‘थिएटर की अपनी स्वतंत्र भाषा होती है’

उषा गांगुली का गुज़र जाना रंगमंच के लिए आखिर क्यों इतना बड़ा शून्य पैदा करता है.. दरअसल उषा जी उन सुलझी हुई रंगकर्मियों में रही थीं जिन्होंने रंगकर्म को सामयिक संदर्भों में जोड़ने के साथ ही समाज और सियासत को भी बेहद बारीकी से देखा, समझा। दिसंबर 2018 में नवभारत टाइम्स ने उषा गांगुली का यह इंटरव्यू छापा था… दिलीप कुमार लाल ने उनसे लंबी बातचीत की थी जिसमें उन्होंने तमाम मुद्दों पर कई अहम बातें कहीं। यह इंटरव्यू हम नवभारत टाइम्स से साभार ले रहे हैं और बेशक 7 रंग के पाठकों को इसे पढ़ना चाहिए…

स्त्री के पास आज उसके आत्मनिर्भर बनने, न्याय के लिए लड़ने, हक के लिए अड़ने, पुरुषों के साथ कंधा मिलाकर चलने की वकालत करने वाला समाज है, साथ में कानून की ताकत भी। फिर भी पुरुष वर्चस्व के सामने उसके बेबस और लाचार साबित होने की खबरें रोज आती हैं। मशहूर रंगकर्मी, डायरेक्टर, ऐक्टिविस्ट उषा गांगुली कहती हैं कि बंधन तोड़ने के लिए स्त्री को आत्मनिर्भर बनना होगा। सत्य घटना पर आधारित अपने हालिया चर्चित नाटक ‘आत्मज’ में उन्होंने इन्हीं सवालों में उलझे नारी संघर्ष और स्त्री की स्वच्छंद यात्रा का चित्रण किया है। उन्हें 1998 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। बंगाल सरकार से वह नाटक ‘गुड़िया घर’ के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड भी पा चुकी हैं। रंगमंच और समाज से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर उषा गांगुली से दिलीप कुमार लाल ने लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं अंश :

आपके चर्चित नाटक ‘आत्मज’ में नायिका नंदनी का जो संघर्ष रहा, वह आपको एकतरफा नहीं लग रहा है। क्या यह सभी लड़कियों के लिए संभव है?

नहीं, एकतरफा नहीं है। इस संघर्ष के पीछे छिपी ताकत को समझने की जरूरत है। गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्मी यह लड़की संघर्ष की बदौलत डॉक्टर बनती है। उसका दोष यह है कि वह दूसरी जाति के लड़के से शादी कर लेती है और मां बन जाती है। यहां से उसका संघर्ष चौगुना हो जाता है। यहां तक कि उसके माता-पिता उसे त्याग देते हैं। समाज प्रताड़ित करता है। लेकिन वह हारती नहीं है। माता-पुत्र मिलकर समाज से लड़ते हैं। एक दिन समाज को उन्हें स्वीकार करना पड़ता है।

यहां यह समझने की जरूरत है कि जब तक स्त्री स्वयं पर निर्भर नहीं होगी, अपना रास्ता खुद नहीं निकालेगी, अपनी जरूरत महसूस नहीं करेगी, तब तक वह हारती रहेगी। जीतने के लिए उसे अपने कदम मजबूत करने पड़ेंगे, स्वयं को पहचानना होगा। और एक दिन वह जीतेगी, जीतेगी, जीतेगी।

आज के समय में थिएटर की स्थिति को आप कितनी चुनौतीपूर्ण मानती हैं? क्या सिनेमा के दौर में यह खतरे में आ गई है?

लोग कहते हैं 60 का दशक नाटक का सुनहरा वक्त था, लेकिन मेरा कहना है कि नाटक का यह सबसे बेहतर दौर चल रहा है। साउंड, लाइट और प्रजेंटेशन का नया स्वरूप देखने को मिल रहा है। इतना ही नहीं, नई पीढ़ी में कुछ नया करने की बेचैनी है। छोटे-छोटे लड़के नाटक लिखते हैं, स्कूलों में बच्चे नाटक लिखते हैं और उसका मंचन करते हैं। थिएटर अपने दम पर जिंदा है और रहेगा। इसमें पैसा नहीं है, नाम नहीं मिलता है, लेकिन इन युवाओं को थिएटर से प्यार है।

थिएटर और आगे बढ़े, इसके लिए क्या सुझाव है आपका?

इस विधा ने कभी बाजार से समझौता नहीं किया। इसके पास सचाई है, इसके पास मुद्दा है, अपना वजूद है। इस कारण यह विज्ञापन से दूर है। इसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए। सामाजिक चेतना के लिए इससे बेहतर माध्यम कुछ नहीं हो सकता। थिएटर ही समाज को सही रास्ते पर ला सकता है।

• थिएटर का शौक आपको कब और कैसे लगा?

मैं भरतनाट्यम करती थी। मुझे थिरकना आता था, लेकिन कभी थिएटर नहीं किया था। पठन-पाठन का स्थल कोलकाता रहा, लिहाजा वहां नाट्य संस्थान संगीत कला मंदिर से जुड़ने का मौका मिला। वहीं से मैंने थिएटर की दुनिया में अपना कदम बढ़ाया। मुझे थिएटर की प्रॉपर ट्रेनिंग नहीं मिली थी। लेकिन थिएटर से ऐसा लगाव हो गया कि 1976 में अपना थिएटर ‘रंगकर्मी’ बनाया। तब मुझे निर्देशन नहीं आता था। अनुभवी एक्टरों, निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला। देख-देख कर मैंने सीखा।

पहली बार आपने ‘रंगकर्मी’ में किस नाटक का निर्देशन किया? ‘रंगकर्मी’ के संघर्ष और सफलता पर भी कुछ रोशनी डालें…

1984 में पहली बार मैंने ‘महाभोज’ का निर्देशन किया। इसके बाद कोर्ट मार्शल, होली और फिर धीरे-धीरे यह सिलसिला चल पड़ा और अब मैं यहां हूं। ‘रंगकर्मी’ की सफलता का रहस्य यही है कि मैंने थिअटर दुनिया को देखकर सीखा। अपनी मंडली के सदस्यों के साथ बैठकर विचार-विमर्श करती।

हिंदी पट्टी से उठकर सीधे कोलकाता में बांग्ला भाषियों के बीच हिंदी नाटक को स्थापित करने की चुनौतियों का सामना आपने कैसे किया?

चुनौती थी, लेकिन कभी महसूस नहीं की। थिअटर किसी भाषा का नहीं होता, उसकी अपनी स्वतंत्र भाषा होती है। यही कारण है कि बांग्ला नाटक देखने वाले भी हिंदी नाटक से जुड़ते चले गए। यही हमारी सफलता बनी।

थिएटर के उभरते कलाकारों को कोई संदेश देना चाहेंगी?

थिएटर एक समुद्र की तरह है। इसकी लहरें आती हैं, जाती हैं, विलीन हो जाती हैं। थिएटर करने वाला सुखी नहीं रहता। लेकिन थिएटर एक मकसद है। भारतीय थिएटर में नया युग आ रहा है। इसका स्वागत करें।

आज की राजनीति पर आपकी टिप्पणी?

आज की राजनीति मानवतावादी जगत से शुरू नहीं हो रही है। ऐसा लगता है कि राजनीतिक चेतना कहीं जाकर खत्म हो जा रही है।

( ‘नवभारत टाइम्स’ से साभार )

Posted Date:

April 24, 2020

10:05 pm Tags: , , , ,

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