फिल्मकार सत्यजीत राय के भीतर का कलाकार…

एक संवेदनशील चित्रकार कैसे एक बेहतरीन फिल्मकार बन सकता है, सत्यजित राय इसके अद्भुत मिसाल हैं। उन्हें गुज़रे 18 साल हो गए… आने वाली 2 मई से उनके जन्म शताब्दी वर्ष की शुरुआत हो जाएगी। आज उन्हें याद करते हुए ये सोचने को हम बरबस मजबूर हो जाते हैं कि कम्प्यूटर ग्राफिक्स और एनिमेशन के इस आधुनिकतम दौर में क्या किसी फिल्मकार में इतना सब्र, इतनी गहरी दृष्टि, हर दृश्य और हर फ्रेम को पहले चित्रों या स्केच से कागज पर उतार लेने का हुनर है क्या? हर फ्रेम तो छोड़ दीजिए, यहां तो सारा काम सहायकों के भरोसे होता है.. और संवेदनशील दृष्टि की तो बात ही मत कीजिए.. यहां तो फिल्मों का सारा खेल करोड़ों की कमाई की जुगाड़ के लिए खेला जाता है… कहां है वह कलात्मकता और कहां है वह संवेदनशीलता। बहरहाल, हर दौर का, हर क्षेत्र का अपना अपना गणित होता है, बॉलीवुड का भी है। लेकिन सत्यजित राय, बिमल राय, मृणाल सेन, हृषिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी अब नहीं होते… अब बच गई हैं, यादों में बसी उनकी वो तमाम फिल्में जो शायद आज की पीढ़ी को बहुत धीमी, ठहरी हुई, उबाऊ लगे.. क्योंकि ज़माना बदल गया है, फिल्मों की परिभाषाएं बदल गई हैं, और ग्लैमर की पूरी दुनिया ही बदल गई है…

तो क्या आज के दौर में सत्यजीत राय को याद करना एक औपचारिकता है या फिर ज़रूरत। तमाम अखबारों में, वेबसाइट्स पर, टीवी चैनलों पर तो कोरोना के किस्सों और आतंक के सिवा तो कुछ बचा नहीं है, फिर भी कुछेक वेबसाइट्स ऐसे मौकों पर उन चंद शख्सियतों को याद कर लेती हैं, जिनकी जन्मतिथि या फिर पुण्यतिथि होती है। उन्हीं शख्सियतों में 23 अप्रैल को याद आते हैं सत्यजीत राय।

जाने माने चित्रकार, पेंटर और बेहद संवेदनशील संस्कृतिकर्मी अशोक भौमिक  ने सत्यजीत राय की कला के तमाम आयामों पर अपनी गहरी दृष्टि डाली है। अशोक दा ने ‘अपरिचित सत्यजित’ शीर्षक से भोपाल की एक बाल पत्रिका ‘साइकिल’ के लिए यह आलेख लिखा और बताया कि सत्यजीत राय के कलाकार और उनकी उस प्रतिभा के बारे में लोग कम ही जानते हैं। उन्हें एक बेहतरीन फिल्मकार के तौर पर तो दुनिया ने पहचाना, लेकिन उनकी इस कला के बारे में शायद लोगों को बहुत नहीं पता है जिसकी बदौलत सत्यजीत राय इतने बेहतरीन फिल्मकार बन गए। तो ‘7 रंग’ के पाठकों के लिए सत्यजीत राय के इसी पहलू पर कलाकार अशोक भौमिक  का आलेख…..    

अशोक भौमिक

अपरिचित सत्यजित

विश्व-सिनेमा में सत्यजित राय का नाम बहुत आदर के साथ लिया जाता है। सत्यजित राय की गिनती दुनिया के उन चुनिन्दा फिल्मकारों में होती है जिन्होंने फिल्म को एक सार्थक कला की ऊँचाई दी।  उनकी बनाई हुई फिल्मों के बारे में तो हम सभी जानते हैं, और हममें से कुछ उनके साहित्य से भी परिचित होंगे, पर सत्यजित राय की चित्रकला से बहुत ज़्यादा लोग परिचित नहीं हैं। सत्यजित राय ने शांतिनिकेतन में नन्दलाल बोस और बिनोद बिहारी मुखोपाध्याय सरीखे कलागुरूओं से शिक्षा प्राप्त की थी। फिल्म निर्देशन के पहले वे एक प्रकाशन संस्था में आवरण चित्रकार के रूप में काम करते थे। इसके बाद उन्होंने एक विज्ञापन संस्था में डिज़ाइनर का भी काम किया था।

