उन शख्सियतों की यादें जिन्होंने साहित्य, कला, संस्कृति के क्षेत्र में अहम मुकाम हासिल किए…

पृथ्वी थियेटर ,मुंबई महानगर के उपनगर , जुहू में एक ऐसा मुकाम है जहां बहुत सारे लोगों ने अपने सपनों को रंग दिया है .यह थियेटर अपने पिता स्व पृथ्वीराज कपूर की याद में शशि कपूर और उनकी पत्नी जेनिफर कपूर से बनवाया था. शशि कपूर अपने परिवार में एक अलग तरह के इंसान थे .उनकी मृत्यु की खबर सुनकर उनके गैरफिल्मी काम की याद आ गयी जो दुनिया भर में नाटक की राजधानी के रूप में जाना जाता है .
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कुंवर नारायण बेशक 90 साल के हो गए हों, बीमार भी रहे हों, लेकिन उनका चले जाना कई स्मृतियों को फिर से ताजा कर गया। लखनऊ में हुई उनसे एकाध मुलाकातें और कुछ समारोहों में उनकी बेहद संज़ीदा और सरल उपस्थिति। वो किसी वाद के शिकार नहीं थे फिर भी वो जनवादी थे। वो किसी विचारधारा में बंधे नहीं थे लेकिन लिखने में वो आपके बेहद करीब खड़े दिखते थे, एकदम हमारे आपके पास, ज़िंदगी की उलझनों और हकीकतों के सा
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विजयदान देथा ने साहित्य को क्या दिया और उनकी कहानियों पर बनी कुछ चुनिंदा फिल्मों ने अपनी क्या छाप छोड़ी, ये समझना है तो देथा का जानना ज़रूरी है। बेशक देथा राजस्थान के हों, उनकी कहानियों में परिदृष्य भी वहीं के हों, लेकिन जो सवाल उन्होंने उठाए और जिस रचना संसार के लिए वो जाने जाते हैं उसका दायरा बहुत बड़ा है। उन्होंने समाज को इतने करीब से देखा, परंपराओं और सामाजिक विसंगतियों के जो कथा
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