ओह ! एक बार फिर ‘शिट’

राम मंदिर में करोड़ों की चंदा चोरी और चोर हुए चंपत, इसे चोरी कहें या डकैती… ऐसे में जांच के लिए एक और एसआईटी… सियासत का ये नया खेल, क्या है ये एसआईटी…जाने माने पत्रकार और व्यंग्यकार अनिल त्रिवेदी

चूंचूं अंकल इनदिनों गुमसुम हैं। मन बहुत उद्गिन और व्यथित है। उनकी पीड़ा देखकर मैं भी द्रवित हो गया सो पूछ लिया- अंकल, आप इतने दुखी क्यों हैं? बार-बार पूछने पर उनकी आंखें भर आईं। वे बस इतना ही बोल पाए-मंदिर…चढ़ावा…। मुझे उनका दर्द समझते देर नहीं लगी कि अंकल का मन अयोध्या में लगा है। जब से चढ़ावा चोरी का मामला रोशनी में आया है, उन्हें अंधेरा नजर आ रहा है। उनकी आस्था, श्रद्धा और विश्वास खूनखच्चर हैं। वे बीच-बीच में हे राम, हे राम रटने लगते हैं।

मैंने उन्हें ढांढ़स बंधाया- अब आप निश्चिंत रहें, दुखी होने की जरूरत नहीं है। मामले की एसआईटी जांच हो रही है। कार्रवाई भी शुरू हो गई है। भरोसा रखिए, कुछ दिन में सब ठीक हो जाएगा। मेरे शब्दों से अंकल को कुछ राहत मिली। लेकिन एक लंबी सांस खींचकर उन्होंने सवाल किया कि यह किस प्रकार की जांच है? क्या यह पुलिस जांच से बड़ी होती है? मैं जान गया कि अंकल जांच का पूरा माजरा समझने को उत्सुक हैं।

मैंने उन्हें बताया- चोरी के मामले तो छोटे-मोटे अपराधों की श्रेणी में आते हैं। चाहे हजारों की चोरी हो या करोड़ों की। ऐसे मामलों की पहले घरेलू जांच की जाती है। चढ़ावा चोरी के आरोप लगे तो पहले इसकी घरेलू जांच शुरू की गई। मामला घर में ही रफा-दफा हो जाए तो अच्छा है। चोरों को प्यार से समझा दिया जाए कि भैया, यह गलत बात है, भ‌विष्य में दोबारा ऐसा किया तो थाने में शिकायत कर दी जाएगी। लेकिन विरोधियों को घरेलू जांच पसंद नहीं आई। जब हद से ज्यादा हो हल्ला मचा तो सरकार को एसआईटी जांच करवानी पड़ी।

एसआईटी जांच पुलिस जांच से बड़ी होती है और सीबीआई जांच से छोटी। एसआईटी यानी सिट। पुलिस जांच तो खड़े-खड़े और दो-चार दिन में भी हो सकती है लेकिन यह जांच बैठकर इत्मीनान से होती है। पुलिस जांच दस-पंद्रह लोगों से हल्कीफुल्की पूछताछ में ही पूरी हो जाती है लेकिन एसआईटी तगड़ी पूछताछ करती है। न दिन देखती है न रात। एक-एक से पांच-पांच, सात-सात घंटे और कई-कई बार पूछताछ की जाती है। पुलिस तो जांच के बीच-बीच में एक्स्ट्रा काम भी कर लेती है लेकिन एसआईटी वाले भूख-प्यास की चिंता किए बिना चौबीसों घंटे जांच में ही लगे रहते हैं। सौ दो सौ लोगों से पूछताछ करनी पड़ती है। लोगों को टेर टेरकर बुलाती है कि मामले में कुछ जानते हो तो आकर बताओ।

अंकल के चेहरे पर कुछ चमक आई। जिज्ञासा व्यक्त की- इसका मतलब है जांच में दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा? मैंने कहा- वैसे तो एसआईटी का काम कुछ लोगों को फंसाना, कुछ लोगों को बचाना और कुछ लीपापोती करना होता है। लेकिन सरकार सीना ठोककर दावा कर रही है तो हमें भी मानना चाहिए कि दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। संभव है दूध की मलाई कहां गई इसका भी खुलासा हो जाए। एसआईटी तो यहां तक जांच रही है कि किस आरोपी के कितनी जेबें हैं। किसकी जेब में नोटों की कितनी गड्डियां आती थीं। चढ़ावे का सोना-चांदी ले जाने वाला थैला कहां है। गोबर के ढेर में नोट कैसे पहुंचे।

चूंचूं अंकल भरे बैठे थे, बोले- नोट तो नोट, चोरों ने तो चढ़ावे में मिलीं चांदी की चरण पादुकाएं और काकभुषुंडी भी उड़ा लिए। मैंने आपत्ति की- अंकल चरण पादुकाएं ले जाने वाले को चोर न बोलिए। भरत जैसा प्रिय भाई ही पूजने के लिए चरण पादुकाएं ले गया होगा। रही बात काकभुषुंडी की तो यह तो आप जानते ही हैं कि श्रीराम के स्पर्श से पत्थर अहल्या बन गया था। हो सकता है प्रभु प्रताप से काकभुषुंडी भी काग बनकर अयोध्या के गगन में उन्मुक्त विचरण को निकल लिए हों। कुछ दिन में थककर विश्राम के लिए लौट आएंगे।

मेरे तर्क से भी अंकल संतुष्ट नहीं हुए। कहने लगे-चढ़ावा चोरी के बाद अब मंदिर ट्रस्ट पर भी सवाल उठ रहे हैं। ट्रस्ट पर लोगों को रत्ती भर भी ट्रस्ट नहीं रहा। जितने भी ट्रस्ट हैं मुझे इनकी ईमानदारी पर हमेशा संदेह रहा है। ट्रस्ट बोलने पर भ्रष्ट जैसी ध्वनि निकलती है। लगता है जैसे दोनों समानार्थी हों। हिंदी में इसे न्यास कहते हैं। यह भी गड़बड़ है। न्यास में भी नाश जैसी संभावना दिखती है। सरकार को एक बार नाम बदलकर इनकी ईमानदारी जांचनी चाहिए।

अंकल ने आखिरी सवाल दागा। क्या इस मामले की सीबीआई जांच नहीं हो सकती है? मैंने उन्हें आहिस्ते से समझाया – सीबीआई जांच विपक्ष के मामलों की करवाई जाती है। या फिर ऐसे मामलों की जिनसे राजनीतिक नफा-नुकसान कतई न हो। चोरी डकैती वाले मामलों में सीबीआई का क्या काम। सरकार को एसआईटी जांच पर पूरा भरोसा है। देखिए लखनऊ के अग्निकांड में 15 छात्रों के मरने की घटना के बाद आधा घंटे में ही सरकार ने एसआईटी जांच का आदेश दे दिया। अंकल बोल पड़े- ओह ! एक बार फिर ‘शिट’। मुझे लगा वे अंग्रेजी में गुस्सा निकाल रहे हैं। पूछा तो बोले- नहीं-नहीं, दरअसल मैं इटावा का हूं इसलिए सिट (एसआईटी) को शिट ही बोल पाता हूं।

अनिल त्रिवेदी

वरिष्ठ पत्रकार और व्यंग्यकार

Posted Date:

June 30, 2026

8:54 pm Tags: , , , ,

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