
साहित्य, संस्कृति, शिक्षा के साथ सियासत के सेतु थे डॉ शैलेन्द्र नाथ श्रीवास्तव

पटना। अगर आज साहित्यकार और राजनेता डॉ शैलेन्द्र नाथ श्रीवास्तव होते तो शायद संस्कृति और राजनीति के मौजूदा स्वरूप में कु

ललित कला अकादेमी की ओर से हर साल आयोजित की जाने वाली राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी कला समुदाय के कैलेन्डर में सर्वाधिक प्रतिष्ठित आयोजन है। इस वर्ष आयोजित 60वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी उत्कृष्ट कलात्मक कृतियों के प्रदर्शन के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभाशाली कलाकारों को अनुशंसा और मान्यता प्रदान करने का भी एक मंच है। इसमें प्रदर्शित सभी कृतियाँ

लखनऊ के सामाजिक व सांस्कृतिक संगठनों ने शहीदों को याद किया
23 मार्च की खास अहमियत है। देश भर में इस दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन तीन क्रान्तिकारियों - भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गयी थी। इसी दिन पंजाबी के क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश को खालिस्तानी आतंकवादियों ने अपनी गोली

नुक्कड़ नाटकों को आंदोलन बना देने वाले अरविंद गौड़ मानते हैं - रंगमंच सामाजिक सरोकारों से जुड़ा होना चाहिए

जब देश में रंगमंच आंदोलन कहीं हाशिए पर खिसक गया हो और जब रंगकर्मियों के सामने सिनेमा, टीवी और डिजिटल मीडिया की बड़ी चुनौतियां हों, ऐसे में अगर कोई रंगकर्मी लगाता


नामवर सिंह किसके थे? वामपंथियों के या दक्षिणपंथियों के या फिर मध्यमार्गी? उनकी आखिरी विदाई के वक्त उनके पार्थिव शरीर पर सीपीआई के छात्र संगठन एआईएसएफ ने अपनी पट्टी के साथ फूल चढ़ाए थे। उनके गुज़र जाने पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक न

20वां भारत रंग महोत्सव खत्म

रंगमंच की दुनिया में नए नए प्रयोगों और कई नए नाटकों के मंचन के साथ 20वां भारत रंग महोत्सव खत्म हो गया। कथक की पाठशाला कहे जाने वाले पद्मविभूषण पंडित बिरजू महाराज को इस मौके पर सुनना एक अनुभव था। राष्ट्रीय नाट्य वि

रोहित वेमुला की आत्महत्या और उसके बाद उठे जनाक्रोश ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। दलित राजनीति के नाम पर वेमुला की खुदकुशी एक बड़ा मुद्दा बनी लेकिन इस घटना के पीछे के सच को तलाशने की कोशिश सही तरीके से कभी नहीं हुई। इस घटना के चार साल बाद फिल्मकार दीपा धनराज ने इस पूरी घटना पर और इसके तमाम पहलुओं पर फिल्म बनाई – वी हैव नॉट कम हियर टू डाई ।
वरिष्ठ पत्रकार के. विक्रमराव की कलम से
वसन्त पंचमी मतलब वाणी पुत्र कवि निराला की सालगाँठ। कौन सी थी? बहस अभी जारी रहेगी। निराला किस सदी के थे? वे तो एक युग के हैं। किन्तु युग के मायने भी एक सीमित काल खण्ड से ही होगा। निराला तो कालजयी हैं। ऐसी हस्ती को एक सदी या एक युग के दायरे में बाँधने की मजाल कौन करें? फिर भी चन्द फितरतियों ने वृथा चर्चा चलवा दी थी। उनकी जन्म तिथ


वह 1977 का साल था। पहली दफा तभी जगजीत सिंह को सुनने का मौका मिला। लाइव नहीं, बल्कि उनके पहले अल्बम – ‘द अनफॉरगेटबल्स’ के दो एलपी रिकॉर्ड्स में। फिलिप्स के नए नए स्टीरियो की धमक के बीच जगजीत सिंह जब अपने अंदाज़ में ‘आहिस्ता आहिस्ता’ गाते तो हम सब उनके साथ साथ खुद भी ‘आहिस्ता आहिस्ता’ बरबस ही गाने को मजबूर हो

(वरिष्ठ पत्रकार सुधीर राघव किसी भी शहर में रहते हैं, वहां के इतिहास को तलाशने की कोशिश ज़रूर करते हैं। आप उनके ब्लॉग sudhirraghav.blogspot.com में उनके कई ऐसे आलेख पढ़ सकते हैं और कई जगहों के बारे में जान समझ सकते हैं। फिलहाल कुछ महीनों से सुधीर राघव काशी नगरी यानी वाराणसी में हैं। घुमक्कड़ी की उनकी आदत है, सो वहां के तमाम दुर्लभ और चर्