कुंवर नारायण जी की ‘अयोध्या’ और उनके ‘राम’

कोई वाद नहीं, फिर भी असली जनवादी

कुंवर नारायण बेशक 90 साल के हो गए हों, बीमार भी रहे हों, लेकिन उनका चले जाना कई स्मृतियों को फिर से ताजा कर गया। लखनऊ में हुई उनसे एकाध मुलाकातें और कुछ समारोहों में उनकी बेहद संज़ीदा और सरल उपस्थिति। वो किसी वाद के शिकार नहीं थे फिर भी वो जनवादी थे। वो किसी विचारधारा में बंधे नहीं थे लेकिन लिखने में वो आपके बेहद करीब खड़े दिखते थे, एकदम हमारे आपके पास, ज़िंदगी की उलझनों और हकीकतों के साथ चलते हुए। कुंवर जी बेहद कम बोलते थे, नपे तुले अंदाज़ में लेकिन जब बोलते थे तो उनके चंद वाक्य भी मानो कविता बन जाते थे। जाहिर है किसी शख्सियत का जाना और उसके बाद आज की मीडिया में गूगल में उनकी तलाश और फिर उनके बारे में लिखने की खबरनुमा होड़… वो कब और कहां जन्मे, क्या लिखा पढ़ा, कितने अवार्ड जीते, अरे, उन्हें तो ज्ञानपीठ भी मिल चुका है.. अच्छा, तो इतना सारा लिख गए कुंवर नारायण जी.. फिर उन्हें समेटने की कोशिश। पहले ख़बर, फिर उनकी कुछ रचनाएं और वो सबकुछ जो आज के ज़माने में एक मुख्य धारा की मीडिया में ज़रूरी होता है।

बेशक, एक रचनाकार हमें छोड़ कर चले जाने के बाद पहचाना जाता है। थोड़े वक्त के लिए ही सही, याद किया जाता है और अजीब त्रासदी है कि 80 पार जाते जाते उसके जाने का कहिए, न कहिए… इंतज़ार शुरू हो जाता है। लेकिन कुंवर नारायण इस इंतजार से भी इतर गुम सुम से चले गए।

आज के दौर में उनकी कौन सी कविता मौजूं होगी, तलाश की तो कविताकोष में एक कविता मिल ही गई। अयोध्या का हो हल्ला फिर से है… भाजपा की सरकार है तो होना भी चाहिए.. श्री श्री रविशंकर विवाद सुलझाने के लिए लाए गए हैं। शायद कोई क्रांति हो ही जाए… इस सरकार ने बहुत सारे ऐसे महान काम करने का दावा किया है ‘जो पहले कभी नहीं हुए’।

तो साहब, कुंवर नारायण जी की ये कविता भी पढ़ लीजिए। शायद राम के नाम पर कुछ सदबुद्धि ही आ जाए। अगर आ जाए तो सचमुच कुंवर नारायण जी को ये सच्ची श्रद्धांजलि होगी। पढ़ के देखिए….

अयोध्या, 1992

 

हे राम,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकाव्य !

तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस बीस नहीं
अब लाखों सर – लाखों हाथ हैं,
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ है.

इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं
चुनाव का डंका है !

हे राम, कहां यह समय
कहां तुम्हारा त्रेता युग,
कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहां यह नेता-युग !

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुरान – किसी धर्मग्रन्थ में
सकुशल सपत्नीक….
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक !

Posted Date:

November 16, 2017

1:55 am Tags: , , , , , , ,

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