अगर आपको लोक संगीत और उप शास्त्रीय गायन की विभिन्न शैलियों में दिलचस्पी है तो ये आलेख आपके लिए है।
होली यानी फाग के बाद चैती का आनंद आपने भी लिया होगा। इस गायन शैली और परंपरा का अपना इतिहास है। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक कुमार नरेन्द्र सिंह ने चैती पर यह शोधपरक और दिलचस्प लेख लिखा है और उनकी किताब का यह एक हिस्सा है। यह लेख पढ़िए और चैत
2022 में रंगमंच: कोरोना काल के बाद नाटकों का सैलाब
कोरोना काल के दो साल रंगकर्मियों के लिए एक दु:स्वप्न की तरह बीते लेकिन 2022 की शुरुआत से लेकर अंत तक जितने नाटक हुए, इतने नाट्य समारोह हुए और रंगकर्मियों ने खुलकर काम करने की कोशिश की, वह काफी हद तक याद रहने वाला है। सबसे बड़ी बात कि कोरोना ने जो शिथिलता और संकट पैदा किया, रंगकर्मियों के प्रति सरकारी संवेदनहीनता का जो रूप दिखा और गंभीर आर्थिक संकट और अनिश्चितता के दौर से गुर
निष्पक्ष पत्रकारिता और संवेदनशीलता के पर्याय थे अतुल माहेश्वरी
हिन्दी पत्रकारिता बेशक आज एक चुनौती भरे दौर से गुजर रही हो, मीडिया का स्वरूप बदल गया हो और तमाम मीडिया संस्थानों ने अपनी कार्यशैली बदल दी हो, लेकिन अमर उजाला एकमात्र ऐसा मीडिया समूह है जिसने अपने मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। न सियासत के बदलते रंगों और सत्ता के इर्द गिर्द खबरें बुनने और परोसने की दौड़ में यह संस्थान कभी रहा और न ही कभी संपादकीय स्वायत्तता पर यहां
असगर वजाहत के नाटकों में देश और समाज को देखने और इतिहास को वैज्ञानिक तथ्यों के साथ सामने लाने का जो शिल्प है, वह अद्भुत है। उनका ताज़ा नाटक 'महाबली' इसकी मिसाल है। दिल्ली के श्रीराम सेंटर में इस नाटक का पहला शो पिछले दिनों जाने माने रंगकर्मी एम के रैना के निर्देशन में हुआ। महाबली में क्या है खास और कौन हैं इस नाटक के दो महाबली जो हमारे देश में हर वक्त धड़कते रहते हैं, ये जा
गाजियाबाद में साहित्य सृजन को लगातार एक गंभीर और सार्थक मंच देने की परंपरा शुरु करने वाली संस्था मीडिया 360 लिटरेरी फाउंडेशन का कथा संवाद निरंतर अपने मिशन में लगा है। पिछले पांच सालों से लगातार हर महीने कथा संवाद के जरिये तमाम नए रचनाकारों को मंच देने और कथाकारों की एक नई पीढ़ी को समृद्ध करने में लगी इस संस्था ने इस साल का आखिरी कथा संवाद 25 दिसंबर को गाजियाबाद में आयो
हिन्दी और भोजपुरी साहित्य की एक अहम शख्सियत दिनेश ‘भ्रमर’ बेशक इन दिनों अस्वस्थ चल रहे हों, लेकिन 83 साल की उम्र में भी वह लगातार रचनात्मक रुप से सक्रिय हैं। गोपाल सिंह नेपाली और जानकी वल्लभ शास्त्री की काव्य धारा की एक अहम कड़ी के तौर पर उन्हें जाना जाता है। खासकर भोजपुरी साहित्य में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। भोजपुरी में ग़ज़ल और रुबाई में प्रयोगधर
गाजियाबाद के साहित्यप्रेमियों और साहित्यकारों के लिए कृष्ण मित्र का जाना एक सदमे की तरह है। कवि, लेखक और पत्रकार आलोक यात्री करीब साढ़े तीन दशकों से कृष्ण मित्र के करीब रहे और उनसे बहुत कुछ सीखा। 91 साल के कृष्ण मित्र के जाने पर आलोक यात्री ने उनसे जुड़े कुछ संस्मरण लिखे हैं। पढ़ते हैं।