मीडिया 360 लिट्रेरी फाउंडेशन की शोक सभा में याद किए गए कुलदीप नैयर
गाजियाबाद। जाने माने पत्रकार कुलदीप नैयर को देश के तमाम हिस्सों में अपने अपने तरीके से याद किया जा रहा है। 95 साल की उम्र तक लगातार सक्रिय रहते हुए सबको अलविदा कह गए कुलदीप नैयर को गाजियाबाद में भी पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों ने याद किया। वयोवृद्ध पत्रका
वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप तलवार ने कैसे याद किया कुलदीप नैयर को...कुलदीप नैयर
वो साठ का दशक था। कुलदीप नैयर तब एक उर्दू अखबार ‘अंजाम’ में काम करते थे। मेरी उर्दू और हिन्दी अच्छी थी और नैयर साहब उर्दू के साथ अंग्रेज़ी में काफी उम्दा लिखते थे। नैयर साहब हिन्दी में नहीं लिखते थे।
परसाई जी ने व्यंग्य को जो नए आयाम दिए, उन्होंने देश, समाज, रिश्ते-नाते, राजनीति और साहित्य से लेकर मध्यवर्ग की महात्वाकांक्षाओं को अपनी चुटीली शैली में जिस तरह पेश किया, वह अब के लेखन में आप नहीं पा सकते। हरिशंकर परसाई के विशाल रचना संसार से गुजरते हुए आपको उनके व्यक्तित्व की पूरी झलक मिल जाएगी। ये भी पता चलेगा कि दौर चाहे कोई भी हो, अगर आपका नज़रिया साफ हो, समाज और व्यक्ति
(अमर उजाला के सलाहकार संपादक उदय कुमार मॉरीशस से लगातार विश्व हिन्दी सम्मेलन पर बेहतरीन रिपोर्ताज अपने अखबार और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भेज रहे हैं। सम्मेलन के आखिरी दिन यानी सोमवार 20 अगस्त को क्या कुछ हुआ , हिन्दी को विश्व की भाषा बनाने के साथ ही बदलते तकनीकी दौर और डिजिटल युग के साथ जोड़ने और विकसित करने को लेकर सम्मेलन में क्या विचार आए , उदय जी की इस रिपोर्ट से
बहुत याद आते हैं उस्ताद बिस्मिल्ला खां
पटना में दशहरे के वो उत्सव, कई कई रातों के शानदार संगीत कार्यक्रम, बेहतरीन कलाकारों को सुनने और उनके संगीत में खो जाने का वो आनंद... वक्त ने उस सुनहरे इतिहास को कहीं दफ़्न कर दिया है। बचपन में जब पहली बार उस्ताद बिस्मिल्ला खां को सु
विश्व हिंदी सम्मेलन के दूसरे दिन छायी रही भारतीयता की बात(अमर उजाला के सलाहकार संपादक उदय कुमार मॉरीशस से लगातार विश्व हिन्दी सम्मेलन पर बेहतरीन रिपोर्ताज अपने अखबार और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भेज रहे हैं। सम्मेलन के आखिरी दिन यानी सोमवार 20 अगस्त को क्या कुछ हुआ , हिन्दी को विश्व की भाषा बनाने के साथ ही बदलते तकनीकी दौर और डिजिटल युग के साथ
त्रिलोचन जी को याद करना एक पूरे युग को याद करने जैसा है। उनका विशाल रचना संसार और बेहद सरल व्यक्तित्व अब आपको कहीं नहीं मिलेगा। उनकी कविताओं को, उनकी रचना यात्रा को और उनके साथ बिताए गए कुछ बेहतरीन पलों को साझा करना शायद बहुत से लोग चाहें, लेकिन बदलते दौर में, नए सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में और साहित्यिक जमात की खेमेबाजी में त्रिलोचन आज भी हाशिए पर हैं। उनकी जन्म शताब्
(अमर उजाला के सलाहकार संपादक उदय कुमार इन दिनों पोर्ट लुई में चल रहे 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिस्सा लेने मॉरीशस में हैं। अमर उजाला और अमर उजाला डॉट कॉम पर उदय जी वहां के सत्रों के कई पहलुओं पर लिख रहे हैं। हिन्दी फिल्मों का भारतीय संस्कृति से कितना गहरा नाता है ये बताने की कोशिश की प्रसून जोशी ने। उदय कुमार की ये रिपोर्ट हम अमर उजाला से साभार '7 रंग 'के पाठको
चोट भी सुखद रही, सारी ज़िंदगी रहा अटल जी का हाथ: कृष्ण मित्र
पत्रकार के रूप में मेरा कैरियर भी दैनिक प्रलयंकर से शुरू हुआ था। कहा जा सकता है कि मैं भी एक "एक्सीडेंटल जर्नलिस्ट" हूं। मैं एमए कर रहा था। क्लास साढ़े दस बजे समाप्त हो जाती थी और मैं सीधा घर। मैं घर लौट रहा होता था और दैनिक प्रलयंकर के संपादक तेलूराम कांबोज जी उसी समय अपने कार्यालय से निकलकर फील्ड में जाने के लिए निकल र
दुनिया को बेहद करीब से देखते हैं गुलज़ार
‘उम्र के खेल में इकतरफा है ये रस्साकशी
इक सिरा मुझको दिया होता तो इक बात भी थी’
(जन्मदिन पर गुलज़ार साहब का ट्वीट)
एक संवेदनशील शायर और आसपास की दुनिया को बेहद करीब से देखने वाले गुलज़ार साहब के लिए जन्मदिन का मायना भले ही ये हो सकत