन के साथ रसोई में बनने वाले खाने और पकते हुए खाने के साथ आने वाले मसालों की गंध की. पुराने लखनऊ की बात करें तो यहां कायस्थों का बड़ा रूतबा था. अवध के हर रंग में उनकी भूमिका रही है.
अवध का मुख्यालय पहले फैजाबाद था. फिर 1775 में नवाब आसिफुद्दोला उसे लखनऊ ले आए. फिर लखनऊ में कल्चर से लेकर कुजीन यानि खानपान पर बहुत काम हुए. नदीम हसनैन की किताब “द अदर लखनऊ” कहती है कि जब अवध की राजधानी को नवाब आसिफुद्दोला लखनऊ लेकर आए तो एक कायस्थ को दीवान बनाया गया, जो बाद में उनका प्रधानमंत्री बना. इनका नाम था राजा टिकैत राय. उनके नाम पर अब भी लखनऊ से लेकर फैजाबाद तक कई जगहें हैं. उन्होंने कई नए मंदिर, घाट, तालाब, मस्जिदें बनवाईं तो हिंदू महत्व की जगहों रेनोवेट किया. टिकैत राय कायस्थ थे. खाने-पीने के शौकीन. दावतें देने वाले. गीत-संगीत में आनंद लेने वाले. उनके और अन्य उच्च पदासीन कायस्थों की पाकशाला से कई व्यंजन निकले, हालांकि लखनऊ के नामवर कायस्थों की बड़ी फेहरिस्त है.


मटन से तैयार होने वाले कई तरह के व्यंजन, शामी कबाब, सीख कवाब बेशक कायस्थों की किचन की भी शान थे. बगैर इसके उनका खाना ही नहीं होता था. वैसे लखनऊ को कबाब के कई तरह के इनोवेशन का क्रेडिट जाता है. कायस्थों की एक खास आदत थी वो अक्सर मांसाहारी खानों को बनाने के तौरतरीकों को शाकाहार की कसौटी पर जरूर कसते थे. जो रिजल्ट मिलते थे, वो नए व्यंजन की नींव रखते थे. जैसे लखनऊ ने मांसाहार में कई तरह के कबाब दिए उसी तरह लखनऊ के कायस्थों के जरिए कई तरह के शाकाहारी कबाव भी निकले. इसमें चने की दाल को भिगोकर पीसकर उसमें बेसन और मसालों को मिलाकर बनाया कबाब तो इतना लजीज होता है कि अक्सर मीट खाने वाले भी धोखा खा जाते हैं. चने की दाल जब रातभर के बाद सुबह तक गल चुकी होती है, तो उसे हल्का सा उबाल दिया जाता है. इसके बाद उसे पीसते हैं. तब भुने हुए बेसन की हल्की मात्रा के साथ मसाले, नमक आदि मिलाकर टिक्की का शेप देकर हल्की आंच में तवे पर तेल और घी में धीरे धीरे सेंका जाता है तो लजीज वेज कबाब बनते हैं. ये कई तरह के बनते हैं.इसमें सीजनल सब्जियों को शामिल किया जा सकता है. वैसे तो मटर और कटहल के कबाव का भी कोई जोड़ नहीं.

रमेश द्विवेदी की किताब “जिक्र ए फिराक -यूं ही फिराक ने जिंदगी की बसर” में तो उनके कबाब पर फिदा होने की बात को काफी विस्तार से लिखा गया है. शराब और कबाब उनके प्रिय खानपान थे. वैसे वो थे भी कायस्थ ही-असली नाम था रघुपति सहाय

