‘अब उस शहर में लोगों के शीशे के मकां कैसे हैं…’

वरिष्ठ पत्रकार और बीबीसी से लंबे वक्त तक जुड़े रहे क़ुरबान अली ने अपने शुरुआती दिनों में डॉ राही मासूम रज़ा के साथ कई मुलाकातें कीं, बहुत सा वक्त गुज़ारा… तब से लेकर आजतक देश के हालात को करीब से देखने वाले कुरबान अली ने डॉ रज़ा के गुज़रने के बाद ये आलेख संडे ऑब्जर्वर में लिखा था… उन्होंने डॉ राही मासूम रज़ा को कैसे देखा.. आप भी पढ़िए…

उनकी जिंदगी का मकसद था ‘हिन्दोस्तानियत’ की तलाश

डॉक्टर राही मासूम रज़ा को ज्यादातर लोग ‘आधा गांव’ के लेखक तथा दूरदर्शन के धारावाहिक ‘महाभारत’ के डॉयलाग लेखक के रूप में जानते हैं। लेकिन राही की शख्सियत इस सबसे बिल्कुल मुख्तलिफ थी। फिल्मी लेखक व बंबई जाने पर उन्हें अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के कुछ संकीर्ण दिमागवाले प्रोफेसरों और पापी पेट ने मजबूर किया था। अन्यथा वह तो अपने गांव गंगौली में रह कर खुश थे और ऐसे हिन्दुस्तान का सपना देखा करते थे। जिसकी सियासत में मजहब की कोई जगह न हो और जहां हिन्दोस्तान की गंगा-जमुनी तहजीब (संस्कृति) सबसे ऊपर हो। उनके लिए गंगा सर्वोच्च थी। जिसे वह अपनी मां और देश की सबसे बड़ी सांस्कृतिक धरोहर मानते थे (राही ने एक जगह लिखा है मेरी तीन मां हैं-नफ़ीसा बेगम जिनके पेट से पैदा हुआ। गंगा जिसकी गोद में खेला और अलीगढ़ युनीर्विसटी जहां पढ़ा) और शायद पंडित जवाहरलाल नेहरू के अलावा गंगा का उतना सुंदर वर्णन किसी और ने नहीं किया जितना राही ने।

    पहली अगस्त 1927 को गाजीपुर जिले के गंगौली गांव में जन्मे राही की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एक मुहल्ले में हुई थी। बचपन में टांग में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गई लेकिन इंटरमीडिएट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गए और यहीं से एम.ए. करने के बाद उर्दू में ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ पर पी.एच.डी. की। ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ उन कहानियों का संग्रह है, जो पुराने दौर में मुसलमान औरतें (दादी-नानी) छोटे बच्चों को रात में कहानी बतौर सुनाया करती थीं। पी.एच.डी. करने के बाद राही अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गए और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे। यहीं रहते हुए राही ने ‘आधा गांव’ दिल एक सादा काग़ज’ ओस की बूंद’, हिम्मत जौनपुरी’ उपन्यास व 1965 के भारत-पाक युद्ध में मारे गए शहीद वीर अब्दुल हमीद की जीवनी ‘छोटे आदमी की बड़ी कहानी’ लिखी। उनकी यह सभी कृतियां हिन्दी में थीं। इससे पहले वह उर्दू में एक महाकाव्य 1987 तथा छोटी-बड़ी उर्दू नज़्में व गज़लें लिखे चुके थे लेकिन उर्दूवालों से इस बात पर झगड़ा हो जाने पर कि हिन्दोस्तानी जबान सिर्फ रस्मुलखत (फारसी लिपि) में ही हो सकती है। राही ने देवनागरी लिपि में लिखना शुरू किया और अपने अंतिम समय तक वह इसी लिपि में लिखते रहे।

