
अपने ज़माने के मशहूर सांस्कृतिक हस्ताक्षर रहे जाने माने यायावर लेखक राहुल सांकृत्यायन के उपन्यास ‘वोल्गा से गंगा तक’ जिसने भी पढ़ा होगा, उसके लिए भारतीय इतिहास में ब्राह्मणवाद के तमाम ढकोसलों को समझना आसान है। राहुल जी ने यह उपन्यास 1943 में लिखा था। साहित्य अकादमी सभागार में 28 अप्रैल को मशहूर स्तंभकार और लेखक कमलाकांत त्रिपाठी की किताब ‘सरयू से गंगा

ललित कला अकादमी पिछले दिनों पांच महिला कलाकारों के बेहतरीन काम का गवाह बनी। इन पांचों कलाकारों ने अपनी सामूहिक प्रदर्शनी का नाम दिया था – ‘प्रथमा’। इन पांचों में एक मूर्तिशिल्पी हैं- निवेदिता मिश्रा, एक सेरामिक कलाकार हैं-मीनाक्षी राजेंद्र और तीन पेंटर हैं-माधुरी शर्मा, सोनी खन्ना और विम्मी इंद्रा। इन कलाकारों ने मिलकर

डी एम मिश्र के गजल संग्रह ‘वो पता ढूँढे हमारा’ का विमोचन
लखनऊ। ‘रेवान्त’ पत्रिका की ओर से कवि डी एम मिश्र के नये गजल संग्रह ‘वो पता ढूंढे हमारा’ का विमोचन 21 अप्रैल 2019 को लखनऊ के कैफ़ी आज़मी एकेडमी के सभागार में सम्पन्न हुआ। यह उनका चौथा गजल संग्रह है। जाने माने आलोचक डा जीवन सिंह, मशहूर कवि व गजलकार रामकुमार कृषक, कवि स्वप

संस्कृति और कला के क्षेत्र में खास दखल रखने वाले जाने माने पत्रकार रवीन्द्र त्रिपाठी का मौजूदा दौर की पत्रकारिता में कला-संस्कृति को एक हद तक बचाए रखने में अहम भूमिका है। जनसत्ता समेत तमाम अखबारों में नियमित रूप से इस क्षेत्र में लिखते हुए रवीन्द्र त्रिपाठी ने इस यात्रा को बदस्तूर जारी रखा है। अखबार के साथ साथ खबरिया चैनलों में भी अपने

हम लाख कहें कि कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, साहित्यकारों और पत्रकारों को सियासी खेमेबाज़ी से दूर रहना चाहिए लेकिन जब देश की बात आती है, लोकतंत्र बचाने की बात आती है और अपने देश की गंगा-जमुनी संस्कृति को बचाने की बात आती है तो यह बुद्धिजीवी और कलाकार तबका भी खेमे में बंटा नज़र आता है। चाहे वह अवार्ड वापसी के दौरान का मामला हो, कुछ पत्रकारों-साहित्यकारों,

हम लाख कहें कि कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, साहित्यकारों और पत्रकारों को सियासी खेमेबाज़ी से दूर रहना चाहिए लेकिन जब देश की बात आती है, लोकतंत्र बचाने की बात आती है और अपने देश की गंगा-जमुनी संस्कृति को बचाने की बात आती है तो यह बुद्धिजीवी और कलाकार तबका भी खेमे में बंटा नज़र आता है। चाहे वह अवार्ड वापसी के दौरान का मामला हो, कुछ पत्रकारों-साहित्यकारों,

राग विराग कला केंद्र की ओर से आयोजित एक समारोह में कवि सुधा उपाध्याय को उनकी रचना ‘इसलिए कहूंगी मैं’ के लिए 14वें शीला सिद्धान्तकर स्मृति सम्मान से नवाज़ा गया। दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में प्रसिद्ध लेखिका डॉ नूर जहीर ने उन्हें सम्मानित किया।

इस मौके पर कवि और आ

चुनाव के मौके पर बयानों की कड़ी में वामपंथी और प्रगतिशील संगठनों ने भी एक साझा बयान जारी करके देश की सांस्कृतिक विरासत और धर्मनिरपेक्ष ढांचे को बचाने के लिए सोच समझ कर वोट देने की अपील की है। यह बयान भी पढ़िए...
एक बार फिर आम चुनाव सामने हैं। और ठीक पांच साल पहले जिन हाथों में केंद्र की सत्ता सौंपी गयी थी, उनकी जनविरोधी कारगुज़ारियाँ भी हमारे सामने हैं।

गंगा प्रसाद स्मृति दिवस का आयोजन
वैचारिक काम को आगे बढ़ाने की जरूरत - राजेश कुमार

आज के दौर में लेनिन और मार्क्स को भले ही कम लोग याद करें, वैचारिक और सियासी उठापटक में बेशक मार्क्सवाद-लेनिनवाद क


अपने देश में हादसों या प्राकृतिक आपदाओं पर भी कम राजनीति नहीं होती। चाहे वो भूकंप की त्रासदी हो या केदारनाथ जैसी आपदाएं, बाढ़ की विभीषिका हो या दंगों के बाद की कड़वा सच। हर मौके का सियासी इस्तेमाल होता रहा है। राहत और बचाव के नाम पर कोशिशें कई होती हैं, श्रेय लेने की होड़ भी मची रहती है, लेकिन ईमानदारी से क