देश विदेश के अलग अलग हिस्सों में भारतीय साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े तमाम कार्यक्रम होते हैं, ढेर सारी गतिविधियां होती हैं। कई ख़बरें भी होती हैं जो हम तक नहीं पहुंच पातीं। गोष्ठियां, कार्यशालाएं होती हैं, रंगकर्म की तमाम विधाओं की झलक मिलती है और लोक संस्कृति के कई रूप दिखते हैं। नए कलाकार, नई प्रतिभाएं और संस्थाएं साहित्य-संस्कृति को समृद्ध करने की कोशिशों में लगे रहते हैं लेकिन उनकी जानकारी कम ही लोगों तक पहुंच पाती है। हमारी कोशिश है कि इस खंड में हम ऐसी ही गतिविधियों और ख़बरों को शामिल करें … चित्रों और वीडियो के साथ।

साहित्यकारों, लेखकों के लिए और खासकर साहित्य की सबसे बड़ी अकादेमी के लिए यह विषय अहम है - बदलते दौर में कितना बदला साहित्य। अक्सर इस विषय पर चर्चाएं होती भी रहती हैं, लेकिन इस बार यह खास इसलिए बन गया क्योंकि इसका आयोजन साहित्य अकादेमी ने राष्ट्रपति भवन परिसर के भव्य सांस्कृतिक केन्द्र में हुआ। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इसका उद्घाटन किया और संस्कृति मंत्री से लेकर मंत्रालय के à
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साहित्य के मौजूदा स्वरूप और चुनौतियों के बारे में अक्सर चर्चाएं होती रही हैं, समकालीन लेखन से लेकर तकनीक के इस बदलते दौर में पढ़ने लिखने की छूटती आदत पर भी चिंता जताई जाती रही है, लेकिन साहित्य अकादमी ने दो दिनों तक जो चर्चा की उसमें इसके तमाम पहलू सामने आए। खास बात यह कि यह पूरा आयोजन राष्ट्रपति भवन के सांस्कृतिक केन्द्र में हुआ और खुद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इसका उद्घाटन किय
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साहित्य अकादेमी और राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आज ‘कितना बदल चुका है साहित्य? विषयक दो दिवसीय साहित्यिक सम्मिलन का उद्घाटन भारत की माननीय राष्ट्रपति महामहिम श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र, नई दिल्ली में किया। उन्होंने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि 140 करोड़ देशवसियों के हमारे परिवार में अनेक भाषाएँ और अनगिनत बोलियाँ है à
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वयोवृद्ध पत्रकार के विक्रम राव नहीं रहे। आखिरी वक्त तक लिखते पढ़ते रहे। रोज़ उनका कोई न कोई आलेख किसी भी मौजूं विषय पर पढ़ा जा सकता था। लिखने पढ़ने के साथ उन्होंने पत्रकारों के हित के लिए कई काम किए। शुरु से ही इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट (IFWJ) के अध्यक्ष रहे और पत्रकारों के तमाम सवालों को उठाते रहे। चाहे वह वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू करवाना हो या फिर छंटनी का सवाल, साथ ही
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साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित साहित्य मंच कार्यक्रम में 7 मई को चार रचनाकारों ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। ये रचनाकार थे - संग्राम मिश्र (ओड़िआ), रत्नोत्तमा दास (असमिया), रीता मल्होत्रा (अंग्रेज़ी) एवं राजिंदर ब्याला (पंजाबी)। कार्यक्रम की अध्यक्षता संग्राम मिश्र ने की। सर्वप्रथम रत्नोत्तमा दास ने अपनी असमिया कहानी ‘रई जावा घड़ी’ के अंग्रेज़ी अनुवाद ‘द वाच ऑन हर रिस्ट’ का पाठ किया, जो à¤
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राष्ट्रीय नाटक विद्यालय के पूर्व निदेशक के देवेंद्र राज अंकुर ने कहा है कि अभिनेताओं को रंगमंच तभी करना चाहिए जब उन्हें "आत्मिक संतोष" मिले और निर्देशकों को नाटक करते समय कलाकारों को अत्यधिक स्वतंत्रता देनी चाहिए। श्री अंकुर ने कथा रंग समारोह के समापन के दौरान यह बात कही। उन्होंने कहा कि वह बीस बाइस देशों की यात्रा कर चुके हैं और पाया है कि विदेशों में भी निर्देशक अभिनेताओं को à¤
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युवा कवि संध्या निवेदिता को 27 अप्रैल को यहां 18 वें शीला सिद्धांतकर सम्मान से सम्मानित किया गया। इलाहाबाद की संध्या निवेदिता इन दिनों दिल्ली में लेखा परीक्षा विभाग में कार्य कर रही हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। सुश्री निवेदिता को उनके कविता संग्रह” सुनो जोगी एवं अन्य कविताओं “ के लिए यह सम्मान दिया गया है। सम्मान के तहत उन्हें 21 हज़ार रु
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हिंदी रंगमंच में आजकल बहुत कम ऐसे नाटक देखने को मिलते हैं जिनकी प्रस्तुति पूरी तरह से हर पैमाने पर खरी उतरे और उसमें एक कसाव हो। किसी नाटक का सफल होना केवल निर्देशक पर निर्भर नहीं करता बल्कि अभिनेता और नाटक के चुस्त संवादो पर भी निर्भर करता है। कहानी के रंगमंच के 50 वर्ष पूरे होने के मौके पर “ मेलो रंग” की ओर से प्रस्तुत विजय पंडित का “जोगिया राग “ एक ऐसा ही नाटक है जो अपनी प्रस्तुत
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आपको पता होगा कि सरकार ने डाटा पर्सनल प्रोटेक्शन एक्ट बनाया है और जल्दी ही उस एक्ट के नियम लागू होने वाले हैं। अगर यह नियम लागू हो गए तो इससे पत्रकारों की आजादी पूरी तरह छिन जाएगी और उनके लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा। 21 अप्रैल की शाम प्रेस क्लब में इस गंभीर मुद्दे पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें सूचना के अधिकार की प्रसिद्ध कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज समेत कई कार्यकर्ताओं, वकी
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