
भरतीय आधुनिक शिल्प शताब्दी के दौरान मास्टर्स शिल्पकारों की ऐतिहासिक प्रदर्शनी ******* विमल कुमार हर सभ्यता केउद्भव और विकास साथ-साथ उसकी कला यात्रा भी साथ साथ चलती है। कोई भी सभ्यता बिना अपनी कला के जीवित नहीं रह सकती है। दोनों का एक अन्योन्याश्रय सम्बंध है।चाहे नृत्य हो संगीत हो, चित्रकला हो ,नाट्य कला हो और वाचिक परम्परा का साहित्य हो, सब का विकास एक साथ हुआ है, एक दूसरे के सम



वह 1975 का साल था। स्कूल में स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम खत्म होते ही हम दो दोस्त पटना के एलिफिन्सटन सिनेमा हॉल जा पहुंचे। भयानक भीड़ और टिकट के लिए जबरदस्त मारामारी। एक दूसरे पर चढ़ते लोग और टिकट विंडो में किसी भी तरह हाथ डालने की जद्दोजहद। आज ही के दिन शोले रिलीज़ हुई थी और हमें फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने का जुनून सवार था। तीन बजे के शो के लिए सुबह से ही लंबी लाइन और विं

रंगमंच की दुनिया में लगातार कुछ न कुछ नए प्रयोग होते रहे हैं और तमाम ऐसे रंगकर्मी हैं जो कई चर्चित नाटकों का हिन्दी रुपांतरण करके पेश करते रहे हैं। खासकर फ्रांसीसी नाटक रंगकर्मियों की पसंद रहे हैं। फ्रांसीसी नाटककार मोलिएर सत्रहवीं शताब्दी के बड़े नाटककारों में रहे और पेरिस में जन्में मोलिएर आम तौर पर अपने कॉमेडी नाटकों और बैले के लिए जाने जाते थे और उनके