
पंडित लच्छू महाराज की बात ही कुछ और थी... कुछ ही महीने पहले जब मशहूर कथक सम्राट बिरजू महाराज ने तबले पर अपना बेहतरीन हुनर दिखाया तो संगीतप्रेमियों को पंडित लच्छू महाराज की याद आ गई। पंडित लच्छू महाराज जब तबले के साथ होते थे तो वक्त मानो ठहर जाता था। नन्हीं सी उम्र में लगातार 16 घंटे तबला बजाकर सितारा देवी जैसी मशहूर कथक नृत्यांगना को हैरत में डाल देने वाले लच्



आसमान पर राज करने वाले, अपने हैरतअंगेज़ करतबों से आसमान को मुट्ठी में कर लेने वाले और दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराने वाले भारतीय वायु सैनिकों का जलवा देखना अपने आप में एक अनुभव से गुज़रने जैसा है। 86वें वायुसेना दिवस के मौके पर हिंडन एयरबेस पर वायुसैनिकों ने पूरी लयबद्धता और तालमेल के साथ जो एयर शो दिखाया, जिस तरह की परेड पेश की और अनुशासन का जो शानदार नमूना दिखाया उससे पूरे देश क

- कलाकारों ने कैनवास पर कलाकृतियों को किया जीवंत - योगी, बुद्ध, श्रीकृष्णा से लेकर प्रकृति के मनोरम दृश्यों को दिया आकार आबू रोड (राजस्थान)। योग-साधना में लीन योगी, गोकुल में गाय के साथ बांसुरी बजाते श्रीकृष्ण, शांत मुद्रा में ध्यान की अवस्था में राजयोगी, प्रकृति का शांत वातावरण और उगते सूरज का अनुपम नजारा। ये दृश्य पेंटिं

'साहित्य की दुनिया न हम से शुरू होती है न हम पर खत्म' गाजियाबाद। सोशल मीडिया के इस दौर में तमाम नए रचनाकारों की बेहतर अभिव्यक्ति तो ज़रूर नज़र आती है लेकिन वो अपने अलावा दूसरों को कितना पढ़ रहे हैं और सचमुच उनमें पढ़ने के प्रति दिलचस्पी है या नहीं, यह देखना बहुत ज़रूरी है। वरिष्ठ लेखक और उपन्यासकार विभूति नारायण राय ने गाजियाबाद के रचनाकारों के बीच अपनी यह च


आज के दौर में आखिर हबीब तनवीर जैसे रंगकर्मी क्यों नहीं हो सकते? दुष्यंत कुमार की चंद लाइनें क्यों सियासी नेताओं के भाषणों का हिस्सा भर बन कर रह जाती हैं? क्यों राही मासूम रज़ा सिर्फ बी आर चोपड़ा के टीवी महाभारत के संवादों के लिए ही कभी कभार याद कर लिए जाते हैं? क्यों इन शख्सियतों को याद करने वाले चंद ही लोग बचे हैं? दरअसल आज रंगमंच और साहित्य जिस दौर में है, या कहिए कि मीडिया और अभिव्य
