केदार जी को याद करने के मायने…

न मिल पाने की टीस और तमाम अपनों की नज़र में केदार जी…

केदार जी का जाना एक सदमे की तरह है। उनसे न मिल पाने की कसक हमेशा रहेगी। कई बार मिलते मिलते रह गया। उनके साथ ठीक वैसे ही खुलकर और पारिवारिक तरीके से हर मसले पर बात करने की तमन्ना रह गई जैसे त्रिलोचन जी के साथ किया करता था। अपने बेहद अज़ीज बड़े भाई राजीव जी के साथ अक्सर यह तय हुआ कि एक दिन उनके घर पर ही केदार जी के साथ कुछ घंटे बिताए जाएं, लेकिन वह संयोग नहीं बन पाया। बीच बीच में खबर मिलती रही कि केदार जी बीमार चल रहे हैं, लेकिन फिर पता चलता वो दिल्ली से बाहर हैं, कभी कोलकाता तो कभी बनारस। और अब जब वो हमेशा के लिए चले गए तो एक टीस मन में रह गई कि काश जैसे भी संभव था, मिल ही लेता, जितना भी वक्त मिलता, बात कर ही लेता।

ये जो हमारे भीतर आराम से बात करने, फुरसत से बैठने और विस्तार से तमाम मुद्दों पर चर्चा करने की ललक हर वक्त बनी रहती है, यही हमें सबसे और दूर कर देती है। बाद में जीवन भर के लिए एक कसक छोड़ जाती है। हमेशा लगता है कि घर का मामला है, मिल लेंगे आज नहीं तो कल.. यही सोच हमें पीछे धकेल देती है। केदार जी सरीखे कई अपने एक एक करके विदा होते जा रहे हैं… और यहीं आकर हम बेबस हो जाते हैं।

केदार जी की कविताओं पर, उनके बारे में, उनके तमाम पहलुओं पर, उनके व्यक्तित्व पर बहुत कुछ कहा-लिखा जा रहा है। सबने उनके साथ जो पल गुजारे, उन्हें जिस तरह महसूस किया, समाज को देखने के उनके संवेदनशील नज़रिये को जिस तरह पकड़ा वो सब अलग अलग मंचों पर, अखबारों में, चैनलों पर, ऑनलाइन संस्करणों में दिख रहा है। उनमें से ही कुछ हम 7 रंग के पाठकों के लिए साभार साझा कर रहे हैं।

पहला आलेख — बीबीसी हिन्दी से साभार

(यह लिंक क्लिक करके भी पढ़ सकते हैं–https://www.bbc.com/hindi/india-43466601 )

नागार्जुन के बाद आधुनिक हिंदी के सबसे लोकप्रिय कवि थे केदारनाथ

मंगलेश डबराल, वरिष्ठ कवि-पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

पहले कुंवर नारायण, फिर चंद्रकांत देवताले और अब केदारनाथ सिंह. एक साल से भी कम समय में हमारे समय के तीन सबसे महत्वपूर्ण कवि एक के बाद एक करके दुनिया से विदा लेकर चले गए.

हिंदी कविता के लिए ये बेहद दुखद समय है. 70-80 साल को पार करने वाली पूरी पीढ़ी विदा लेकर चली गई है. हमारे सामने एक बड़ा सन्नाटा हो गया है, एक शून्य खिंच आया है.

अब नए लोगों को कविता लिखने के लिए प्रेरित करने वाले, उम्मीद जगाने वाले शायद बहुत कम बड़े कवि बचे हैं.

केदारनाथ सिंह हिंदी के ऐसे अनोखे कवि थे जिन्होंने लोक संवेदना, ग्रामीण संवेदना और कस्बाई संवेदना, इन तीनों के लिए आधुनिक हिंदी काव्य भाषा के बीच में जगह बनाई और उसे विकसित किया.

केदार जी की यात्रा नवगीत से शुरू हुई थी. उनके नवगीतों का संग्रह ‘अभी, बिलकुल अभी’ हिंदी में बहुत चर्चित रहा. आज भी, जब हिंदी में नवगीतों की परंपरा लगभग खत्म हो गई है, उनके नवगीत आज भी लोगों को आकर्षित करते हैं.

