देश विदेश के अलग अलग हिस्सों में भारतीय साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े तमाम कार्यक्रम होते हैं, ढेर सारी गतिविधियां होती हैं। कई ख़बरें भी होती हैं जो हम तक नहीं पहुंच पातीं। गोष्ठियां, कार्यशालाएं होती हैं, रंगकर्म की तमाम विधाओं की झलक मिलती है और लोक संस्कृति के कई रूप दिखते हैं। नए कलाकार, नई प्रतिभाएं और संस्थाएं साहित्य-संस्कृति को समृद्ध करने की कोशिशों में लगे रहते हैं लेकिन उनकी जानकारी कम ही लोगों तक पहुंच पाती है। हमारी कोशिश है कि इस खंड में हम ऐसी ही गतिविधियों और ख़बरों को शामिल करें … चित्रों और वीडियो के साथ।

साहित्य देश और समाज की तस्वीर हमारे सामने लाने का शाश्वत जरिया है। कलमकार के रूप में हमारी जिम्मेदारी है कि हम देश में पनप रही विद्रूपताओं और विसंगतियों को देखें, समझें और इस बात का आकलन करें कि इनके निस्तारण में एक कलमकार भूमिका कैसे निभाए। मीडिया 360 लिट्रेरी फाउंडेशन के "कथा संवाद" को संबोधित करते हुए कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ. अशोक मैत्रेय ने उक्त उद्गार प्रकट किए। डॉ. मैत्रेय ने कहा à¤
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दुनियाभर में मनाये जा रहे अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर इफको आंवला टाउनशिप स्थित कम्यूनिटी सेन्टर में बड़ी संख्या में महिलाओं, बच्चों और इफको के वरिष्ठ अधिकारियों ने योगासन किया। आंवला इकाई के वरिष्ठ महाप्रबन्धक राकेश पुरी ने द्वीप प्रज्वलित कर अंतरराष्ट्रीय योग दिवसय का शुभारंभ किया । इस अवसर पर श्री राकेश पुरी ने कहा कि योग, तनाव से निपटने का सबसे अच्छा मार्ग है।
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इस बार न तो अमोल पालेकर थे और न ही चुनावी मौसम का आतंक। न कोई विवाद और न ही कोई रोक टोक। जाने माने कलाकार प्रभाकर बर्वे के कामकाज को मुंबई के बाद अब दिल्ली में लोग नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट की कला दीर्घा में 28 जुलाई तक आराम से देख सकते हैं। इसी साल फरवरी में मुंबई में आयोजित इस प्रदर्शनी की चर्चा कम और अमोल पालेकर को बोलने से रोकने की चर्चा ज्यादा हुई थी। हालत ये हुई कि प्रभाकर बर्वे के
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क्या आपने बावनबूटी साड़ियों के बारे में सुना है? क्या आपको उपेन्द्र महारथी के बारे में पता है? क्या आपको पता है कि किस कलाकार ने गांधी जी के साथ साथ गौतम बुद्ध के शांति और अहिंसा के संदेश को अपने तमाम कला रूपों में कैसे कैसे उतारा या कलिंग की संस्कृति के साथ बंगाल के पुनर्जागरण आंदोलन के नायकों की कथाओं को रंगों और शिल्प की बेहतरीन दुनिया में कैसे आकार दिया? दरअसल हम बात कर रहे हैं उपे
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सिद्ध रंगकर्मी, नाटककार, निर्देशक, अभिनेता गिरीश कर्नाड की स्मृति में ‘स्मरण गिरीश कर्नाड’ कार्यक्रम का आयोजन 11 जून को इप्टा कार्यालय, लखनऊ में किया गया जिसमें शहर के लेखकों, कलाकारों और बु़द्धिजीवियों ने उन्हें याद किया, अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये तथा कहा कि वे हमारे समय के सांस्कृतिक प्रतिरोध के प्रतीक थे।
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क्या धर्म या अध्यात्म इच्छा और अनिच्छा से परे हो सकता है? दूसरे शब्दों में कहें तो क्या कोई ऐसा मंदिर हो सकता है जिसमें किसी ऐसे भक्त का प्रवेश वर्जित हो जिसमें कुछ इच्छा बची हो? वैसे भी सोचने वाली बात ये है कि कोई भक्त किसी मंदिर या भगवान के सामने तभी तो जाता है जब उसकी कोई मन्नत हो या वो भगवान से कुछ चाहता हो। निष्काम कर्मयोग तो सिर्फ गीता में लिखी गई बात है जिसे बहुत कम ही लोग दैनिक जीà
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इंटरनेट और ईमेल के ज़माने में लोग भले ही चिट्ठी पत्री के परंपरागत जरिये को भूलते जा रहे हों, अंतरदेशीय और पोस्टकार्ड के नाम से वाकिफ न हों, लेकिन आज भी पोस्टकार्ड की कितनी अहमियत है, इसे कुछ कलाकार शिद्दत के साथ महसूस करते हैं। इस दिशा में लखनऊ का सप्रेम संस्थान अहम भूमिका निभा रहा है। देशभर के कलाकारों, कवियों और लेखकों को एक मंच पर लाकर यह संस्थान आगामी जून में पोस्टकार्ड पर बनी कलà¤
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अपने ज़माने के मशहूर सांस्कृतिक हस्ताक्षर रहे जाने माने यायावर लेखक राहुल सांकृत्यायन के उपन्यास ‘वोल्गा से गंगा तक’ जिसने भी पढ़ा होगा, उसके लिए भारतीय इतिहास में ब्राह्मणवाद के तमाम ढकोसलों को समझना आसान है। राहुल जी ने यह उपन्यास 1943 में लिखा था। साहित्य अकादमी सभागार में 28 अप्रैल को मशहूर स्तंभकार और लेखक कमलाकांत त्रिपाठी की किताब ‘सरयू से गंगा’ पर चर्चा के दौरान राहुल सांकà
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‘रेवान्त’ पत्रिका की ओर से कवि डी एम मिश्र के नये गजल संग्रह ‘वो पता ढूंढे हमारा’ का विमोचन 21 अप्रैल 2019 को लखनऊ के कैफ़ी आज़मी एकेडमी के सभागार में सम्पन्न हुआ। यह उनका चौथा गजल संग्रह है। जाने माने आलोचक डा जीवन सिंह, मशहूर कवि व गजलकार रामकुमार कृषक, कवि स्वप्निल श्रीवास्तव, ‘रेवान्त’ के प्रधान संपादक कवि कौशल किशोर, गजलकार व लोक गायिका डा मालविका हरिओम, ‘रेवान्त’ की संपादक डा अनीà¤
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