देश विदेश के अलग अलग हिस्सों में भारतीय साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े तमाम कार्यक्रम होते हैं, ढेर सारी गतिविधियां होती हैं। कई ख़बरें भी होती हैं जो हम तक नहीं पहुंच पातीं। गोष्ठियां, कार्यशालाएं होती हैं, रंगकर्म की तमाम विधाओं की झलक मिलती है और लोक संस्कृति के कई रूप दिखते हैं। नए कलाकार, नई प्रतिभाएं और संस्थाएं साहित्य-संस्कृति को समृद्ध करने की कोशिशों में लगे रहते हैं लेकिन उनकी जानकारी कम ही लोगों तक पहुंच पाती है। हमारी कोशिश है कि इस खंड में हम ऐसी ही गतिविधियों और ख़बरों को शामिल करें … चित्रों और वीडियो के साथ।

स्त्री दर्पण नामक ऐतिहासिक पत्रिका की संपादक और जानी मानी समाजिक कार्यकर्ता रामेश्वरी नेहरू को लखनऊ में याद किया गया। इस मौके पर स्त्री लेखा पत्रिका के नए अंक का लोकार्पण प्रो. रूपरेखा वर्मा, वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना, प्रो रमेश दीक्षित, आलोचक वीरेन्द्र यादव और कवि कात्यायनी ने किया। स्त्री विमर्श केवल अस्मिता विमर्श नहीं है बल्कि वह दुनिया को बदलने का एक व्यापक विमर्श है।
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भारतीय मूर्तिकारों, शिल्पकारों ने हमारी आधुनिक संवेदनाओं, जीवन और मिजाज को किस तरह पकड़ा है और इन सौ सालों में कला को, समाज को और राष्ट्र को क्या दिया है। पिछले दिनों इस आकलन की कोशिक के तहत प्रोग्रेसिव आर्ट गैलरी और रजा फाउंडेशन ने त्रिवेणी कला संगम की श्रीधरणी आर्ट गैलरी में एक अनोखी प्रदर्शनी का आयोजन किया जिसमें गत 100 वर्षों की मूर्तिकला को सामूहिक रूप से पेश किया गया। इसे क्यूरे
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निर्भया कांड पर बनी बीबीसी की एक डाक्यूमेंटरी देख रही थी। उनमें से एक आरोपी की मां ने अपने इंटरव्यू में कहा “हमारा बेटा ऐसा नहीं कर सकता। वो तो बहुत अच्छा है।” तब एक कविता लिखी थी “मैं लड़का नहीं जन्मूंगीं” फिर एक नाटक लिखा “यत्र-तत्र-सर्वत्र” उसे करने पर बहुत से लोगों ने कहा तुम भी फंसोगी, हमें भी जूते पड़वाओगी। क्योंकि उस नाटक में पूरी समाजनीति और राजनिति दोनों पर सवाल उठाए गए थे।
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“लिखत पोएटिका – क” (प्रकाशक - पाखी रे क्रियेटिव्स, जयपुर) नाम से आई इस पुस्तक में 95 रचनाकारों की एक-एक रचना शामिल है। इनमें चर्चित नाम भी हैं और नवोदित भी। संग्रह के शुरू में इरशाद कामिल और तस्वीर कामिल के संबोधन (“कविता के नाम” और “आपको इकबाल मुबारक”) भी हैं। “कविता के नाम” और “आपको इकबाल मुबारक” के लिए इतना ही कहा जा सकता है कि अगर आप किसी बेमिसाल उपन्यास या कहानी को पढ़ने के बाद ल
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‘उन्मेष’ अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव के तीसरे संस्करण का आयोजन इस बार पटना में 25 से 28 सितंबर 2025 के बीच सम्राट अशोक कन्वेंशन सेंटर में होगा। इस उत्सव का आयोजन भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय एवं साहित्य अकादेमी द्वारा संयुक्त रूप से बिहार सरकार के सहयोग से किया जा रहा है। यह जानकारी आज इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित प्रेस सम्मेलन में संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक
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नब्बे के दशक के बेहद संवेदनशील कवि मोहन राणा की। कविता का शीर्षक है घर। कई बरसों के बाद मोहन राणा पिछले दिनों भारत आए। रहते वो इंग्लैंड में हैं। वहीं का एक शहर है - बाथ जहां मोहन राणा रहते हैं। अब तो ब्रिटेन के नागरिक भी हो गए हैं। दिल्ली में जन्में, पले बढ़े और पढ़े। जब दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते थे तो कला, साहित्य और खासकर कविता में दिलचस्पी हुई। जनसत्ता और नवभारत टाइम्स जैसे अख
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गुरुग्राम स्थित नाट्य संस्था ‘रंग परिवर्तन’ की ओर से रविवार 3 अगस्त को मोलिएर के नाटक ‘द मॉक डॉक्टर’ के हिंदी रूपांतरण ‘आदाब अर्ज है’ की प्रस्तुति प्रेक्षकों के लिए अविस्मरणीय रंग-अनुभव रही। फ्रांसीसी नाटककार मोलिएर का यह नाटक मानवीय मन की मूलभूत भावनाओं को हास्यपूर्ण और संवेदनशील ढंग से सामने लाता है। वरिष्ठ रंगकर्मी महेश वशिष्ठ के निर्देशन में यह प्रस्तुति आंगिक अभिनय के प
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ग़ाजियाबाद में साहित्य की नई धारा बहने लगी है, कवियों और शायरों ने यहां समां बांध रखा है। चाहे कथा संवाद हो या बारादरी, कहानी और शायरी के नए रंग फूटने लगे हैं। कई वरिष्ठ तो कई नए रचनाकारों की सक्रियता ने यहां शब्दों और भावनाओं की रचनात्मक अभिव्यक्ति को नया आयाम दिया है। इस बार की बारादरी में मशहूर शायर और कार्यक्रम के अध्यक्ष मोईन शादाब ने कहा कि गंगा जमुनी तहजीब की महफ़िल 'बारादरी'
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17 जुलाई को जब गंगा की लहरों पर सूर्य की अंतिम किरणें झिलमिला रही थीं, वाराणसी की वह शाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। नागरी प्रचारिणी सभा के आर्यभाषा पुस्तकालय परिसर में वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत की बहुचर्चित पुस्तक ‘जर्नलिज्म AI’ के लोकार्पण के दौरान आज के दौर की पत्रकारिता और तकनीकी क्रांति के नए आयामों के तमाम अनछुए, अनकहे पन्ने खुल गए। अपने ज़माने के मशहूर पत्रकार, संपादक, चि
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गाजियाबाद में साहित्य की परंपरा को एक अहम मुकाम तक पहुंचाने वाले कथा शिल्पी से रा यात्री की कथा यात्रा के कई पड़ाव रहे। उनकी कहानियों में समाज और सियासत के साथ रिश्तों के इतने शेड्स मिलते हैं कि आज भी इस कथाकार की रचनाशीलता और दृष्टि की गहराई को समझ पाना आसान नहीं है। जीवन के आखिरी दिनों तक से रा यात्री जनतांत्रिक मूल्यों की बात करते रहे, सरकार और व्यवस्था के संवेदनहीन रवैये को लेक
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