सतीश आनंद ने बदला पटना का रंगमंच और रंग बोध

सतीश आनंद का जाना बेशक हिन्दी रंगमंच और खासकर पटना और बिहार के रंगमंच के लिए एक बड़ा शून्य पैदा करता है… बेशक तीश आनंद ने उस दौर में पटना में रंगमंच को एक नई दिशा दी और रंगकर्मियों को एक बड़ा मंच दिया जब साहित्य संस्कृति और खासकर रंगमंच एक मुश्किल दौर में था, दर्शकों को मंच तक लाना एक चुनौती थी और इसे समाज से जोड़कर एक सार्थक मिशन की तरह आगे ले जाना भी आसान नहीं था.. वो दौर था जब कालीदास रंगालय  और प्रेमचंद रंगशाला आकार ले रहा था और कई नए युवा रंगकर्मी उभर रहे थे…  जेपी आंदोलन और इमरजेंसी का दौर था और तब कलाकारों के लिए अभिव्यक्ति एक बड़ी चुनौती थी.. तभी नुक्कड़ कविता भी परवान चढ़ रही थी… सत्यनारायण, रवीन्द्र राजहंस और तमाम ऐसे कवि  नुक्कड़ों पर सत्ता के खिलाफ कविताएं पढ़ रहे थे.. जन चेतना एक मज़बूत हथियार के तौर पर कविताएं सामने आ रही थीं… रंगमंच भी उसी दौर में था… पिछले दिनों सत्यनारायण भी नहीं रहे और सतीश आनंद भी हमसे दूर चले गए… अरविंद कुमार बता रहे हैं उस दौर की कुछ बातें और याद कर रहे हैं उन दिनों को और उन शख्सियतों को…

जब पता चला कि सतीश आनंद नहीं रहे तो मैं अपने बचपन के दिनों में लौट गया। जब मैं स्कूल में पढ़ता था तब सतीश आनंद का नाम सुना था। वो ज़माना चतुर्भुज जी का था जो पटना रेडियो के केंद्र निदेशक थे और ऐतिहासिक नाटक लिखते थे। तब उनकी ही धूम मची थी। उन्हीं दिनों मैँने आचार्य देवेंद्र नाथ शर्मा की नाटक की किताब शाहजहां के आंसू भी पढ़ी थी। तब तक मोहन राकेश के नाटक नहीं पढ़े थे मैंने।धर्मयुग में मोहन राकेश के निधन पर एक रिपोर्ट जरूर पढ़ी थी। उन दिनों मेरे मोहल्ले में ‘नेफा की एक शाम’ नामक जबरदस्त नाटक हुआ था। शायद उसे सांग एंड ड्रामा डिवीजन ने किया था। नट नटी की नृत्य नाटिका भी देखी थी। तब रंगमंच के बारे में कुछ विशेष नहीं जानता था।लेकिन रंगमंच करने का शौक जरूर था। मोहल्ले में एक नाटक में सलीम का अभिनय भी किया था और मंच पर युद्ध के एक दृश्य के लिए तलवार ले जाना भूल गया था। तब मैंने अपने संवाद को बदलते हुए कहा-’ठहरो अभी तलवार लेकर आता हूँ।”
ये बातें सतीश आनंद के निधन की खबर सुनते ही दिमाग में कौंध गयी। तब परवेज शायद परिदृश्य में नहीं थे। बाद में वे भी उभरे और देखते देखते पटना में रंगमंच का परिदृश्य ही बदल गया। आज अख्तर बन्धु, संजय उपाध्याय, अजय कुमार, प्रवीण गुंजन, पुंज प्रकाश जैसे अनेक रंगकर्मी परिदृश्य पर हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने बिहार को छोड़ दिया और वे दिल्ली मुम्बई में रंगकर्म करने लगे लेकिन सतीश आनंद नहीं होते तो पटना के रंगमंच को वह परिदृश्य नहीं होता। उन्होंने एक शहर के रंगमंच बोध को बदला है बल्कि यह कहना उचित होगा कि उन्होंने पटना में नया सौंदर्य बोध विकसित किया। तब आज की तरह अनुदान की सुविधा नहीं थी। रंगमंच का ढांचा नहीं था। प्रेमचन्द रंगशाला, कालिदास रंगालय बाद की चीजें हैं। ऐसे में सतीश आनंद का अवदान बड़ा है लेकिन उन्हें याद करते हुए हम किरनकान्त वर्मा, विनीता अग्रवाल और सुखदा पांडेय को भूल नहीं सकते। मैँ रंगमंच का आलोचक या इतिहासकार नहीं कि उसे क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत कर सकूं। पर सतीश आनंद के बहाने उस इतिहास की तरफ लौटा जा सकता है। उनके नहीं रहने पर परवेज़ अख्तर ,मृत्युंजय प्रभाकर और प्रवीण गुंजन ने बड़े आदर से सतीश जी को याद किया है।
सतीश जी से मेरा परिचय दिल्ली में हुआ तब तक वे संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नहीं हुए थे। सतीश आनंद दिल्ली तब आये जब वे बिहार में रंगमंच के शीर्ष पर थे लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें वह पहचान नहीं मिली थी। तब वे एक बार मेरे दफ्तर आये थे। उनक़ा हृषिकेश सुलभ से कोई विवाद चल रहा था। शायद अमली नाटक को लेकर । उन्होंने विस्तार से मुझे और मेरे सहयोगी रामकृष्ण पांडेय को बताया।अब भूल भी रहा हूँ। शायद वे UNI से खबर चलवाने के लिए आये थे या रामकृष्ण पांडेय से मिंलने अब याद नहीं पर सतीश जी से मेरी मुलाक़त हुई। तब वे मेरे नाम से परिचित थे पर विशेष परिचय नहीं था। लेकिन उन्हें पटना से फॉलो करता रहा था। फेसबुक पर उंनसे मित्रता बढ़ी और बातें भी हुईं। लेकिन मुझे यह पता नहीं था वे मूलतः बिहारी नहीं थे बल्कि शरणार्थी थे और बिहार में जाकर उनके पिता बसे थे। जब रेणु जन्मशती पर साल भर आयोजन किया तब उंनसे भी एक टॉक दिलवाया। सतीश आनंद और जुगनू शारदीय भी रेणु जी के साथ जे पी आंदोलन में रोज उठते बैठते थे। पटना काफ़ी हाउस में मंडली जमती थी। रेणु जी को रंगमंच के निकट वे ले आये थे। अगर भुला नहीं हूं तो मैला आँचल भी उन्होंने मंचित किया था। रेणु के प्रति उनके मन मे गहरा प्रेम और आदर था। उन्होंने उस ज़माने में समकालीन नाटककारों और नाट्य कृतियों का मंचन कर एक नया माहौल बनाया। जिस तरह गिरीश रस्तोगी ने गोरखपुर में आधुनिक रंगमंच खड़ा किया कुछ उसी तरह सतीश जी ने यह काम किया था पर दिल्ली के इलीट रंकर्मियों की मंडली में वे नहीं रहे।


