
रंगमंच के तमाम आयामों और थिएटर पर चलने वाली बहसों को करीब से देखने समझने और उसपर लगातार लिखने वाले नाटककार राजेश कुमार ने दिल्ली के उस नए ट्रेंड को पकड़ने की कोशिश की है जो रंगकर्मियों के लिए नया उत्साह जगाने वाला है। अब तक कई चर्चित नाटक लिख चुके राजेश कुमार ने स्टूडियो थिएटर की इस नई परिकल्पना को करीब से देखा। कैसे बड़े बड़े और महंगे ऑडिटोरियम से निकाल कर थिएटर को घर


जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की भव्यता और वहां से शुरु हुआ साहित्य उत्सवों का सिलसिला अब एक व्यापक रूप ले चुका है। पहले विश्व पुस्तक मेला और उसके बाद पुस्तक मेलों की भरमार, हर शहर में पुस्तक मेले और वहां का उत्सवी स्वरूप। साथ ही साथ सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव और वहां लाइक्स, कमेंट्स पाने की ख्वाहिश। बेशक इसे साहित्य के स्वर्णिम काल के तौर पर देखा जा रहा हो, लेकिन

साहित्य के कॉरपोरेट आयोजनों से अलग रज़ा फाउंडेशन की सांस्कृतिक-साहित्यिक गोष्ठियों की चिंता कुछ अलग रहती है। खासकर मौजूदा परिदृश्य में सत्ता के जनविरोधी चेहरे को बेनकाब करने की कोशिश करती हुई इन गोष्ठियों और आयोजनों में ये बात उभर कर आती है कि एक प्रतिरोध की संस्कृति को बरकरार रखने और इसके विस्तार की जरूरत लगातार है। 'कल्चरल कोलैप्स' यानी सांस्कृतिक पतन पर केन्द्र

दिल्ली में हर दिन आपको कला-संस्कृति के कई रंग देखने को मिलते हैं। कोरोना काल के सन्नाटे के बाद गैलरियां गुलज़ार हो गई हैं, ऑडिटोरियम्स में रंगमंच अपने शबाब पर है और साहित्य जगत में तो इतनी हलचल है कि पूछिए मत। लेकिन हम आपको ले चलेंगे कला दीर्घाओं की रंग बिरंगी और रचनात्मक दुनिया में और वहां भी नज़र डालेंगे महिला कलाकारों को लेकर एक खास पहल पर।


जाने माने फोटोग्राफर रवि बत्रा ने अपने कैमरे में उतारा है गणपति को अंतिम रूप देते हुए कलाकारों को, बाज़ार में तैयार खड़े गणपति को... तस्वीरें दिल्ली के अलग अलग इलाकों की हैं.. गणेश चतुर्थी पर अब मुंबई ही नहीं, पूरे देश में गणपति बप्पा अपने साथ ढेर सारी खुशियां लाते हैं और उनके साथ उन कलाकारों के चेहरे पर भी उम्मीद की खुशी दिखती है जि दिन रात जाग कर इस भरोसे मूर्तियां बना