चित्रकला के अनेक विभागों में सत्यजित राय ने बेमिसाल काम किये।  प्रतीक चिन्ह या लोगो, पुस्तक आवरण, कथा-चित्रण या इलस्ट्रेशन, पोस्टर और लिपि (फॉण्ट) रचना से लेकर अपनी फिल्मों के लिए दृश्य परिकल्पना आदि में सत्यजित राय समान रूप से सक्रिय रहे। उन्होंने लोगो या प्रतीकचिन्ह बनाने में अद्भुत कल्पनाशीलता का परिचय दिया।  साहित्य अकादेमी का प्रतीक चिन्ह उन्ही का बनाया हुआ है , जो सहज होने के साथ साथ प्रभावशाली भी है।

सत्सायजित राय का डिजाइन किया हुआ साहित्य अकादमी का लोगो

इसी प्रकार कला फिल्मों के लिए प्रसिद्ध सिनेमाघर ‘नन्दन’  का भी प्रतीक चिन्ह उन्हीं का बनाया हुआ है।

सिनेमाघर नंदन का प्रतीक चिन्ह

किसी भी भाषा के लिए उसका सहज,  सुन्दर और आकर्षक लिपि में लिखा जाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। सत्यजित राय ने हस्तलिपि या कैलीग्राफी की कला को लेकर अनेक प्रयोग किये जिसके चलते लोगों में आकर्षक हस्तलिपि के प्रति एक सजगता पैदा हो सकी। पुस्तकों के आवरण में हों या अपने फिल्मों के नामों के लिए की गई कैलीग्राफी हो, सत्यजित राय ने इस दिशा में एक नए युग की शुरुआत की।

नेहरू की चर्चित किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया का कवर भी राय ने ही बनाया

इसी दिशा में काम करते हुए उन्होंने मुद्रण के लिए कई नये फ़ॉन्ट्स या लिपियों की रचना की। हम जानते हैं कि मुद्रण-लिपि निर्माण या फॉण्ट डिजाइनिंग, व्यावसायिक कला का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। भारत में छपाई योग्य लिपियों का निर्माण प्रायः प्रादेशिक भाषाओं तक ही सीमित रहा है, अंग्रेजी में इस दिशा में ज्यादा काम नहीं हुआ था।

सत्यजित राय ने इस दिशा में काम करते हुए अंग्रेजी के चार फ़ॉन्ट्स या मुद्रण लिपियों की रचना की। उनके द्वारा बनाये गए चारों फ़ॉन्ट्स एक दूसरे से बिलकुल भिन्न मिज़ाज के हैं, जो  ‘रे रोमन’, ‘बिज़ार’, ‘डॉफ़्निस’ और ‘हॉलिडे स्क्रिप्ट’ के नाम से जाने जाते हैं।

रे रोमन फॉन्ट
बिजार फ़ॉन्ट

एक गंभीर फिल्म निर्देशक के रूप में सत्यजित राय का काम करने का तरीका औरों से बिलकुल भिन्न था। फिल्म निर्माण के हर विभाग को वे स्वयं देखते थे। अपनी अधिकांश फिल्मों में संगीत निर्देशन के साथ साथ फिल्म की पटकथा, संपादन और फिल्म के पोस्टरों से लेकर अभिनेताओं के पोशाक तक की परिकल्पना वे स्वयं करते थे। उनके बनाये हुए फिल्म पोस्टरों में हमें अद्भुत सांकेतिकता दिखती है, जहाँ वे दर्शकों की कल्पनाशीलता पर भरोसा रखते हुए फिल्म के बारे में इशारा भर करते नज़र आते हैं।

उनकी फिल्म ‘जय बाबा फेलूनाथ’ का पोस्टर
अपनी फिल्मों के पोस्टर रे खुद बनाते थे

सिनेमा के अभिनेताओं के लिए वे कितनी गंभीरता से वेश भूषा की परिकल्पना करते थे, इसकी एक मिसाल हमें उनकी फिल्म ‘हीरक राजा के देश में’ की पोशाक परिकल्पना में मिलती है।  एक ही पन्ने पर सत्यजित राय ने राज दरबार के ‘पेशकार’ और ‘पाँच मंत्रियों’ के वेश भूषा की परिकल्पना की है।

