
वह 1975 का साल था। स्कूल में स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम खत्म होते ही हम दो दोस्त पटना के एलिफिन्सटन सिनेमा हॉल जा पहुंचे। भयानक भीड़ और टिकट के लिए जबरदस्त मारामारी। एक दूसरे पर चढ़ते लोग और टिकट विंडो में किसी भी तरह हाथ डालने की जद्दोजहद। आज ही के दिन शोले रिलीज़ हुई थी और हमें फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने का जुनून सवार था। तीन बजे के शो के लिए सुबह से ही लंबी लाइन और विं

रंगमंच की दुनिया में लगातार कुछ न कुछ नए प्रयोग होते रहे हैं और तमाम ऐसे रंगकर्मी हैं जो कई चर्चित नाटकों का हिन्दी रुपांतरण करके पेश करते रहे हैं। खासकर फ्रांसीसी नाटक रंगकर्मियों की पसंद रहे हैं। फ्रांसीसी नाटककार मोलिएर सत्रहवीं शताब्दी के बड़े नाटककारों में रहे और पेरिस में जन्में मोलिएर आम तौर पर अपने कॉमेडी नाटकों और बैले के लिए जाने जाते थे और उनके

किशोर कुमार के गीतों में यूडलिंग का इस्तेमाल कैसे हुआ और कैसे किशोर दा ने फिल्म झुमरू में इसका ऐसा प्रयोग किया कि वह आज तक तमाम गायकों के लिए एक मिसाल है... ऐसे तमाम पहलुओं पर, किशोर कुमार को पहचान देने वाली फिल्मों पर और बड़े भाई अशोक कुमार के साथ उनके रिश्तों पर पेश है ये चौथी कड़ी.... प्रताप सिंह की कलम से
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अपने हर गीत में नए प्रयोग करने वाले और आवाज़ का जादू दिखाने वाले किशोर कुमार हरफ़नमौला थे। अभिनय से लेकर गीत संगीत और फिल्म निर्माण और निर्देशन तक और अपनी शख्सियत में मस्तमौला। उन्हें याद करते हुए जाने माने लेखक- सिने पत्रकार प्रताप सिंह के आलेख की दूसरी कड़ी ...
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बेशक संगीत की दुनिया बदल गई हो, पार्श्वगायन का अंदाज़ बदल गया हो, इलेक्ट्रानिक और एआई तकनीक ने संगीत के मूल तत्व, गायन शैली, आवाज़ का अंदाज़ सबकुछ बदल दिया हो, लेकिन साठ और सत्तर के दशक के सदाबहार गायक-गायिकाओं, संगीतकारों और गीतकारों ने जो खज़ाना दे दिया, वह अमूल्य है। आज भी हरेक की वही पसंद है। किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, मन्ना जे, तलत महमूद, हेमंत कुमार से लेकर शमशाद

ग़ाजियाबाद में साहित्य की नई धारा बहने लगी है, कवियों और शायरों ने यहां समां बांध रखा है। चाहे कथा संवाद हो या बारादरी, कहानी और शायरी के नए रंग फूटने लगे हैं। कई वरिष्ठ तो कई नए रचनाकारों की सक्रियता ने यहां शब्दों और भावनाओं की रचनात्मक अभिव्यक्ति को नया आयाम दिया है। इस बार की बारादरी में मशहूर शायर और कार्यक्रम के अध्यक्ष मोईन शादाब ने कहा कि गंगा जमुनी तहजीब की म


ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है... बेशक 1957 में आई प्यासा में साहिर लुधियानवी की इन बेहतरीन पंक्तियों को मोहम्मद रफ़ी ने जो दर्द भरी आवाज़ दी और इसे जिस किरदार ने परदे पर जीवंत कर दिया उस गुरुदत्त साहब को आ