
आचार्य शिवपूजन सहाय के उपन्यास “देहाती दुनिया ‘ के सौ साल होने पर तीन दिवसीय समारोह संपन्न हो गया और इसके साथ ही इस उपन्यास को लेकर एक नया विमर्श खड़ा हो गया। 1926 में प्रकाशित यह उपन्यास हिंदी की चौथी कृति है जिसके सौ साल होने पर चर्चा हो रही है।कोई इसे कथा डायरी बता रहा तो कोई इसे विनोद कुमार शुक्ल की दीवार में एक खिड़की रहा करती थी की तरह प्रयोगधर्मी और नवाचारी उपन्यास बता रहा है।कोई प

आंद्रे बेते नहीं रहे। हिंदी मीडिया के लिए भले ये खबर हो या ना हो या कोई छोटी मामूली सी खबर हो लेकिन एकेडमिक वर्ल्ड में आंद्रे बेते का नहीं रहना एक बहुत बड़ी खबर है और इस बात को दीपांकर गुप्ता ,वीणा दास, अभिजीत पाठक और आनंद कुमार जैसे प्रख्यात समाज शास्त्री समझ सकते हैं जो अभी सक्रिय हैं। भले ही हमारे टीवी एंकरों को न पता हो कि आंद्रे बेते , . कौन थे या यूट्यूबरो को ना पता हो आंद्रे बेते कौ

मैं वही चाणक्य हूँ जिसे आप कौटिल्य भी कहते हो और मुझे विष्णु गुप्त के नाम से भी पुकारते हो। आज मैं बिहार विधानसभा चुनाव होने से पहले राजधानी पाटलिपुत्र से अपना दुख दर्द आपके सामने बयाँ कर रहा हूं। आपको मालूम है कि बिहार में चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है और सभी राजनीतिक दलों ने टिकटों की घोषणा भी कर दी है ।इन टिकटो के बंटवारे को लेकर राजनीतिक दलों के बीच खींचतान और मतभेद भी साम