क्या आपने कोई ऐसी पेंटिंग देखी है जिसके भीतर से कोई तेज रोशनी फूटती हो…लगता है चित्र के फ्रेम के भीतर कोई बल्ब जल रहा हो। त्रिवेणी कला संगम की गैलरी में देवास के दिवंगत चित्रकार अफ़ज़ल पठान के चित्रों को देखकर ऐसा लगता है कि उनकी पेंटिंग से कोई रोशनी निकल रही है. पिछले कई दशकों से चित्र प्रदर्शनियाँ देख रहे मशहूर कला समीक्षक विनोद भारद्वाज कहते हैं कि उन्होंने पहली बार ऐसी पेंटिंग देखी है. उन्होंने इस प्रदर्शनी के क्यूरेटर एवं जाने माने चित्रकार से पूछा भी कि इन पेंटिंग्स को किस तरह बनाया गया है कि इसमें इतनी रोशनी है? अखिलेश जी ने बताया कि ये इनामेल पेंट से बनाये गये चित्र हैँ। इन चित्रों को देखकर सहसा विश्वास नहीं होता कि फ्रेम के भीतर कोई बल्ब नहीं जल रहा। बहरहाल अफ़ज़ल पठान अगर ज़िंदा होते तो 90 वर्ष के होते। उन्हें अच्छा लगता कि उनके शहर से हज़ार किलोमीटर दूर देश की राजधानी में उनके चित्रों की एकल प्रदर्शनी लगी है जिसमें नामी गिरामी कलाकार और लेखक मौज़ूद हैं।
अफ़ज़ल साहब के इंतक़ाल के 26 साल बाद इस प्रदर्शनी का आयोजन खास अहमियत रखता है।
यूँ तो अफ़ज़ल पठान के चित्र कई संग्रहालयों में है पर वे कला की चमकती दुनिया में अज्ञात कलाकर ही रहे. वे कला की बाजारवादी भगदड़ में नहीं रहे। प्रदर्शनी में आये अधिकतर दर्शकों ने पहली बार उनका नाम सुना। इस प्रदर्शनी के कैटलॉग की भूमिका लिखने वाले मशहूर कला समीक्षक सौमित्र दास बताते हैं कि वे भी अफ़ज़ल के नाम से पहले परिचित नहीं थे, लेकिन उनके चित्रों को देखकर प्रभु जोशी की बहुत याद आई। पता चला कि प्रभु अफ़ज़ल के शिष्य थे। शायद यह कारण रहा हो कि उनके चित्रों पर अफ़ज़ल साहब का प्रभाव पड़ा हो.

रज़ा फाउंडेशन के प्रबंध न्यासी अशोक वाजपेयी ने प्रदर्शनी पर अपनी टिप्पणी में लिखा है कि देवास का संबंध साहित्य और संगीत से रहा, अंग्रेजी के प्रख्यात लेखक ई.एम. फॉस्टर वहाँ शिक्षक के रूप में रहे और उन्होंने उपन्यास ‘द हिल ऑफ देवी’ लिखा. हिंदी कवि नईम वहाँ लंबे समय तक रहे संगीत की दुनिया में अमीर खां के गुरु उस्ताद रजब अली खान और पंडित कुमार गंधर्व वहाँ रहे, लेकिन इस शहर का दृश्य कला से कोई संबंध नहीं था। यहां कला के मानचित्र पर एक शून्य था। जब अफ़ज़ल पठान वहाँ एक कलाकार के रूप में उभरे, तो वे लगभग शून्य से आए थे, और चूँकि उन्होंने अमूर्तन को अपने कलात्मक माध्यम के रूप में चुना था, इसलिए उन्होंने लगभग शून्य को ही चित्रित किया।”
वाजपेयी लिखते हैं “अफज़ल, यद्यपि चित्रकला और आकृति-चित्रण में पूर्णतः निपुण थे, उन्होंने अमूर्तन का अभ्यास उस समय किया जब मध्य प्रदेश का कला-जगत आकृति-प्रधान कथात्मक कला से आच्छादित था। यह अवज्ञा और साहस दोनों का ही कार्य था, हालाँकि अफज़ल इतने विनम्र और आत्म-विलोपन करने वाले व्यक्ति थे कि वे ऐसा दावा कभी नहीं करते।”
“उनकी कला में प्रकाश है, पर वह उन कैनवासों पर चुपचाप गिरता है जो केवल ‘होने’ की लिपियाँ हैं, जो समय और स्थान के बोझ से मुक्त हैं। उनकी कला, एक आत्मीय तरीके से, समय और स्थान के किसी भी निशान को मिटा देती है और उससे आगे निकल जाती है। अधिक गहराई से देखें तो, अफ़ज़ल मौन की इन लिपियों को चित्रित करते हैं और उन्हें किसी निश्चित अर्थ के बोझ से लादने से परहेज़ करते हैं। यह न तो अवलोकन की कला है और न ही प्रतिनिधित्व की, बल्कि शुद्ध चिंतन की कला है; इसे दृश्य यथार्थ में एक वृद्धि के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि पहले से दी हुई यथार्थ की खुदाई के रूप में। एक दूसरे स्तर पर, अफ़ज़ल की कला को अस्तित्व के रहस्य के दृश्य संकेत के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। उनकी कला ‘होने’, मौन और प्रकाश की कला है, साथ ही, विनम्रता में एक दृढ़ कथन के रूप में, रचनात्मकता और कल्पना की अपार और अप्रत्याशित संभावनाओं के रूप में भी।”