    राही पैदाइश बागी थे और ऐसी किसी चीज पर ‘कंप्रोमाइज’ नहीं करते थे। जो उनके दर्शन, विचार व सिद्धांत के खिलाफ हो। इसलिए उनकी ऐसे लोगों से कभी नहीं पटी जो छोटी-छोटी बातें के लिए ‘कंप्रोमाइज’ कर लेते हैं और दोगला चरित्र अख्तियार कर लेते हैं। अपनी साफगोई और बेबाकी के कारण राही को अलीगढ़ विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग से निकाल दिया गया। उन पर आरोप लगाया गया कि वह दुश्चरित्र हैं। असलियत यह है कि उन्होंने अपनी मौजूदा विधवा पत्नी नैयर से प्रेम विवाह कर लिया था और यह बात अलीगढ़ के दकियानूसी लोगों को पसंद नहीं थी। इसी इल्जाम में राही को अलीगढ़ विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया। स्वयं राही के अनुसार ‘वह तो दिल्ली में उन्हें पनाह देने के लिए राजकमल प्रकाशन की मालकिन शीला संधू मौजूद थीं। नहीं तो उस भरी दोपहर में उन्हें कहां दर-दर भटकना पड़ता।’

    आश्चर्य की बात तो यह है कि अलीगढ़ विश्वविद्यालय के जिस उर्दू विभाग ने राही को बेइज्जत करके निकाला था, इस वर्ष जनवरी माह में उसी उर्दू विभाग ने राही का सम्मान किया और उनकी शान में कसीदा पढ़ा। इसी स्वागत सम्मान में बोलते हुए राही ने कहा कि ‘एक समय था, जब मुझे इस विभाग से निकाला गया था और आज यही विभाग मेरा सम्मान कर रहा है।’ अलीगढ़ के उर्दू विभाग ने राही का यह सम्मान ‘महाभारत’ धारावाहिक से राही को मिली प्रसिद्धि के बाद किया।

    अलीगढ़ छोड़ने के बाद राही ने नज़्म की शक्ल में अपने दोस्त शैलेश जैदी को एक खत लिखा था जिसका शीर्षक था ‘चांद तो अब भी निकलता होगा।’ इस खत में राही ने लगभग रोते हुए अपने शहर की खैरियत मालूम की थी और अपने दोस्त से पूछा था एक बच्चे की मानिंद कि विश्वविद्यालय परिसर का क्या हाल है, चांद कैसे निकलता है, और सूरज कैसे और जिन पेड़-पौधों को मैं छोड़ आया था वो कैसे हैं इसी नज़्म का एक शेर था-

             ऐ सबा तू तो उधर से गुजरती होगी

             तू ही बता अब वहां मेरे पैरों के निशां कैसे हैं

और एक शेर में पूरे शहर पर कटाक्ष था-

         मैं तो पत्थर था फेंक दिया ठीक किया

         अब उस शहर में लोगों के शीशे के मकां कैसे हैं

    अलीगढ़ छोड़ने के बाद राही कुछ समय दिल्ली में रहे। फिर वह रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई चले गए। यह दौर राही की जिन्दगी का सबसे बुरा दौर था और शीला संधु व उनके दो-चार दोस्तों के अलावा राही का साथ देनेवाला कोई नहीं था।

    राही फिल्म लेखन को घटिया काम नहीं मानते थे, सेमीक्रिएटिव’ मानते थे इसलिए मैंने शुरू में कहा कि फिल्म लेखन राही का बुनियादी मक़सद नहीं था जरिया-ए-माश (जीवकोपार्जन का तरीका) था। उनकी तड़प थी ‘हिन्दोस्तानियत’ की तलाश, जिसे वह अपने सीने से लगाकर ले गए।

    राही की जिन्दगी का सबसे बड़ा सदमा देश का विभाजन था, जिसके लिए वह मुसलिम लीग, कांग्रेस और धर्म की राजनीति को दोषी मानते थे। उनके लिए सबसे बड़ा धर्म ‘हिन्दोस्तानियत’ थी और जिसकी संस्कृति को वह अपनी सबसे बड़ी धरोहर व विरासत मानते थे। इस ‘हिन्दोस्तानियत’ को नुकसान पहुंचानेवाली वह हर उस शक्ति के खिलाफ थे। चाहे वह मुसलिम सांप्रदायिकता की शक्ल में हो या हिन्दू सांप्रदायिकता की शक्ल में। इसीलिए वह जीवनपर्यन्त इन शक्तियों की आंख की किरकिरी बने रहे।

