‘फ्री’ का फंडा, ‘सेल’ का खेल

खुले बाजार का दौर है। आजकल हाल यह है कि बेचने वाले ग्राहक खोज-खोजकर माल थमाने में लगे हैं। बड़ा टफ कंपटीशन है, भाई। ग्राहकों को घर-घर जाकर पकड़ना पड़ रहा है। लोगों को नींद से जगा-जगाकर माल बेचा जा रहा है। बेचने वाले बताते हैं कि भैया उठो, खरीद लो और तब तक न रुको जब तक घर न भर जाए। जनता जनार्दन बेचारी झांसे में आ रही है और वह दिन-रात खरीदारी में जुटी है। विक्रेता समझा रहे हैं-मुफ्त का माल है, लूट सके तो लूट। लोग लूट रहे हैं और साथ में लुट रहे हैं। विक्रेता खुश और क्रेता भी मजे में।  अनिल त्रिवेदी का व्यंग्य…

 

पूरा देश बड़ा बाजार बन गया है। खरीदने-बेचने की होड़ लगी है। माल बेचने का कंपटीशन और बढ़ रहा है इसलिए सभी ने फ्री का फंडा शुरू किया है। यह खरीदिए तो वह फ्री। दो के दाम दीजिए, तीसरा बिलकुल मुफ्त। दो सौ ग्राम पैक के साथ पचास ग्राम फ्री। एक किलो के जार के साथ एक कटोरी भी। यानी आपको जो चाहिए उसके साथ कुछ न कुछ फ्री का हाजिर है।

बेचने वाले दावा करते हैं कि वे जनता की सेवा में लुटा रहे हैं। खरीदार मानते हैं कि वे लूट रहे हैं। इसलिए एक की जरूरत पर वे तीन-तीन, चार-चार आइटम खरीद रहे हैं। पता नहीं कब फ्री वाली स्कीम बंद हो जाए। लेकिन फ्री का फंडा बंद होने वाला नहीं। एक स्कीम बंद तो दूसरी चालू।

सुबह-सुबह मैं जो चाय पीता हूं, वह बड़ी अच्छी है। उसकी बदौलत मेरे घर में एक दर्जन कप और एक दर्जन कटोरियां मुफ्त में आ गई हैं। चाय बेस्वाद जरूर है पर पत्नी कहती हैं कि कप और कटोरियां बढ़िया हैं। इस प्रकार हम कप और कटोरी के प्रलोभन में रोज बेस्वाद चाय सुड़कते हैं और चाय कंपनी को दिन-रात तरक्की की दुआएं देते हैं।

और उस वाशिंग पावडर को देखो जो प्लास्टिक की बाल्टी मुफ्त में दे रहा है। सफेदी के चक्कर में कपड़ों की धज्जियां उड़ी जा रही हैं लेकिन बाल्टियां जुटाने के लिए मेरे घर के एक कोने में हजार रुपये का वाशिंग पावडर आराम फरमा रहा है। पत्नी का कहना है कि पता नहीं स्कीम कब बंद हो जाए, वाशिंग पावडर तो साल भर चलता रहेगा।

हॉकर सुबह-सुबह आधा दर्जन अखबार डाल जाता है। इसलिए नहीं कि मुझे पेपर पढ़ने का इतना शौक है बल्कि इसलिए कि हर अखबार ने कुछ न कुछ फ्री दे रखा है। एक अखबार ने बेडशीट दी है, साथ में दो तकिया कवर भी। एक अखबार केसरोल दे गया है। छह महीने के लिए हम निश्चिंत। एक पेपर वाला फ्राइंग पैन पटक गया है। कह गया कि महीने में बिल भी कुछ कम आएगा। छह महीने बाद कुछ और गिफ्ट भी देगा। सवेरे जब हॉकर पेपर डालता है तो मुझे लगता है वह एक किलो वजन मेरे सिर पर पटक रहा है और कह रहा है- ले दिन भर सिरदर्द झेल।

फ्री के फंडे का इस कदर बोलबाला है कि टीवी खरीदिए, टेबल फैन फ्री। फ्रिज खरीदिए क्रॉकरी सेट मुफ्त। कार ले रहे हैं तो इंश्योरेंस फ्री। दो शर्टें खरीदिए तीन मिलेंगी। तीन जींस की कीमत में पांच ले जाइए। जिस दुकान में भी जाएंगे वहां फ्री का लुभावना ऑफर मिलेगा। जनता की सुविधा की खातिर हर कोई फ्री बांट रहा है। चूंकि यह फंडा हिट है इसलिए नए-नए ऑफर सामने आ रहे हैं। आप बच नहीं सकते। कुछ न कुछ तो मुफ्त में लेना ही पड़ेगा। इस्तेमाल करिए या फिर कूड़ेदान में डाल दीजिए।