लेखक अखिलेश ने कैटलॉग में अफ़ज़ल पठान को कला की दुनिया में एक बहता दरिया बताया है। उन्होंने बताया कि कॉलेज में पढ़ने के दौरान अफ़ज़ल जी का नाम सुना था और यह भी कि वे एकमात्र कलाकार हैं जो अमूर्त चित्र बनाते हैं। बहुत उत्सुकता हुई उनके चित्र देखने की और उनसे मिलने की। एक शाम पिता के कुछ कलाकार मित्र आये हुये थे उनके जाने के बाद पता चला अफ़ज़ल सर भी वहाँ थे। बड़ा अफसोस हुआ कि उनसे मिल न सके किन्तु जल्दी ही मयूर और प्रकाश घाटोले के साथ देवास जाकर अफ़ज़ल सर के काम देखने जाने की योजना बनाई गई और हम लोग साइकिल से देवास उनके घर जा पहुँचे। इन्दौर से साइकिल चला कर उनका काम देखने आये हैं इस बात की उन्हें बेहद खुशी हुई….अफ़ज़ल सर के चित्रों को देखते हुए अमूर्त चित्रों से सामना पहली बार हो रहा था जिसकी हमें कोई आदत न थी किन्तु उन चित्रों में एक आकर्षण था जिससे हम लोग जुड़ते जा रहे थे। यह आकर्षण तकनीक का था या चित्र का यह उस वक्त स्पष्ट नहीं हुआ। बेहद शालीन शख्सियत के मालिक अफ़ज़ल जिस उत्साह से एक के बाद एक अपने चित्र दिखाते और उन्हें लपेट कर रखते चले जाते यह हम लोगों के लिये आश्चर्य का कारण भी था। उन्होंने कभी पिछले सप्ताह के चित्र नहीं दिखाये, हमेशा जो अभी अभी किए गये हैं उन्हीं चित्रों को दिखाते और उनकी संख्या भी खासी होती।
उनके चित्रों में टूटे किनारे, बहते रूपाकर, ठोस पत्थर सी उनकी उपस्थिति और अजीब सा उड़ता-बहता, रुकता ठहरता माहौल दर्शक को कुछ सोचने पर मजबूर नहीं करता बल्कि उसे देखने को उकसाता है। यह देखना अचम्भे से भर जाता है इसमें कोई परिचित रूप नहीं है। एक दूसरे में घुसते फँसते-उलझते अपरिचित रूपाकार अपने किनारों से फटे-बहते रंग लिये दर्शक के मन में साफ साफ ऐसे चित्र का बिम्ब बनाते जो अपरिचित होते हुये भी परिचित होने का अहसास दिलाता है। उसके मन में चित्र के लिये उत्सुकता पैदा हो जाती है। वो उनसे जुड़ा हुआ महसूस करने लगता है। यह अफ़ज़ल के असरदार चित्रों का एक दुर्लभ गुण है।
अफ़ज़ल के चित्र बहते हुये दरिया की तरह दर्शक को भिगोते हैं। उनके उजले धुले, आलोकित रूपाकार में प्रवाह है, बहने का, बहते रहने का स्वभाव है, ये चित्र स्थिर नहीं हैं। रूपाकार स्थिर नहीं हैं, इनके भीतर स्थिरता है। वे ठोस चट्टान की तरह बह रहे हैं। अस्सी के दशक में अफ़ज़ल साहेब ने अपनी एक प्रदर्शनी देवास में आयोजित की थी जिसमें भोपाल से स्वामीनाथन और रामकुमार साथ आये थे। इन चित्रों से हतप्रभ रामकुमार ने लिखा: “चित्रों को देखकर इतना सुखद माधुर्य हुआ कि मैं अभिभूत होकर रह गया। कभी कल्पना नहीं की थी कि देवास में इस प्रकार का सुंदर, मौलिक काम देखने को मिलेगा।”
प्रदर्शनी में प्रसिद्ध चित्रकार अर्पिता सिंह और परमजीत सिंह ने अफ़ज़ल पठान पर एक सुंदर पुस्तिका का लोकार्पण किया इस आयोजन में जतिन दास विनोद भारद्वाज सुमन कुमार सिंह रश्मि वाजपेयी वाज़दा खाँ मनोज मोहन अशोक मिश्र रश्मि वाजपेयी पूनम अरोड़ा के अलावा और लोग उपस्थित थे।
दिल्ली से अरविंद कुमार की रिपोर्ट
Posted Date:July 1, 2026
11:44 pm Tags: अशोक वाजपेयी, रज़ा फाउंडेशन, विमल कुमार, अफ़ज़ल पठान, अरविंद कुमार