चित्र में ऊपरी किनारे, जहाँ पेशकार की पोशाक क्या होगी, उसे उन्होंने न केवल चित्रित किया है, बल्कि उस रंग के कपड़े की एक कतरन को पिन से नत्थी भी कर दिया है। इसी प्रकार चित्र के नीचे के हिस्से में, पाँच मंत्रियों के लिए वस्त्र परिकल्पना की गयी है। पाँचों मंत्रियों के लिए एक ही किस्म के कपड़ों की परिकल्पना की गयी है। सभी के लिए , एक ही रंग का लबादा जैसा पहनावा है पर उनके कुर्तों का रंग अलग अलग है। इसी प्रकार उनकी टोपियाँ भी भिन्न हैं। यहाँ भी उनके वस्त्रों के लिए अलग अलग निर्धारित रंगों के कपड़ों की कतरनों को पिन से लगाया गया है। पाँच मंत्रियों के बीच में समानता और अंतर, दोनों को एक साथ दिखाने के लिए इस तरह की परिकल्पना सत्यजित राय की सृजनशीलता के बारे में बहुत कुछ कहती है।  

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फिल्म निर्देशन के साथ साथ सत्यजित राय का किशोर और बाल साहित्य में भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने अपनी ज़्यादातर साहित्यिक रचनाओं का कथा-चित्रण या इलस्ट्रेशन  स्वयं ही किया है। किशोर साहित्य के चित्रणों में उनके रेखांकन बाल-साहित्य के लिए किये गए चित्रणों से बिलकुल भिन्न दिखते हैं। इन चित्रणों में उन्होंने मूल रचना को एक अद्भुत विस्तार दिया जहाँ व्यापक प्रयोगों के साथ साथ रचना के अनुरूप अपनी शैली में परिवर्तन भी किये। उन्होंने अपने चित्रणों में न केवल कथा की सबसे महत्वपूर्ण या निर्णायक घटना को चुना बल्कि दर्शक को कहानी के किरदारों से बखूबी परिचित भी कराया है। सत्यजित राय के कथा चित्रणों  में हमें एक फिल्म निर्देशक और फोटोग्राफर की सम्मिलित दृष्टि दिखाई पड़ती है। उनके चित्रण वस्तुतः किसी दृश्य को एक कैमरे की आँख से देखे गए चौखटे या  फ्रेम जैसे ही हैं, जहाँ कैमरे का कोण या एंगल का पूर्वनिर्धारण सबसे महत्वपूर्ण है।

सत्यजित राय के चित्रण की इस खासियत को समझने के लिए हम बाईं ओर के चित्र को देख सकते हैं। इस चित्र के अग्र-भूमि या फोरग्राउण्ड में एक पुराने टाइपराइटर पर काम करता एक आदमी बैठा है जिसके सफ़ेद बाल करीने से कढ़े हुए हैं। उसने एक हाथ में पाइप पकड़ रखा है। इन सब सूत्रों से सहज ही उस आदमी के अभिजात या खानदानी होने का पता चलता है। चित्र में दरवाजे से दो लोगों को हम अंदर आते हुए देख पाते हैं, जिनमे सामने वाला व्यक्ति नमस्कार करने की मुद्रा में है। चित्र देखते हुए यह समझने में देर नहीं लगती कि टाइपराइटर के सामने बैठा आदमी इन दोनों लोगों के मुकाबले ज्यादा क्षमतावान या रसूखवाला है। यह गौरतलब है कि चित्र में रेखाएं समान मोटाई की नहीं हैं।  फोरग्रॉउंड या अग्रभूमि में कुर्सी पर बैठे आदमी, मेज़ और टाइपराइटर को मोटी रेखाओं से बनाया गया है जबकि कमरे के अंदर दाखिल होते दोनों आदमियों को पतली रेखाओं से बनाया गया है। यहाँ सबसे पतली रेखा से बने दरवाज़े का बस आभास मात्र ही है। रेखाओं की कम होती मोटाई से ही सत्यजित राय ने इस चित्र में एक गहराई या डेप्थ रचा है जिसके कारण फोरग्राउंड में बैठे आदमी से, दरवाज़े से अंदर आये हुए दोनों लोगों की दूरी समझ में आती है। साथ ही उन दोनों लोगों से दरवाज़े के बीच की दूरी भी समझ में आती है।

