उन शख्सियतों की यादें जिन्होंने साहित्य, कला, संस्कृति के क्षेत्र में अहम मुकाम हासिल किए…

सतीश आनंद का जाना बेशक हिन्दी रंगमंच और खासकर पटना और बिहार के रंगमंच के लिए एक बड़ा शून्य पैदा करता है... बेशक तीश आनंद ने उस दौर में पटना में रंगमंच को एक नई दिशा दी और रंगकर्मियों को एक बड़ा मंच दिया जब साहित्य संस्कृति और खासकर रंगमंच एक मुश्किल दौर में था, दर्शकों को मंच तक लाना एक चुनौती थी और इसे समाज से जोड़कर एक सार्थक मिशन की तरह आगे ले जाना भी आसान नहीं था.. वो दौर था जब कालीदास र
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एक ऐसी फिल्म जिसने लगातार पचास सालों तक अपनी अहमियत बनाए रखी और अबतक की सबसे सुपर डुपर हिट फिल्म साबित हुई। शोले के पचास साल पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। हरेक के अपने अनुभव हैं, हर किरदार के अपने मायने हैं। अपना अपना नज़रिया भी है। तो 7 रंग के पाठकों के लिए इस फिल्म के बारे में जाने माने लेखक और फिल्म पत्रकार प्रताप सिंह की किताब सिनेमा का जादुई सफ़र के कुछ हिस्से भी ज़रूर पठनीय होंगे।
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किशोर कुमार के गीतों में यूडलिंग का इस्तेमाल कैसे हुआ और कैसे किशोर दा ने फिल्म झुमरू में इसका ऐसा प्रयोग किया कि वह आज तक तमाम गायकों के लिए एक मिसाल है... ऐसे तमाम पहलुओं पर, किशोर कुमार को पहचान देने वाली फिल्मों पर और बड़े भाई अशोक कुमार के साथ उनके रिश्तों पर पेश है ये चौथी कड़ी.... प्रताप सिंह की कलम से
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यह हमें याद रखना चाहिए गमगीन-गीतों की शबाहत {FORM} को अपने हुनर का रंग देने में माहिर किशोर दा का मूल स्वर शोक-गीतों के लिए नहीं है। उनकी पहचान रोमांटिक -मूड के गीतों पर कहीं ज्यादा निर्भर रही। दो अलग पीढ़ियों के सुपर-स्टार देवानन्द और राजेश खन्ना के लिए ‘रोमांटिक- मूड और जवां- दिलों’ को जगाते गीतों में किशोर कुमार की आवाज़ ज्यादा फबती रही। फिल्म तीन देवियाँ का--अरे यार ! मेरी तुम भी हो..गज़ब !
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किशोर कुमार के रोमान्टिक गानों के इस दौर और पूर्व-दीप्तियों के बाद के भी शिखर-गीतों के लम्हे कितने ही पुरपेच रहे हों, पर वही उनके फ़राज़ की निशानियों से भरपूर हैं। उनकी अलबेली (शास्त्रीयता से मुक्त) गायिकी की यादें भी बाद की (शास्त्रीयता-युक्त) स्वर- लहरियों और उनके गुनगुने तरन्नुम के साथ दिलों में बसी हैं। खिलंदड़ी सी आवाज़ का बहुआयामी रूप किसी दूसरे कलावन्त को (इतना) उस दौर में कम
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सदाबहार किशोर कुमार 4 अगस्त 1929 को खंडवा में जन्मे थे और उन्होंने फिल्म संगीत की दुनिया में जो कमाल किया, उसे बताने की ज़रूरत नहीं। किशोर कुमार की जयंती के मौके पर जाने माने लेखक-फिल्म पत्रकार और फिल्मों की गहरी समझ रखने वाले प्रताप सिंह ने अपनी किताब 'इन जैसा कोई दूसरा नहीं' में संपूर्णता से याद किया है। तमाम पहलू हैं किशोर दा के। 7 रंग के पाठकों के लिए प्रताप सिंह के आलेख को चार खंडों म
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गुरुदत्त ने जो फिल्में कीं, जिन कहानियों को पूरी संवेदनशीलता के साथ परदे पर उतारा, जिन पात्रों को जिया और दुनिया की जिन सच्चाइयों को सामने ले कर आए, वह अपने आप में किसी अंतहीन मिसाल से कम नहीं.... उनके पूरे कामकाज पर , किरदारों पर, फिल्मों के विस्तृत फलक पर जाने माने लेखक और क्लासिक फिल्मों को गहराई तक समझने, परखने वाले प्रताप सिंह ने अपनी किताब सिनेमा का जादुई सफ़र में बहुत विस्तार से ल
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944 की गर्मियाँ...। रावलपिंडी स्टेशन पर एक बड़ी भीड़ फ्रंटियर मेल का इंतजार कर रही थी। शहर का एक होनहार युवा बी.बी.सी., लंदन की नौकरी से वापस लौट रहा था। वहाँ के लिए यह एक गर्व की बात थी। स्टेशन पर युवक के माता-पिता, भाई, रिश्तेदार उसके दोस्त और रावलपिंडी के कई महत्त्वपूर्ण लोग हाथों में फूलों की मालाएँ लिए उसका स्वागत करने के लिए बेचैन हो रहे थे...। तभी ट्रेन आकर रूकी.... सब फर्स्ट क्लास के डिब्ब
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