गिरने लगे नीम के पत्ते, बढ़ने लगी उदासी मन की…इस तरह के जो उनके गीत हैं वो सहज ही लोगों के दिलों में बस गए थे.

इसके बाद वो कस्बाई संवेदना के बीच आए. बनारस में लंबे समय तक रहने के बाद फिर वे पढ़ाने के लिए अपने कस्बे पढ़रौना चले गए. लंबे समय तक शिक्षक रहे. वहां से वे जवाहर लाल नेहरू विश्वविधालय आए. यहां आने के बाद से उनकी कविताओं में एक आधुनिक रूप उभरना शुरू किया.

वे तीसरा सप्तक के महत्वपूर्ण कवियों में थे. ये तब प्रकाशित हुई थी, जब वे बनारस में थे. वहां से होते हुए, नई कविता से होते हुए वे प्रगतिशील संवेदना तक कवि के तौर पर उनकी यात्रा रोमांचक और सार्थक रही.

आधुनिक कविताओं का उनका पहला संग्रह है ‘ज़मीन पक रही है’. यह अत्यंत महत्वपूर्ण संग्रह है. इस संग्रह से उनके प्रगतिशील होने की तरफ बढ़ने के संकेत मिल सकता है. उसके बाद उनके कई काव्य संग्रह आए, सब महत्वपूर्ण हैं.

उनका अंतिम काव्य संग्रह है ‘सृष्टि पर पहरा’. कई अर्थों में यह महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है. एक तो पर्यावरण संबंधी चिंताएं हैं, दूसरे उनकी राजनीतिक वक्तव्यों वाली कविताएं भी हैं. इन सबके साथ इसमें संसार से जाने की उदासी भी है, अपने ही भविष्य को लेकर जो चिंताएं होती हैं वो भी इस संग्रह की उनकी कविताओं में दिखती है.

उनकी लिखी कविताओं का असर कितना होता है, इसे बनारस से समझा जा सकता था. बनारस कविता, बनारस को ऐसे परिपेक्ष्य में देखती है जैसे पहले कभी नहीं देखा गया. बनारस पर काफी कुछ लिखा गया, उसके सांस्कृतिक महत्व को शायद सब लोग जानते हैं लेकिन बनारस को कभी इस तरह नहीं देखा गया जिस तरह से केदार जी ने देखा. बहुत गंभीर होते हुए भी बेहद लोकप्रिय कविता है.

ऐसी एक और कविता है नूर मियां. ये कविता देश के विभाजन पर, बढ़ती हुई सांप्रदायिकता और मुसलमानों की मुश्किलों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की. हालांकि उनका स्वर बहुत मुखर नहीं था, वे बेहद कम शब्दों में सहज अंदाज़ में कविता लिखा करते थे. लेकिन बिना मुखर हुए वे अपने को व्यक्त करते रहे, ये स्वर उनमें हमेशा बना रहा. उन्होंने इसी स्वर में कई महत्वपूर्ण कविताएं लिखीं.

केदार जी हिंदी के उन चुनिंदा कवियों में शामिल हैं जिन्होंने कविता को लोकप्रिय बनाया. उनकी कविता इस बात का उदाहरण है कि कैसे गंभीर होते हुए कविता को लोकप्रिय बनाया जा सकता है. उन्होंने गंभीर कविता और लोकप्रिय कविता के बीच के अंतर को पाटा.

वो खुद भी बेहद लोकप्रिय थे. मेरे ख्याल से आधुनिक हिंदी में बाबा नागार्जुन के बाद उनके जितना लोकप्रिय शायद ही कोई कवि रहा होगा.

उनके शिष्यों, जो बहुत हैं, के अलावा समाज में ऐसे ढेरों लोग हैं जो उनकी कविताओं को पढ़ते रहे, उनसे प्रेम करते रहे. गांव, कस्बे से लेकर वो जहां जहां गए- रहे, वहां के लोग उनको अपना.

