बेचारे चाणक्य को टिकट मिलना तो दूर वोटर आई कार्ड तक नहीं बन पा रहा...
मैं वही चाणक्य हूँ जिसे आप कौटिल्य भी कहते हो और मुझे विष्णु गुप्त के नाम से भी पुकारते हो। आज मैं बिहार विधानसभा चुनाव होने से पहले राजधानी पाटलिपुत्र से अपना दुख दर्
भरतीय आधुनिक शिल्प शताब्दी के दौरान मास्टर्स शिल्पकारों की ऐतिहासिक प्रदर्शनी
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विमल कुमार
हर सभ्यता केउद्भव और विकास साथ-साथ उसकी कला यात्रा भी साथ साथ चलती है। कोई भी सभ्यता बिना अपनी कला के जीवित नहीं रह सकती है। दोनों का एक अन्योन्याश्रय सम्बंध है।चाहे नृत्य हो संगीत हो, चित्रकला हो ,नाट्य कला हो और वाचिक परम्परा का साहित्य हो, सब का विकास एक साथ हुआ है, एक दूसरे के सम
नाटक ‘माई सन इज़ रेपिस्ट’ में सामाजिक संदेश – सुनीता योगेश
पिछले दिनों दिल्ली के श्रीराम सेंटर में My son is rapist नाम का नाटक खेला गया। इसकी निर्देशक और लेखक सुनीता योगेश अग्रवाल से वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार की बातचीत:
सुनीता अग्रवाल कहती हैं कि एक नाटककार होने की हैसियत से मेरी ये जिम्मेदारी बनती है कि मैं इन मुद्दो पर बात करुं या इनको अ
वो मुस्लिम शख्सियतें, जिन्होंने लता मंगेशकर को मुकम्मल बनाया
हिंदुस्तान की 'सुर कोकिला' लता मंगेशकर की आवाज़ को मुकम्मल बनाने और उन्हें शिखर तक पहुंचाने में मुस्लिम शख्सियतों का बहुत बड़ा योगदान है। ऐसी शख्सियतों में बड़े गुलाम अली खां, मास्टर गुलाम हैदर, महबूब खान, जां निसार अख़्तर, दिलीप कुमा
लिखत पोएटिका: मानवीय संवेदनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति
नेपाल के ताज़ा हालात और लगातार अराजक होते जन विद्रोह के पीछे की वजहें क्या क्या हैं, इसपर विश्लेषण तो होने लगे हैं, लेकिन नेपाल को बेहद गहराई से समझने वाले और तीसरी दुनिया के देशों के जनांदोलनों की गहन पड़ताल करने वाले वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, संपादक आनंद स्वरूप वर्मा का विश्लेषण खास मायने रखता है। नेपाल की घटनाओं ने आनंद स्वरूप वर्मा को भीत
‘उन्मेष’ अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव 25 सितंबर से पटना में
90 सत्रों में देश विदेश के 550 लेखक होंगे शामिल100 भाषाओं का होगा प्रतिनिधित्व
नई दिल्ली, 10 सितंबर 2025। ‘उन्मेष’ अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव के तीसरे संस्करण का आयोजन इस बार पटना में 25 से 28 सितंबर 2025 के बीच सम्राट अशोक कन्व
बच्चों पर तनी बंदूकें भी हो चुकी हैं कला – मोहन राणा
धन्य धरती है जिसकी करुणा अक्षतधन्य समुंदर जिसका नमक फीका नहीं होताधन्य आकाश जो रहता हमेशा मेरे साथ हर जगह दिन रातधन्य वे बीज जो पतझर को नहीं भूलतेधन्य वे शब्द भूलते नहीं जो चौखट पर कभी बाट लगाते दुखउसकी स्मृति को
कोई भी संस्कृति बगैर कविता के फल फूल नहीं सकती – त्रिलोचन
वह 1975 का साल था। स्कूल में स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम खत्म होते ही हम दो दोस्त पटना के एलिफिन्सटन सिनेमा हॉल जा पहुंचे। भयानक भीड़ और टिकट के लिए जबरदस्त मारामारी। एक दूसरे पर चढ़ते लोग और टिकट विंडो में किसी भी तरह हाथ डालने की जद्दोजहद। आज ही के दिन शोले रिलीज़ हुई थी और हमें फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने का जुनून सवार था। तीन बजे के शो के लिए सुबह से ही लंबी लाइन और विं