हालांकि फ्री का फंडा नया नहीं है। यह दीगर बात है कि पहले यह घोषित तौर पर नहीं था। इसके प्रचार प्रसार पर इतना जोर नहीं दिया गया। जनता ने भी कभी कायदे से इस पर गौर नहीं किया। देश जब स्वतंत्र हुआ था तब आजादी के साथ बंटवारा हमें फ्री मिला था। तब से लेकर आज तक हर व्यवस्था के साथ कुछ न कुछ मुफ्त मिल रहा है। हम नेता चुनते हैं, चमचे मुफ्त में मिल जाते हैं। बड़े-बड़े सौदे होते हैं, साथ में घपले फ्री होते हैं। प्रशासनिक व्यवस्था चुस्त की जाती है तो भ्रष्टाचार के किस्से अपने आप बढ़ जाते हैं। मिलावट करने वाले पहले से अपने माल के साथ बिना बताए कुछ न कुछ मुफ्त दे रहे हैं। मसलन दूध के साथ पानी मुफ्त, घी में वनस्पति तेल फ्री, दाल-चावल में कंकड़ मुफ्त। आप मुफ्त का लेने से इनकार नहीं कर सकते। जनता की सेवा में मिलावट का धंधा इसीलिए बेरोकटोक जारी है।

गांव में मेरा पड़ोसी रामजीवन खुश है। उसकी शादी हो गई है। पत्नी आई है, साथ में एक साल का बच्चा भी है। यानी पत्नी के साथ बच्चा फ्री। इस तरह कई बरस से शादी का सपना देख रहे रामजीवन का जीवन अब सुखमय हो गया है। फ्री के चलन से अब मुझे डर सा लगने लगा है। सरकारी अस्पतालों का हाल पहले से बेहाल है। इलाज कराने गए मरीजों को दवाएं तो फ्री में नहीं मिलतीं पर कई तकलीफें जरूर मुफ्त मिल जाती हैं। संभव है अस्पतालों में बोर्ड लगा दिए जाएं कि मरीज की मौत होने पर अंतिम संस्कार का इंतजाम मुफ्त होगा। भगवान के भरोसे ठीक हो गए तो अच्छा है वरना घरवालों को चिंता नहीं करनी है।

पुलिस वाले भी ऐसी ही कोई योजना शुरू कर सकते हैं। अभी पुलिस सिर्फ इतना करती है कि एक मामले में गिरफ्तार आरोपी पर मुफ्त में दो और धाराएं ठोक देती है। कुछ नहीं तो मुफ्त में ठुकाई के इतने निशान तो दे ही देती है कि पुलिस के नाम से शरीर कांपने लगे। फ्री के फार्मूले से उत्साहित पुलिस वाले ऐसा नियम बना सकते हैं कि एक आरोपी को बचाने का पैसा दो, दूसरे को मुफ्त में छोड़ दिया जाएगा। या जेबकतरे पांच जेबें काटने का हिसाब दें तो उन्हें दस जेबें साफ करने की छूट होगी। आखिर चारों ओर फ्री की गूंज में सबको राहत मिलनी चाहिए।

सुना है कि हमारे इलाके के एक दादा ने दरियादिली दिखाई है। उसने एक केस के रेट में दो केस निपटाने का खुला ऑफर दे दिया है। एक के हाथ-पैर तुड़वाने का पैसा दीजिए दो के तुड़वा लीजिए। एक का सिर फोड़वाने के रेट में दो के नाम दे सकते हैं आप। किसी एक दुश्मन का सफाया कराने की कीमत अदा करिए और दो की हिटलिस्ट दे दीजिए। दोनों अगले दिन साफ मिलेंगे। सुनने में तो यह भी आया है कि दादा ने क्षेत्र के नेताजी के साथ एक एमओयू पर साइन किए हैं। अब वह एक चुनावी इंतजाम के रेट में दो चुनावों का इंतजाम संभालेगा। इस ऑफर के बाद उसे कुछ और क्षेत्रों के नेताओं से प्रस्ताव मिलने वाले हैं।

अनिल त्रिवेदी  

वरिष्ठ पत्रकार और व्यंग्यकार

Posted Date:

June 7, 2026

1:56 pm Tags: , ,

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