केदार जी की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि वे अनुभव को बेहद आत्मीय और आत्मीय ढंग से पेश करते रहे. उनमें कोई ओढ़ी विद्धता या विद्धता का कोई विकार नहीं था. वे हमेशा देहाती, गांव के आदमी बने रहे. उनका मूल स्वभाव भी यही था.

इसलिए उनकी कविताओं में गांव से कस्बे में आने का, कस्बे से दिल्ली जैसे बड़े शहर में आने का तनाव भी दिखता है. ऐसे तनाव का इस्तेमाल जिस तरह से वो कविताओं में इस्तेमाल करते हैं वो भी अनोखा है.

दिल्ली के बारे में उनकी एक कविता देखिए- बारिश शुरू हो रही है, बिजली गिरने का डर है, वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर हैं.

राजनीतिक टिप्पण्णियां भी उनके कविता में बखूबी मिलती हैं. उनकी लिखी एक गजल है-

एक शख्स वहां जेल में है, सबकी ओर से

हंसना भी यहां जुर्म है क्या, पूछ लीजिए

अब गिर गई जंजीर, बजाएं तो क्या भला

क्या देंगे कोई साज नया, पूछ लीजिए

ऐसी टिप्पण्णियां मिलती हैं, लेकिन लोगों को उम्मीद थी कि वो ज्यादा मुखर होकर राजनीतिक हालात पर टिप्पण्णी करेंगे, लेकिन हर कवि का अपना शिल्प होता है.

केदार जी की कविताओं में सौंदर्य के दर्शन होते हैं. जीवन में सुंदरता और कोमलता कहां कहां मिल सकती है, उनकी कविताएं हमें वह टटोलने में मदद करती है, उन जगहों पर वे हमें ले जाते हैं.

उनकी एक कविता है सृष्टि पर पहरा. वे लिखते हैं-

कितना भव्य था

एक सूखते हुए वृक्ष की फुनगी पर

तीन चार पत्तों का हिलना

उस विकट सुखाड़ में

सृष्टि पर पहरा दे रहे थे

तीन चार पत्ते

इस कविता के माध्यम से उन्हें उम्मीद है कि रेगिस्तान में तीन चार पत्ते भी हैं तो सृष्टि का निर्माण कर सकते हैं.

उनकी एक सशक्त एवं मार्मिक कविता है-

मैं जा रही हूं- उसने कहा.

जाओ- मैंने उत्तर दिया

ये जानते हुए कि जाना

हिंदी की सबसे खौफ़नाक क्रिया है

इस छोटी से कविता में देख लीजिए जीवन और वियोग की पूरी दुनिया छुपी है. एक और कविता में वे लिखते हैं-

उसका हाथ

अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा

दुनिया को

हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए

अब देखिए हाथ की उष्मा से दुनिया की तुलना. एक कवि यही तो करता है छोटी छोटी चीज़ों के माध्यम से अपना बड़ा वक्तव्य सामने रखता है.

केदार जी जितने सहज कवि थे, उतने ही सरल और मार्मिक मनुष्य भी थे. आत्मीयता से लोगों से मिलते थे. वे कविता के बारे में बात नहीं करते थे.

अपने बारे में और अपनी कविताओं के बारे में तो बिलकुल नहीं, ये उनको पसंद नहीं था.

कई जगहों पर मैंने देखा कि कविता पढ़ने से पहले अगर उनके परिचय में कुछ ज्यादा बोला जाता तो वो टोक देते, रहने दीजिए बहुत हो गया.लेकिन पढ़रौना के अपने दोस्तों नूर मियां, कैलाशपति निषाद जैसे दोस्तों को बारे में खूब बात करते थे. साल में दो-तीन पर अपने गांव ज़रूर जाते रहे. अपने लोगों के बीच बैठते थे, वही उनका संसार बना रहा.

