संसद में इन दिनों थैला बंद सियासत का ज़ोर है... कुछ थैले कंधे पर हैं तो कुछ अलग अलग तरीकों से संसद के भीतर... बाहर तो झोला छाप कामरेड से लेकर झोला झाप लेखक और डॉक्टर की चर्चा तो अक्सर होती है लेकिन अब ये झोला संस्कृति कुछ बदली बदली सी है.. कुछ झोले पर पार्टी के निशान तो नेताओं की फोटो तो कुछ पर आंदोलन के नारे... कमाल की इस झोला या थैला संस्कृति पर जाने माने व्यंग्यकार और पत्रकार
कृष्णा सोबती अभिव्यक्ति का खतरा उठाती थीं – गिरधर राठी
जानी मानी कथाकार और उपन्यासकार कृष्णा सोबती की जन्मशती बेशक फरवरी 2025 से शुरु हो रही हो, लेकिन साहित्य अकादमी ने 19 और 20 दिसंबर को दो दिनों तक उनकी पूरी साहित्यिक यात्रा पर गंभीर आयोजन किया। इस संगोष्ठी में कृष्णा सोबती के व्यक्तित्व के तमाम पहलुओं के साथ उनके लेखन के तमाम आयामों पर चर्चा हुई।
गाजियाबाद में कहानियों के सार्थक मंच और इसके सफल मासिक आयोजन ने 'कथा रंग' के बैनर तले तमाम दिग्गज कथाकारों को जोड़ने में कामयाबी पाई है। हर महीने होने वाले इस आयोजन में तकरीबन साठ सत्तर लोगों की लगातार मौजूदगी और सक्रिय भागीदारी यह साबित करती है कि कहानी लेखन को लेकर कितनी बारीक बातें लोग सुनना समझना चाहते हैं। बेशक हर बार नई नई कहानियां सामने आना , उनपर चर्चा होना और तमाम वरिष
हिन्दी सिनेमा के सबसे बड़े शो मैन राजकपूर की जन्मशती पर विशेषसिनेमा की दुनिया को बेहद करीब से समझने वाले और राजकपूर जैसे शोमैन की कलायात्रा को गहराई से महसूस करने वाले जाने माने पत्रकार और लेखक प्रताप सिंह ने उनकी जन्मशती के मौके पर बेहद संजीदगा के साथ 7 रंग के लिए ये विशेष पेशकश भेजी है... राज साहब की फिल्म यात्रा को समझने के साथ ही उन
‘बारादरी’ हिंदुस्तानी तहजीब की नई इबारत लिख रही है: इकबाल अशहर
कतरा कतरा कम होता हूं इस मौसम से यारी की, जिस्म पिघल कर बह जाता है कुछ कुछ रोज पसीने में: नबीलबारादरी में गूंजे शेर, गीत, दोहों पर देर तक झूमे श्रोताRead More
हिंदी के दिवंगत कवि वीरेन डंगवाल धीरे धीरे एक प्रतीक में बदलते जा रहे हैं। धूमिल के बाद युवा वर्ग में वह लोकप्रिय होते जा रहे हैं।इसके पीछे युवा कवियों नए पाठकों और छात्रों का प्यार और श्रद्धा छिपी हुई
जोश मलीहाबादी ने अपनी आत्मकथा ‘यादों की बरात’ में लिखा है,‘‘बेहद अफ़सोस है कि मैं यह लिखने को ज़िंदा हूं कि मजाज़ मर गया. यह कोई मुझसे पूछे कि मजाज़ क्या था और क्या हो सकता था. मरते वक़्त तक उसका महज एक चौथाई दिमाग़ ही खुलने पाया था और उसका सारा क़लाम उस एक चौथाई खुले दिमाग़ की खुलावट का करिश्मा है. अगर वह बुढ़ापे की उम्र तक आता, तो अपने दौर का सबसे बड़ा शायर हो
मच्छर आपको हर जगह मिल जाएंगे। इनके लिए कहीं कोई रोक-टोक नहीं। जहां अनुकूल माहौल मिला डाल दिया डेरा डंगर और फैला लिया अपना साम्राज्य। कोई भी मौसम या कोई भी जगह इनके लिए पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है। फिर भी जहां इनके रहने, खाने और पीने की सुविधाएं मिलती हैं, वहां चप्पे-चप्पे पर इन्हीं का कब्जा रहता है। अपने यहां मच्छरों के लिए सारी सुविधाएं मौजूद हैं। प्रशासन इनका विशेष
पत्थरों पर शिल्प और मूर्तिशिल्पियों की मेहनत से आकार लेती चट्टानें। लखनऊ में इन दिनों कलाकारों और कलाप्रेमियों के लिए इसे जीवंत देखना एक नई अनुभूति है। आठ दिनों तक चलने वाले अखिल भारतीय समकालीन मूर्तिकला शिविर यानी शैल उत्सव में कलाकृतियों को देखने बड़ी संख्या में कलाप्रेमी आ रहे हैं ज