इस चित्र में सत्यजित राय ने एक सिने-फोटोग्राफर का कोण या एंगल चुना है। यदि हम ध्यान से इस चित्र को देखें तो हमें इस चित्र में एक अभिनव परिप्रेक्ष्य या पर्सपेक्टिव दिखाई पड़ता है। यह रेखांकन न होकर यदि एक फोटोग्राफ होता तो हम अनुमान लगा सकते हैं कि ऐसे परिप्रेक्ष्य या पर्सपेक्टिव को हासिल करने के लिए कैमरे को कुर्सी पर बैठे आदमी के कोहनी की ऊँचाई में रखा गया ताकि चित्र में अपेक्षित नाटकीयता पैदा की जा सके।

ऊपर के चित्र में जहाँ स्थिरता और ख़ामोशी है, वहीं दाहिनी ओर के इस चित्र में बिलकुल इससे विपरीत माहौल है। इस चित्र के फोरग्राउंड में काँच के बर्तनों और उपकरणों से सहज ही हम जान जाते हैं कि यह कोई प्रयोगशाला है। यह कमरा ज्यादा बड़ा नहीं है और इस चित्र में जिस मुहूर्त को चित्रित किया गया है वह निश्चय ही सहज और स्वाभाविक नहीं है। एक अँधेरे कमरे में घटित हो रही इस आकस्मिक या औचक घटना को चित्रित करने के लिए सत्यजित राय ने भिन्न शैली का सहारा लिया है। चित्र में सर्वत्र, समानांतर रेखाओं की उपस्थिति है, जिनके एक दूसरे के बहुत करीब होने से कमरे के अंदर न केवल अँधेरे का आभास होता है बल्कि एक तनाव और आकस्मिकता का माहौल भी बनता है।

घटना की नाटकीयता को बढ़ाने के लिए ही एक ऐसा एंगल या कोण चुना गया है, जिससे कमरे की छत का भीतरी हिस्सा और उससे लटकता हुआ बल्ब भी दिखे।

जैसा कि हम जानते हैं, सत्यजित राय ने कथा-चित्रण की शैली का निर्धारण, रचनाओं के पाठक वर्ग को ध्यान में रख कर किया। उपरोक्त उदाहरणों से यह स्पष्ट समझा जा सकता है कि ये चित्रण किशोरों के लिए लिखी गयी रचनाओं के लिए हैं।  बाल-साहित्य के लिए किए गए चित्रणों में वे बिलकुल अलग शैली अपनाते हैं। ऐसे कुछ उदाहरणों को हम यहाँ देख सकते हैं।

कथा-चित्रण से हट कर सत्यजित राय ने समय समय पर अनेक विख्यात लोगों के रेखाचित्र भी बनाए थे। उनके द्वारा निर्मित शबीहों या पोर्ट्रेटों की संख्या सौ से भी अधिक है। सीमित रेखाओं में बने ये पोर्ट्रेट्स उनकी प्रतिभा का साकार दस्तावेज़ हैं। उदाहरण के लिए यहाँ हम महान साहित्यकार शरतचंद्र , विश्वविख्यात फिल्म निर्देशक अकीरा कुरोसावा और राजनीतिक सिद्धांतकार/ अर्थशास्त्री कार्ल मार्क्स के शबीहों को देख सकते हैं।

सत्यजित राय के कथा चित्रण, न केवल पाठकों को ही बहुत आकर्षित करता है ; चित्रकारों के लिए भी गहरे प्रभावित करता है। अपने बयानों में कई बार सत्यजित राय ने यह दोहराया है कि वे अपने को चित्रकार नहीं मानते हैं। पर वे हमारे लिए किसी भी कला में अनुशासन और मौलिकता के साथ साथ प्रयोगशील होने का एक नायाब मिसाल हैं और कथा चित्रण या इलस्ट्रेशन के क्षेत्र में हमें अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।

(भोपाल से प्रकाशित बच्चों की पत्रिका ‘साइकिल’ से साभार)

Posted Date:

April 23, 2020

1:30 pm Tags: , , , , , , ,

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