सतीश आनन्द के निधन के बाद जिस तरह लोगों ने उन्हें याद किया है उससे पता चलता है कि उनका परिवार बड़ा था। जाने माने रंगकर्मी परवेज़ अख्तर की टिप्पणी से सतीश जी के अवदान को समझा जा सकता है। परवेज़ जी ने लिखा है कि सतीश आनंद ने मेरे प्रारम्भिक रंगमंच जीवन (1975–1980) को गहराई से प्रभावित और प्रेरित किया।

1962 में पटना में कला संगम की स्थापना कर उन्होंने बिहार में आधुनिक हिन्दी रंगमंच को एक नई भाषा, नया अनुशासन और नई गरिमा दी। उन्होंने पटना में ‘कला संगम’ के लिए आधे-अधूरे, अंधायुग, ख़ामोश! अदालत जारी है, पागला घोड़ा, जुलूस, आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, बल्लभपुर की रूपकथा, सिंहासन खाली है, तुग़लक़, ताम्रपत्र, मुक्तधारा जैसे अनेक नाटकों का निर्देशन और उनमें मुख्य पात्र का अभिनय भी किया। 1997-98 के बाद वे दिल्ली चले गये और उसीको अपना कर्म क्षेत्र बनाया।”

प्रवीण गुंजन ने लिखा है-
वरिष्ठ रंगकर्मी, प्रख्यात निर्देशक और भारतीय रंगमंच के शिखर पुरुष सतीश आनंद सर का देवलोकगमन संपूर्ण नाट्य जगत और भारतीय रंगमंच के लिए अपूरणीय क्षति है। उनका जाना केवल एक महान कलाकार का जाना नहीं है, बल्कि उस गुरु-परंपरा और अनुशासन के एक युग का अवसान है, जिसने कई पीढ़ियों को रंगमंच का ककहरा सिखाया और गढ़ा।”

सतीश आनंद सर के सानिध्य में रंगमंच की दुनिया को केवल देखा नहीं, बल्कि उसके व्यापक और गूढ़ दर्शन को समझा। उनका व्यक्तित्व जितना कड़ा और समय की पाबंदी को लेकर सख्त था, उनका हृदय अपने शिष्यों के प्रति उतना ही वात्सल्य और प्रेम से भरा था।”

“ वर्ष 2003 में संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली द्वारा पटना में आयोजित आवासीय नाट्य कार्यशाला में सतीश सर कैंप डायरेक्टर थे और मैं प्रतिभागी। उस कार्यशाला के कड़े अनुशासन का एक संस्मरण आज भी जेहन में तरोताजा है—जब एक दिन आवश्यक कार्यवश बिना बताए घर चले जाने पर सर ने सख्त रुख अपनाते हुए मुझे कार्यशाला से निष्कासित कर दिया था। इससे पहले भी दो लोगों को सर ने कार्यशाला से निकाल दिया था। सर अपनी बात के पक्के थे कि अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं होगी, और शिष्य की अपनी ज़िद थी कि बिना सीखे जाना नहीं है। अंततः उनके उस कड़े गुस्से के पीछे छिपा बेपनाह प्यार जीता और कार्यशाला में मेरी वापसी हुई।”

मृत्युंजय प्रभाकर का कहना है कि वे जीते जी किवदंती बन गए थे। मृत्युंजय ने उनके अभिनय निर्देशन और टीम संगठन क्षमता की भी बड़ी तारीफ की है।जब बाद की पीढ़ी खुद मूल्यांकन करती है तो उसमें एक तरह की विश्वसनीयता होती है। वीरेंद्र नारायण प्यारे मोहन सहाय और रामगोपाल बजाज के बाद वे चौथे बिहारी थे जो रंगमंच के शिखर पर पहुंचे।

हालांकि सतीश आनंद के विचारों में एक तरह का परिवर्तन दिखने लगा था। वे अलग सवाल उठाते थे। गत दिनों उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर देश के राष्ट्रीय गान “ जन गण मण” में ‘अधिनायक’ और ‘भारत भाग्य विधाता’ जैसे शब्द को बदलने की मांग की थी। उनके तर्क वर्तमान सरकार के अनुकूल थे। अगर सतीश आनंद में हबीब तनवीर जैसी दृष्टि होती तो वे और बड़े रंगकर्मी होते।

Posted Date:

August 30, 2026

4:28 pm Tags: , , , , ,

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