उनके जीवन में पत्नी के निधन का सन्नाटा भी दिखता है, अक्सर उनके बारे में बातें करते थे. उन्होंने अपने अकेलेपन को पत्नी को समर्पित करते हुए भी कविताएं लिखी हैं. हिंदी में पत्नी पर लिखी बहुत कविताएं हैं और उनमें केदार जी की कविता बहुत अच्छी है.

मां और पिता पर भी उन्होंने कविताएं लिखी हैं. पिता पर लिखी कविता की पंक्ति दिलचस्प- ‘जिस मुंह ने मुझे चुमा था, अंत में उस मुंह को मैंने जला दिया.’

दरअसल उनके सरोकार भी बहुत थे. भाषा को लेकर भी. भोजपुरी में उन्होंने तमाम कविताएं लिखी हैं. भिखारी ठाकुर बहुत मार्मिक कविता लिखी है उन्होंने, संभवत भिखारी ठाकुर पर ये पहली कविता है.

वैसे संयोग ये है कि उनका अंतिम संग्रह है सृष्टि पर पहरा, उस संग्रह की अंतिम कविता है- ‘जाऊंगा कहां.’ ऐसा लगता है कि ये उनका अंतिम वक्तव्य है-

जाऊंगा कहां, रहूंगा यहीं

किसी किवाड़ पर

हाथ के निशान की तरह

पड़ा रहूंगा

किसी पुराने ताखे

या संदूक की गंध में

छिपा रहूंगा मैं

दबा रहूंगा किसी रजिस्टर में

अपने स्थायी पते के

अक्षरों के नीचे

या बन सका

तो ऊंची ढलानों पर

नमक ढोते खच्चरों की

घंटी बन जाऊंगा

या फिर मांझी के पुल की

कोई कील

जाऊंगा कहां

देखना

रहेगा सब जस का तस

सिर्फ मेरी दिनचर्या बदल जाएगी

सांझ को जब लौटेंगे पक्षी

लौट आऊंगा मैं भी

सुबह जब उड़ेंगे

उड़ जाऊंगा उनके संग…

तो केदार जी भी उड़ गए लेकिन वे कहां कहां रहेंगे, यह उन्होंने पहले ही बता दिया है.

 

दूसरा आलेख — द वायर से साभार

(यह लिंक क्लिक करके भी पढ़ सकते हैं–http://thewirehindi.com/37885/kedarnath-singh-hindi-literature/)

‘कथाओं से भरे इस देश में… मैं भी एक कथा हूं’

हिंदी साहित्य के संसार में केदारनाथ सिंह की कविता अपनी विनम्र उपस्थिति के साथ पाठक के बगल में जाकर खड़ी हो जाती है. वे अपनी कविताओं में किसी क्रांति या आंदोलन के पक्ष में बिना शोर किए मनुष्य, चींटी, कठफोड़वा या जुलाहे के पक्ष में दिखते हैं.

Kedarnath Singh Final

केदारनाथ सिंह (जन्म: 7 जुलाई 1934, अवसान: 19 मार्च 2018) (फोटो साभार: लोकसभा टीवी/यू ट्यूब)

समकालीन भारतीय कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर केदारनाथ सिंह का 19 मार्च 2018 को निधन हो गया. उन्हें 1989 में साहित्य अकादमी और 2013 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. नवंबर 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में जन्मे केदारनाथ सिंह ने अपना शैक्षिक करियर पडरौना के एक कॉलेज से शुरू किया था. बाद में वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय चले गए. वे एक उम्दा कवि और अध्यापक के रूप में वहां मशहूर थे.

उनसे जुड़ी एक बात याद आती है. वे इलाहाबाद में 20 और 21 जून 2015 को ‘उजास- हमारे समय मे कविता’ नामक एक आयोजन में बोलने आए थे. सबसे पहले उन्हें ही बोलना था लेकिन इस कार्यक्रम के आयोजक ने कार्यक्रम का परिचय देने में बहुत समय ले लिया और श्रोताओं को घनघोर तरीके से उबा दिया.

