विजयदान देथा की कहानियां महज ‘कहानियां’ नहीं हैं….

‘बिज्जी’ आज भी हमारे बीच हैं…

  • शिवम् कटियार

विजयदान देथा ने साहित्य को क्या दिया और उनकी कहानियों पर बनी कुछ चुनिंदा फिल्मों ने अपनी क्या छाप छोड़ी, ये समझना है तो देथा को जानना ज़रूरी है। बेशक देथा राजस्थान के हों, उनकी कहानियों में परिदृष्य भी वहीं के हों, लेकिन जो सवाल उन्होंने उठाए और जिस रचना संसार के लिए वो जाने जाते हैं उसका दायरा बहुत बड़ा है। उन्होंने समाज को इतने करीब से देखा, परंपराओं और सामाजिक विसंगतियों के जो कथात्मक विश्लेषण किए और साहित्य का जो एक नया संसार गढ़ा, उससे वो सामयिक रचनाकारों की सबसे अगली कतारों में खड़े दिखते हैं। चार साल पहले 10 नवंबर को विजयदान देथा ने अंतिम सांस ली, लेकिन अपनी रचनाओं में वो हमेशा हम सबके बीच हैं।

अपने साहित्यिक सफ़र में विजयदान देथा कब सबके लिए ‘बिज्जी’ बन गए और कब उनकी रचनाएं राजस्थान से बाहर निकल कर साहित्य जगत की अनमोल पूंजी बन गईं, ये देथा खुद नहीं समझ सके। बेहद सरल और ज़मीन से जुड़े बिज्जी को बेशक साहित्य अपने पिता और दादा से विरासत में मिला हो, लेकिन उनकी शैली और विधा दोनों ही अपने पिता सबलदान देथा और दादा जुगतिदान देथा से अलग थी। पिता और दादा कवि थे, लेकिन बिज्जी कहानीकार और उपन्यासकार। हालांकि शुरूआत उन्होंने भी कविताओं से ही की लेकिन पहचाने गए अपनी उन तकरीबन आठ सौ कहानियों की बदौलत जो बाद के दिनों में कई फिल्मकारों की पसंद बनीं। बेशक किसी रचनाकार की हर रचना खुद उसको भी याद नहीं रहती, कई टुकड़ों और कई कालखंडों में लिखी जाती है, बिज्जी को जानने वाले भी बताते हैं कि उन्होंने इतना कुछ लिखा है कि सब छप भी नहीं सका। उन रचनाओं का संकलन उनके बेटे कैलाश कबीर कर रहे हैं। कैलाश ने ही उनकी कहानियों के अनुवाद भी किए। बिज्जी मूल रूप से राजस्थानी में ही लिखते रहे, हिन्दी या अन्य भाषा में उनका लिखा जो कुछ आप पढ़ेंगे वो अनुदित है।

1 सितंबर 1926 को जन्में देथा के लिए उनके लेखन का आधार बना उस दौर की सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था। जोधपुर के बोरुंदा गांव में रहते हुए उन्होंने खूब लिखा। बच्चो के लिए इतना लिखा कि उन्हें बच्चों का साहित्यकार भी कहा गया। कहानियों में भी जो प्रचलित मान्यताएं थीं, परंपरागत लोक कथाएं थीं और सामंतवाद का जो सामाजिक प्रभाव था, उसकी झलक बेहद सरल और दिलचस्प अंदाज़ में मिलता है। जाहिर है लेखन जब पहचाना जाता है तो पुरस्कार भी मिलते हैं – देथा को पद्मश्री तो मिला ही, साहित्य अकादमी पुरस्कार, राजस्थानी साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद सम्मान और साहित्य चूड़ामणि सम्मान भी मिला। फिल्मकारों को उनकी कहानियां भाईं तो श्याम बेनेगल, मणि कौल, प्रकाश झा और अमोल पालेकर ने फिल्में भी बनाईं। इनमें से कुछ जैसे चरणदास चोर, परिणति, पहेली और दुविधा जैसी फिल्में काफी पसंद की गईं।

विजयदान देथा ने बच्चों के लिए खूब कहानियां लिखी -, चतुर गड़ेरियों, मूर्ख राजाओं, चालाक भूतों और समझदार राजकुमारियों पर देथा ने जो कहानियां बुनीं वो बच्चों में खासी लोकप्रिय हुईं। जाने माने साहित्यकार अशोक वाजपेयी देथा के योगदान को हिन्दी साहित्य में अनूठा मानते हैं। उनके मुताबिक बिज्जी ने राजस्थान की बहुत सारी लोक कथाओं को नया स्वरूप दिया है, नई शैली दी है।

Posted Date:

November 9, 2017

8:33 pm

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