    अपने पहले उपन्यास ‘आधा गांव’ में राही ने उन चरित्रों का बहुत ही सजीव चित्रण किया है जो धर्म के नाम पर विद्वेष फैलाने, धर्म का राजनीतिकरण करने और अन्ततः देश का विभाजन कराने में सफल रहे। राही के संपूर्ण लेखन में यहीं ‘कंसर्न’ प्रमुखता से मिलते हैं। सांप्रदायिकता की राजनीति, देश का विभाजन, इससे उजड़े और प्रभावित हुए गरीब व साधारण लोग, खासकर संयुक्त पंजाब-बंगाल, उत्तरप्रदेश व बिहार के लोग। तबाह होती हिन्दुस्तानी संस्कृति गिरते हुए सामाजिक मूल्य लुप्त होती

ढाई हजार वर्ष पुरानी सभ्यता वगैरह।

    यों तो डॉक्टर राही मासूम रजा से मेरी कई मुलाकातें हुईं लेकिन दिसंबर 1990 में हुई उनसे आखिरी मुलाकात एक ऐतिहासिक यादगार बन गई। उस समय उत्तर भारत खासकर पश्चिमी उत्तरप्रदेश में सांप्रदायिक माहौल बड़ा तनावपूर्ण था। अलीगढ़ और उसके आस-पास खौफनाक दंगे हो रहे थे। मैं चूंकि उन दंगों का प्रत्यक्षदर्शी था, इसलिए बहुत हताश और सहमा हुआ था। आशा की कोई किरण दिखाई नहीं पड़ रही थी। ऐसे निराशाजनक माहौल में राही ने मेरी हौसला अफ़जाई की। मैं उनसे बार-बार कह रहा था कि बंबई में बैठकर आप वहां की स्थिति का अंदाजा नहीं लगा सकते, लेकिन राही लगातार लोगों के एक-दूसरे से इतरे गहरे संबंध हैं कि इन दंगों से टूटनेवाले नहीं हैं। उन्होंने कहा था कि लोग जब यह समझ जाएंगे कि धर्म का इस्तेमाल सत्ता पाने या अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए राजनीतिक लोगों ने किया है तो फिर बलवे नहीं होंगे। आज सोचता हूं कि उत्तरप्रदेश के संदर्भ में उनकी यह टिप्पणी कितनी सटीक थी।

    धारावाहिक ‘महाभारत’ की स्क्रिप्ट लिखते समय राही ने व्यास की ‘महाभारत’ को सौ से अधिक बार पढ़ा था। हिन्दी-अंग्रेजी, संस्कृत, फारसी, उर्दू लगभग उन तमाम भाषाओं में जिनमें महाभारत उपलब्ध हैं। ‘गीता’ लिखते समय वह अलीगढ़ आ रहे थे। उनका कहना था कि गीता ‘महाभारत’ का सार है और इसे वह सुकून से लिखना चाहते हैं। भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने राही पर आरोप लगाया था कि वह ‘महाभारत’ को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं और कृष्ण चरित्र को बदलकर दिखा रहे हैं। इस पर राही ने अटल जी को फोन करके पूछा था कि क्या आपने यह बयान दिया है और यह कि क्या आपने ‘महाभारत’ पढ़ी है अटल जी के ‘हां’ कहने पर वह उन पर बिगड़ गए और कहा कि आप झूठ बोलते हैं। यदि आपने ‘महाभारत’ पढ़ी होती तो मुझे यकीन है कि आप जैसा पढ़ा-लिखा व्यक्ति यह बयान नहीं देता और अटल जी लाजवाब हो गए।

    वैसे बहुत कम लोगों को मालूम है कि जनसंघ नेता स्व. दीनदयाल उपाध्याय पर बनी ‘डॉक्युमेंटरी’ की स्क्रिप्ट लिखवाने के लिए भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी राही के घर गए थे। राही ने स्क्रिप्ट लिखी और जब आडवाणी जी ने उसकी फीस पूछी तो राही ने कहा कि दिल्ली में आपके साथ एक वक्त का खाना खा लूंगा।

    राही की मौत मेरे लिए एक जाती सदमा है और उन तमाम हिन्दोस्तानियों के लिए भी, जो अपने इस मुल्क, इस गुलशन को सर-सब्ज और फलता-फूलता देखना चाहते हैं। जिन्हें इस अजीम मुल्क के इतिहास, इसकी संस्कृति, इसकी मिट्टी, इसके नदी-नालों से प्यार है। राही की याद उन सबको हमेशा सताती रहेगी।

  • कुरबान अली
Posted Date:

March 15, 2020

3:35 pm

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