जब कवि केदारनाथ सिंह बोलने आए तो उन्होंने अपने कुरते की जेब से एक पुर्जी निकाली और एक तिब्बती कवि की कविता का अनुवाद पढ़ा और मुकुटधर पाण्डेय की तीन-चार लाइनें कहकर अपनी सीट पर बैठ गए. यह एक कवि का दूसरे कवि के प्रति सम्मान भाव था, उससे ज्यादा एक निर्वासित समुदाय के कवि की पीड़ा को वह ‘हमारे समय में कविता’ के मंच पर उपस्थित सभी कवियों की साझा चिंता बना रहा था.

बीसवीं शताब्दी की रूसी कविताओं का एक अनुवाद साहित्य अकादमी ने ‘तनी हुई प्रत्यंचा’ के नाम से प्रकाशित किया है. इसे रूसी भाषा के जानकार वरयाम सिंह ने अनूदित किया था और संपादन केदारनाथ सिंह ने किया था. अपने एक संक्षिप्त संपादकीय में उन्होंने त्स्वेतायेवाकी की लोकबिंब से आधुनिक जीवन का तीखा द्रव्य निचोड़ लेने की क्षमता और मंदेल्स्ताम के चट्टान जैसे काव्य शिल्प की सराहना की थी. यह बात कमोबेश उनके लिए भी सही है.

उन्होंने अपनी कविता यात्रा में अपने मानकों में कोई ढील नहीं दी. लोकबिंब से आधुनिक जीवन का तीखा द्रव्य उनकी कविताओं लगातार व्याप्त है. अपनी कविताओं में किसी क्रांति या परिवर्तनकामी आंदोलन के पक्ष में बिना शोर किए वे मनुष्य, चींटी, कठफोड़वा या जुलाहे के पक्ष में खड़े हो जाते हैं.

उनकी कविता हिंदी साहित्य के संसार में अपनी विनम्र उपस्थिति के साथ अपने पाठक के बगल में जाकर खड़ी हो जाती है,

जैसे चींटियां लौटती हैं

बिलों में

कठफोड़वा लौटता है

काठ के पास

वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक

लाल आसमान में डैने पसारे हुए

हवाई-अड्डे की ओर

 

ओ मेरी भाषा

मैं लौटता हूं तुम में

जब चुप रहते-रहते

अकड़ जाती है मेरी जीभ

दुखने लगती है

मेरी आत्मा

जैसे दुनिया के तमाम दानिशवर और कवि होते हैं, वैसे ही केदारनाथ सिंह भी थे- उन्हें भाषा पर भरोसा था. यह भी कि लोग बोलेंगे ही , वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा.

प्रेम के नितांत व्यक्तिगत क्षणों को वे जितनी आसानी से कविता में कह जाते थे, वह किसी उस्ताद के बस की ही बात थी. उनकी मृत्यु के बाद उनकी ढेर सारी कविताएं साइबर संसार में आसमान के नीले रंग की भांति फैल गयी हैं लेकिन उनकी एक कविता तो हिंदी संसार में विदा गीत का रूप ले चुकी है,

साभार: ख्वाब तनहा कलेक्टिव

साभार: ख्वाब तनहा कलेक्टिव

मैं जा रही हूं – उसने कहा
जाओ – मैंने उत्तर दिया
यह जानते हुए कि

जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है.

विदा की तरह उनकी कविता का यह बिंब उतना मार्मिक, विस्तीर्ण और सहज है,

उसका हाथ

अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा

दुनिया को

हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए.

उनके लिए कविता कोई व्यक्तिगत किस्म की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि वह दुनिया को बनाने का एक उष्मीय इरादा रखती थी.

मृत्यु बोध, बनारस और केदारनाथ सिंह

केदारनाथ सिंह की कविताओं में मृत्यु को लेकर एक विकल संवेदना सदैव व्याप्त रहती है. उन्होंने मनुष्य के ‘होने’ पर जितनी गहराई से सोचा-समझा और लिखा उतना ही उसके न होने पर लिखा,

यों हम लौट आए
जीवितों की लम्बी उदास बिरादरी में

कुछ नहीं था
सिर्फ़ कच्ची दीवारों
और भीगी खपरैलों से
किसी एक के न होने की
गंध आ रही थी.

