प्रतिरोध के नाटक के पर्याय हैं राजेश कुमार

आज के दौर में राजेश कुमार को उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

  • कौशल किशोर

राजेश कुमार राजनीतिक व विचार प्रधान नाटकों के लिए जाने जाते हैं। उन्हें उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी की ओर से 2014 के लिए नाटक लेखन के लिए पुरस्कृत किये जाने की घोषणा की गयी है। वैसे राजेश कुमार इन पुरस्कारों से बहुत ऊपर हैं। हिन्दी रंगमंच और नाट्य लेखन के क्षेत्र में उनका सृजनात्मक काम विशिष्ट है। उनके आसपास भी कोई नहीं दिखता। उनके जैसा प्रतिबद्ध और प्रयोगधर्मी भी कोई नहीं। 


राजेश कुमार ने रंगकर्म की शुरुआत अस्सी के दशक में नुक्कड़ नाटक आंदोलन से की तथा ‘दिशा नाट्य मंच’ के संस्थापक रहे। ‘दिशा’ जन संस्कृति मंच की नाट्य इकाई रही है। ‘रंगा सियार’, ‘जनतंत्र के मुर्गे’ आदि इनके चर्चित नुक्कड़ नाटक रहे हैं। नुक्कड़ नाटक के रंगशास्त्र को लेकर ‘नाटक से नुक्कड़ नाटक’ तथा ‘मोरचा लगाता नाटक’ जैसी पुस्तकों का संपादन भी किया।
ऐसे दौर में जब हिन्दी नाट्य लेखन में गतिरोध था तथा कहा जा रहा था कि इतिहास व विचारधारा का अन्त हो गया है, राजेश कुमार ने रंगमंच की दुनिया में अपने नाटकों व रंगकर्म के माध्यम से सार्थक हस्तक्षेप किया। उन्होंने ऐसे नाटकों की रचना की जिनकी विषय वस्तु यथार्थवादी तथा मुख्य स्वर प्रतिरोध का रहा। ‘गांधी ने कहा था’, ‘सत्त भाषै रैदास’, ‘अम्बेडकर और गांधी’, ‘द लास्ट सैल्यूट’, ‘सुखिया मर गया भूख से’ आदि विषय की विविधता व नवीनता के लिए उनके खासे चर्चित नाटक रहे हैं। 

राजेश कुमार के चर्चित नाटक ‘अम्बेडकर और गांधी ‘का एक दृश्य


राजेश कुमार ने रंगमंच की दुनिया में नये प्रयोग भी किये। ऐसा ही प्रयोग गांधीजी की कृति ‘हिन्द स्वराज’ की नाट्य प्रस्तुति रही है। राजेश कुमार का मानना है कि विचारों के अन्दर भी नाटकीय तत्व मौजूद रहते हैं। विचारों में भी गति व आवेग होता है। वह किसी कथानक से ज्यादा सुनने वालों को रोमांचित कर सकता है। 
राजेश कुमार का नाटक ‘ट्रायल ऑफ एरर्स’ उन मुसलमान युवकों की कहानी है जिन्हें आतंकवाद के आरोपों में जेलों में बंद किया गया, सालों साल झूठे मुकदमे चले, उनकी जिन्दगी नष्ट कर दी गई और बाद में जब वे निर्दोष होकर बाहर आये भी तो उनके पास निराशा और धुंआ, धुंआ जिन्दगी के सिवाय कुछ नहीं बचा था। आतंकवाद समस्या है लेकिन इसके लिए निर्दोष युवकों को शिकार बनाया जाय तथा एक कौम को कठघरे में खड़ा कर दिया जाय, यह क्या उचित है ? आग क्या आग से बुझ सकती है ? आग बुझाने के लिए पानी की जरूरत होती है। आतंकवाद से लड़िए, कौम से नहीं। अखिर दहशतगर्दी की सजा पूरे कौम को क्यों ? किसी मजहब को मानना क्या गैरकानूनी है ? मुसलमान होना क्या अपराध है ? आतंकवाद से संघर्ष की सरकार की नीति क्या सांप्रदायिकता के जहर को ही नहीं बढा रही या प्रकरांतर से आतंकवाद को ही खाद.पानी नहीं मुहैया करा रही है ? ऐसे ही सवाल हैं जिनसे टकराता है राजेश कुमार के नाटक। दलित समस्या हो या साम्प्रदायिकता की समस्या वे उन्हें प्रखरता से उठाते हैं। धर्म व जाति की व्यवस्था के साथ उन्होंने राजनीतिक व्यवस्था पर चोट किया है। उनके नाटक प्रतिरोध के नाटक हैं, व्यवस्था विरोधी नाटक हैं। इसीलिए मौजूदा व्यवस्था को अपने विरुद्ध लगता है। उनके प्रदर्शन को कई बार रोका गया। व्यवस्था के इस रवैये ने उन्हें और प्रखर बनाया है। उन्हें अपने विचारों की मजबूती प्रदान की है।

(लेखक, कवि और संस्कृतिकर्मी कौशल किशोर उत्तर प्रदेश जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष हैं और राजेश कुमार पर उनका यह आलेख दैनिक जन संदेश में छपा है)

Posted Date:

September 1, 2019

5:39 pm Tags: , , , , , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Copyright 2020 @ Vaidehi Media- All rights reserved. Managed by iPistis