तुम भी बैठ जाओ किसी की ‘गोदी’ में…
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June 21, 2020

देख तमाशा दुनिया का...
आलोक यात्री की कलम से
  "अजी सुनते हो... पूरी दुनिया के दफ्तर खुल गए... मुए एक तुम्हारे दफ्तर को ही आग लगी है... कुछ तो शर्म करो... घर से ऑफिस कब तक चलाओगे... अब तो कामवाली से ल

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो…
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June 17, 2020

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो... भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.... इतनी कामयाबी, इतनी शोहरत... लेकिन एक ऐसा अकेलापन जिसने एक बेहतरीन और संभावनाओं से भरे कलाकार को खुदकुशी जैसी कायराना ह

गुलजार देहलवी : तुम याद करोगे हमारे बाद हमें
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June 13, 2020

आनंद मोहन जुत्शी उर्फ गुलज़ार देहलवी साहब बेशक 94साल के रहे हों, लेकिन उनके भीतर का शायर बदस्तूर अपनी पूरी रवानगी के साथ मौजूद था। उनके गुज़रने से दिल्ली वालों का अज़ीम शायर तो चला ही गया, शायरी की दुनिया का वो शख्स भी चला गया जिसकी मौजूदगी का एहसास हर आम ओ खास महफ़िल में ज़रूर होता था। गुलज़ार देहलवी साहब तमाम मंचीय शायरों की उस फ़ौज का हिस्सा नहीं थे, जिनकी मार्केटिंग औ

शहनाई के शहंशाह से मिलना और उन्हें महसूस करना…
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June 11, 2020

राजीव सिंह की कलम से...                                 दिल से एहसानमंद हूँ  बनारस का: बिस्मिल्ला खां   बात क़रीब पचीस बरस पहले की है कोई 1994- 95 की

‘गिरीश कर्नाड सिर्फ नाटककार नहीं एक संस्था थे’
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June 10, 2020

गिरीश कर्नाड की पहली पुण्यतिथि पर अरविंद गौड़ ने उन्हें कुछ इस तरह याद किया....  

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय…
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June 10, 2020

दिल्ली  में आखिर किस हाल में हैं रहीम... चलिए, लॉकडाउन में देखते हैं...  ♦ सुधीर राघव रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय। टूटे पे फिर न जुरे, जुरे गांठ परी जाय।।     Read More

ख्वाज़ा अहमद अब्बास होने का मतलब…
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June 7, 2020

एक लेखक के कितने आयाम हो सकते हैं, समाजवाद और इंसानियत के प्रति उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता किस हद तक हो सकती है ये समझने के लिए हमें ख्वाज़ा अहमद अब्बास की ज़िंदगी को करीब से देखना चाहिए। आज़ादी के आंदोलन के दौरान ख्वाज़ा अहमद अब्बास ने इप्टा से जुड़कर त

जाने ये कैसा ताना-बाना है
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June 5, 2020

करीब 6 सदी पहले के भारत और मौजूदा हिन्दुस्तान के बीच के फासले को देखें तो लगता है कि अगर कबीर आज होते तो क्या आज हमारे आसपास का संसार ऐसा ही होता ? 6 सौ साल पहले वो जो लिख गए, उनका जो चिंतन और दर्शन या यों कहिए कि पंथ अपने आप में एक बेहतरीन दुनिया की कल्पना और सोच से भरा है, क्या अब भी हम ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं? दरअसल कबीर सिर्फ कबीर नहीं थे.. उन्हें युग प्रवर्तक यूं ही नहीं कहा जाता । आ

हम सबके घरों के फिल्मकार थे बासु दा…
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June 4, 2020

आज फिल्मों का जो दौर चल रहा है, उसमें बासु चटर्जी जैसे फिल्मकार की गैर मौजूदगी भीतर कहीं एक शून्य पैदा करती है। उम्र को अगर नज़रअंदाज कर दें तो बासु दा के भीतर ज़िंदगी को देखने का अपना जो नज़रिया रहा वो 60 के दशक से आज तक वैसा ही रहा। आखिरी दिनों में भी उनके भीतर का फिल्मकार विषय तलाशता रहा लेकिन पिछले कुछ बरसों से वो चाहकर भी कुछ नया दे नहीं पाए। साहित्य में उनकी खासी दिलचस

पंडित डी वी पलुस्कर: जिनकी आवाज़ दिल में उतर जाती है…
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June 3, 2020

आज की पीढ़ी भले ही इस आवाज़ से वाकिफ़ न हो, लेकिन यही वो आवाज़ है जिसे शास्त्रीय संगीत में आलाप का जनक माना जाता है।  जी हां दोस्तों, द वेब रेडियो के इस खास

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