उनका बनारस जितना जीवन का शहर है, उतना ही मृत्यु का भी.

यह शहर इसी तरह खुलता है

इसी तरह भरता

और खाली होता है यह शहर

इसी तरह रोज-रोज एक अनंत शव

ले जाते हैं कंधे

अंधेरी गली से

चमकती हुई गंगा की तरफ

इस शहर में धूल

धीरे-धीरे उड़ती है

एक भिन्न संदर्भ में ए. अरविंदाक्षन, जिसे कविता की मिट्टी कहते हैं, केदारनाथ सिंह की कविता की वह मिट्टी पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक गंवई और सहज ज्ञानी कवि की है,

सिर्फ

कुत्तों की आंखों में

जहर की चमक

सिर्फ भैंसों के थनों में दूध का तनाव

वह आदमी के सर उठाने की यातना है

आदमी का बुखार

आदमी की कुल्हाड़ी

जिसे वह कंधे पर रखता है

और जंगल की ओर चल देता है

उनकी कविता पशुओं के बुखार, बढ़ई और चिड़िया, जाड़ों के शुरू में आलू पर जितनी सहजता से बात करती है उतनी ही शिद्दत से मडुआडीह की तरफ से आने वाले बसंत की.

उनकी कविता को ध्यान से पढ़ने-गुनने पर बनारस एक बिंब के रूप में आता है. जिन सारी चीजों से यह शहर बनता है, वह उनकी कविता की बुनावट में चला आता है- चाहे वह कबीर के ऊपर लिखी कविताएं हों या धागों के बारे में,

दरियों में दबे हुए धागो उठो
उठो कि कहीं कुछ गलत हो गया है
उठो कि इस दुनिया का सारा कपड़ा
फिर से बुनना होगा
उठो मेरे टूटे हुए धागो
और मेरे उलझे हुए धागो उठो

बाघ और केदारनाथ सिंह

केदारनाथ सिंह एक उम्दा कवि होने के साथ-साथ बेहतरीन शोधकर्ता रहे हैं. हिंदी कविता के बिंब विधान पर जब उनका काम आया था तो उसने आलोचकों और विद्यार्थियों का ध्यान खींचा था. वे विंब की ताकत जानते थे.

वे जानते थे कि मनुष्य अपने कल्पना लोक में कितना उर्वर, राजनीतिक और फितनागर हो सकता है. उन्होंने भारतीय साहित्य में बाघ की उपस्थिति पर सोचा और बाघ जैसी कालजयी कविता लिखी.

इस कविता के बारे में उन्होंने खुद ही कहा है कि बाघ हमारे लिए आज भी हवा-पानी की तरह प्राकृतिक सत्ता है, जिसके होने साथ हमारे अपने होने का भवितव्य जुड़ा हुआ है.

इस प्राकृतिक बाघ के साथ उसकी सारी दुर्लबता के बावजूद-मनुष्य का एक ज्यादा गहरा रिश्ता है, जो अपने भौतिक रूप में जितना आदिम है, मिथकीय रूप में उतना ही समकालीन. बाघ इसी समकालीनता को हिंदी कविता के पाठक के सामने रखती है,

कथाओं से भरे इस देश में

मैं भी एक कथा हूं

एक कथा है बाघ भी

इसलिए कई बार

जब उसे छिपने को नहीं मिलती

कोई ठीक-ठाक जगह

तो वह धीरे से उठता है

और जाकर बैठ जाता है

किसी कथा की ओट में

कथाओं के इस देश में केदारनाथ सिंह अपने पाठक के पास एक सादे पन्ने के बचे रहने की उम्मीद रखते थे,

कविता यही करती है

यही सीधा मगर जोखिम भरा काम

कि सारे शब्दों के बाद भी

आदमी के पास हमेशा बचा रहे एक पन्ना

(रमाशंकर सिंह भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में फेलो हैं.)

Posted Date:

March 20, 2018

8:59 pm

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