अवधी के कायस्थ व्यंजनों पर हिंदू-मुस्लिम दोनों असर हैं. आमतौर पर कायस्थ घरों की बहुत सी महिलाएं शाकाहारी थीं लेकिन वो लाजवाब मांसाहारी व्यंजन बनाया करती थीं, लेकिन मांस सरीखे स्वाद को उन्होंने शाकाहारी व्यंजनों में दाल और सब्जियों के साथ उतारा.से.
स्वाद और रंगत में मांस जैसी बनाई गई सब्जियों में अगर नाम लिया जाए तो मूंग दाल की कलेजी या मछली की तरह पकाई गई अरबी के नाम लिया जा सकता है. हालांकि ये सही ही है कि लखनऊ के कायस्थों ने मांसाहारी खाने से ज्यादा दोस्ती की. दशहरे और होली की शाम कायस्थों के यहां खासतौर पर मीट पकाया जाता था.
लखनऊ में मेरे मकान मालिक अमर गौड़ यूं तो बैंक में अफसर थे लेकिन थे पक्के लखनवी. शानदार शख्स. मीट तैयार करने में उनका और भाभीजी का कोई जवाब नहीं था. पहली बार मैने उनके मुंह से सुना कि जब भी बाजार जाइए तो गोल बोटी मीट लेकर आइए. हालांकि गोल बूटी का मतलब अब मैं भूल चुका हूं. लेकिन जब इंदिरानगर में एचएएल के सामने की बाजार में इसको लेने गया और गोलबूटी की डिमांड की तो मीट विक्रेता से अलग तरह से काटपीट करके गोश्त दे दिया. इसे खाने और पकाने दोनों का मजा अलग था. मैने पहली बार लखनऊ में ही कायस्थों को करी, कोफ्ता और कबाव में गुलाब और केवड़े की सुंगध भी डालते देखा. लखनऊ में अब भी नौबस्ता, अमीनाबाद और पुराने लखनऊ के कई मोहल्लों में कुछ कायस्थ परंपरागत व्यंजनों को अपने रेस्तरां या होटलों में परोसते हैं. यहां कायस्थों के यहां बनने वाले बेहतरीन कोफ्ते, पसंदे, फरे और मीट खा सकते हैं.
ये भी कहूंगा लखनऊ के कायस्थों को कटहल खासतौर पर काफी पसंद है. जब कटहल का मौसम आता है तो इसकी सब्जियां राई से लेकर बेसन के साथ मिलाकर बनाई जाती हैं. कभी उन्हें उबालकर लजीज व्यंजन का रूप दे दिया जाता है तो कभी केवल तेल में मसालों के साथ स्टफ्ड करके. अगर कटहल की सब्जी को खड़े मसालों के साथ पकाया जाए, तो शायद अंतर करना मुश्किल हो जाता है कि ये शोरबे वाला मीट है या कटहल. मैने उबले कटहल की बेसन में बनी पकौड़ियां भी यहीं खाईं. कायस्थ महिलाओं ने खासतौर पर शाकाहार में ऐसी पाककला विकसित कर ली थी कि ये व्यंजन भी कुक होने के बाद मीट को मात देते हुए लगें.

कुछ ऐसा ही वैरिएशन गोभी के साथ भी देखा. लखनऊ में मैने एक परिचित और सीनियर कायस्थ के घर गोभी का अनूठा व्यंजन देखा, जो उनकी श्रीमती जी के यहां परंपरागत तौर पर कई पीढियों से बनाया रहा था. गोभी के डंठल निकालकर उसके ऊपरी हिस्से को समूचा उबाल दिया जाता है. जब वो उबल जाती थी. तब उसका पानी निकाल लिया जाता है. फिर बंद बर्तन में तेल और मसालों के साथ बंद करके हल्की आंचे में पकाया जाता है. हालांकि ये डिश काफी डेलीकेसी मांगती है. भाप के साथ मसाला गोभी में जज्ब होता रहता है. फिर करीने से प्लेट में निकालकर अदरक, हरी धनिया औऱ हरी मिर्च के साथ गार्निश करके परोसा जाता है. लोग इसे काटकर अपनी प्लेटों में लेते हैं. यम्मी और लाजवाब.
अनूठी विशाल अपनी किताब, “मिसेज एलसीज टेबल” में कहती हैं कि जाड़ों में लखनऊ में खाने का आनंद बढ़ जाता था.नवंबर में ज्यादातर डायनिंग टेबल पर पत्तीदार सब्जियां मसलन पालक, मेथी, मटर और गोभी के व्यंजन नाश्ते से लेकर लंच और डिनर तक में शोभा बनने लगते थे. गाजर के हलवे की महक आने लगती थी, जिसे खोवे के साथ पकाकर थाली में बिछाकर जब चौकोर काटा जाता था तो ये स्वादिष्ट मिष्ठान की जगह ले लेता था.

तिल और मावा मिलाकर मिठाइयां और लड्डू तैयार होते थे. तब कायस्थ घरों में कुकिंग सीजनल होती थी. हालांकि ये तो अब भी होता है. जाडे़ में खाने का तौरतरीका बिल्कुल बदल जाता है-खाना गरिष्ठ हो जाता है. कायस्थों के लिए ये जाड़े वाला सीजन बड़ा शानदार होता है. खाने को ज्यादा वैरायटी मिलती है और ज्यादा स्पाइसी डिशेज. जाड़ों में कायस्थों के घरों में इस मौसम में सत्पेता यानि कटे पालक के साथ बनाई गई अरहर या उड़द की दाल खासतौर पर बनने लगती है. माना जाता है कि सत्पेता दाल और गोभी के व्यंजन कायस्थों की रसोई में कोलोनियल प्रभाव में आए. यही सीजन मुंगोड़ियों, बड़ियों के बनने का भी होता था. बहुत सी सीजनल सब्जियों को सूखाकर उसको आगे इस्तेमाल करने का भी. वैसा ये तो पक्का है कि अगर आप लखनऊ में हैं और किसी कायस्थ ने आपको दावत पर आमंत्रित किया है, उसे अगर ये मालूम चल गया कि आप मांसाहारी हैं तो आपकी थाली में वो बड़ी शान से इसके दो-तीन व्यंजन परोसकर मेहमानवाजी करेगा. 

(पत्रकार संजय श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से)

Posted Date:

April 16, 2020

8:46 am Tags: , , , , , ,

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