डॉक्टर शन्नो खुराना जीते जी एक किवदंती बन गयी हैं

पिछले दिनों राजधानी में एक ऐसी शाम बीती जो हिंदुस्तानी संगीत की एक तपस्विनी के नाम रही जिसने संगीत के तीन घराने की गायकी की और वह एक जीता जागता इतिहास बन चुकी हैं। 23 दिसम्बर 1927 को राजस्थान में जन्मी शन्नो खुराना ने लाहौर रेडियो से 25 रुपए के पारिश्रमिक से 1945 में अपने गायन की शुरुआत की थी। पद्मविभूषण से सम्मानित शन्नो खुराना 1956 में शीला भाटिया के हीर रांझा ओपेरा से मशहूर हुई थीं। उन्होंने रेडियो से लेकर यूनेस्को के पेरिस में कार्यक्रम तक तथा अरब देशों और गाजा पट्टी में भी ट्रक पर गाया है। वह जीते जी किवदंती बन चुकी हैं। इस समय वह देश की सबसे बुजुर्ग महिला कलाकारों में हैं। देश में शीला भाटिया और शन्नो खुराना ने देश में ओपेरा की नींव रखी।
ठाकुर जयदेव सिंह की शिष्या शन्नो खुराना ने 8 दशक की अपनी संगीत यात्रा के जरिये संगीत का एक अभिलेखागार ही खड़ा कर दिया है।रामपुर सहसवान घराने की इस गायिका ने देश विदेश में अपनी गायिकी की अप्रतिम छाप छोड़ी है। रज़ा फाउंडेशन की ओर से आयोजित आर्ट मैटर्स  में सुष्मिता झा की शन्नो खुराना पर प्रकाशित पुस्तक पर चर्चा के दौरान कई लोगों को इस गायिका के बारे में नई  अद्भुत जानकारियां मिली।


अनेक पुरस्कारों से सम्मानित इस गायिका को कवि राजेन्द्र शर्माकी ओर से एक शानदार मोनोग्राफ भी भेंट किया गया।श्री शर्मा ने उनपर अब तक 40 लेख इंटरव्यू आदि लिए और लिखे है ।उनपर एक किताब भी आएगी।
शन्नो जी के नाती अमन आहूजा और मधुप मुद्गल ने शन्नो जी के काम पर चर्चा की एवम शन्नो जी के तीन चार पुराने गाने भी सुनाए गए।
शन्नो खुराना पर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए एक पुस्तक लिख चुकी सुष्मिता झा ने भी गा कर अपनी गुरु माँ की गायिकी को समझाया। मधुप मुद्गल ने शन्नो जी से कुछ महत्वपूर्ण सवाल भी किये मसलन आप तीन घराने की गायकी की बंदिशें गाती रही तो आपको सुर बदलने में कोई परेशानी तो नहीं हुई।


शन्नो जी ने कहा कि उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई क्योंकि ग्वालियर घराने की गायिकी तीनों घराने के निकट भी है।व्हील चेयर पर बैठी शन्नो जी ने कहा कि आज का दिन उन्हें बहुत अच्छा लगा।मधुप मुद्गल को तो हमने बच्चे से देखा है।उंनसे पारिवारिक रिश्ता था ।गंधर्व महाविद्यालय की एक एक ईंट में मधुप के पिता जी समाए हैं।उन्हें मैँ भाई जी कहती थी।
अमन आहूजा ने बताया कि मेरी नानी के पास संगीत की इतनी दुर्लभ सामग्री है कि वह एक अभिलेखागार की तरह बन गया है और उससे संगीत का एक इतिहास लिखा जा सकता है।

उन्होंने यह भी बताया कि उस दुर्लभ सामग्री में मुल्कराज आनंद की वह ओपेरा समीक्षा भी है जिसमे नानी ने भाग लिया था।इतने लोगों ने नानी पर इतनी समीक्षाएं लिखीं हैं कि उनकी कतरनों को पढ़कर संगीत समीक्षा में आये बदलावों को भी जाना जा सकता है।इतना ही नहीं रेडियो पर इतने कार्यक्रम दिए कि उनके कांट्रेक्ट पेपर से उनमें आये बदलाव को भी जाना जा सकता है।इस तरह करींब 80 साल के संगीत का इतिहास नानी के साथ बीता है।

— अरविंद कुमार

Posted Date:

October 15, 2026

12:58 pm Tags: , , , ,

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