पटना में शिवपूजन सहाय की याद- ‘देहाती दुनिया’ के सौ साल

‘शिवपूजन सहाय का उपन्यास देहाती दुनिया बिहार के औपनिवेशिक गाँव का एक सामाजिक सांस्कृतिक दस्तावेज़ है’

 

पटना 11 अगस्त। आचार्य शिवपूजन सहाय के उपन्यास “देहाती दुनिया ‘ के सौ साल पूरे होने पर पटना में तीन दिवसीय समारोह में उपन्तीयास पर विस्तृत चर्चा हुई।इस दौरान इस उपन्यास को लेकर एक नया विमर्श खड़ा हो गया। 1926 में प्रकाशित यह उपन्यास हिंदी की चौथी कृति है जिसके सौ साल होने पर चर्चा हो रही है।नकोई इसे कथा डायरी बता रहा है तो कोई विनोद कुमार शुक्ल की ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ की तरह प्रयोगधर्मी और नवाचारी उपन्यास करार दे रहा है। कोई पहला आंचलिक उपन्यास कह रहा है तो कोई बिहार में किसान आंदोलन की पूर्व पीठिका। सौ सालों में इस उपन्यास को लेकर तीन तरह की व्याख्याएँ हुई हैं। एक तो शिवपूजन सहाय के जीवन काल मे, दूसरा, उनके निधन के बाद और अब तीसरी व्याख्या इसके सौ साल पूरे होने पर। पिछले दिनों दिल्ली के हिन्दू कालेज में रामेश्वर राय, अनामिका और रवींद्र त्रिपाठी तथा ज्योतिष जोशी ने नई दृष्टि से इस पर विचार किया था।
इससे पहले प्रेमचन्द की तीन कृतियों सेवासदन, प्रेमाश्रम औऱ रंगभूमि के सौ साल होने पर चर्चा हो चुकी है। शिवपूजन सहाय भी प्रेमचन्द की तरह गाँव के लेखक थे।अपने लेखन और जीवन में भी। वे लखनऊ में ‘माधुरी’ पत्रिका में प्रेमचंद के सहयोगी थे और बनारस में तो वर्षों प्रेमचन्द के साथ़ रोज का उठना बैठना था।

पटना में विधान परिषद के उपसभापति और जाने माने आलोचक रामवचन राय ने आचार्य शिवपूजन सहाय के उपन्यास “देहाती दुनिया “को ग्रामीण जीवन की “कथा डायरी “बताते हुए कहा कि मैँ आज जो कुछ हूँ ,वह शिवपूजन सहाय के आशीर्वाद की बदौलत हूँ। राय ने पटना संग्राहलय में इस उपन्यास पर संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए यह बात कही।
हिंदी के यशस्वी लेखक अज्ञेय और निर्मल वर्मा पर अपनी महत्वपूर्ण आलोचना लिखने वाले रामवचन राय ने कहा कि जिस तरह अज्ञेय ने ‘शेखर एक जीवनी’ नामक उपन्यास लिखा था पर उसे जीवनी कहा था ,उसी तरह शिवपूजन बाबू ने किसान जीवन की कथा डायरी लिखी पर उसे उपन्यास नाम दिया था। उन्होंने कहा कि देहाती दुनिया उपन्यास के प्रचलित ढांचे में नहीं लिखा गया था बल्कि उसे किसान और ग्रामीण जीवन की कथा डायरी कहना अधिक उपयुक्त होगा।

उन्होंने कहा कि जब मैँ पटना में इंटरमीडियट का छात्र था तो एक दिन रास्ते में देखा कि बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के दफ्तर का बोर्ड लगा जिस पर शिवपूजन जी का नाम लिखा था। मैं देहाती दुनिया पढ़ चुका था। उंनसे मिंलने चला गया। उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और प्रोत्साहित किया जिससे हिंदी का विद्यार्थी बना और आज मैं जो कुछ भी हूँ उनकी प्रेरणा से हूँ। उस जमाने के बड़े से बड़े लेखकों की रचनाएं उन्होंने सुधारी ही नहीं, बल्कि लिखी भी।


पटना कालेज के पूर्व प्राचार्य तरुण कुमार ने कहा कि देहाती दुनिया हिंदी का एक प्रयोगात्मक उपन्यास है। वह उपन्यास के प्रचलित शिल्प में नहीं है बल्कि भाषां कथानक शैली की दृष्टि से अलग है। जब विनोद कुमार शुक्ल का ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ उपन्यास आया तो लोगों ने कहा कि यह भी कोई उपन्यास है, लेकिन आज वह हिंदी का एक महत्वपूर्ण उपन्यास है। देहाती दुनिया के साथ भी यही हुआ।
संस्कृतिकर्मी अनीश अंकुर ने कहा कि यह उपन्यास बिहार में किसान आंदोलन की पूर्व पीठिका है। शिवपूजन जी भी स्वामी सहजानंद सरस्वती से जुड़े थे और भोजपुर किसान सभा के पदाधिकारी थे। अब स्वामी जी को लिखी उनकी चिठियाँ मिली हैं जिससे पता चलता है कि वे किस तरह जुड़े थे। स्वामी जे ने किसानों का संगठित आंदोलन 1929 में शुरू किया लेकिन उससे पहले शिवपूजन जी ने अपनी रचनाओं में किसानों की समस्या दर्ज की थी।

उन्होंने कहा कि आचार्य शिवपूजन सहाय ने आज़ादी से पूर्व बिहार के सामंती गाँव मे गरीबी, गैर बराबरी, जाति संचरना और पुलिसिया दमन का खाका खींचा था। जबकि रेणु ने आजादी के बाद के गाँव की कहानी लिखी थी।
स्त्री दर्पण और पटना संग्राहलय द्वारा आयोजित समारोह में लेखकों ने इस ऐतिहासिक उपन्यास के शताब्दी संस्करण और एक ब्रोशर का भी लोकार्पण किया। शिवपूजन सहाय की 133 वीं जयंती पर उनके गाँव मे भी एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। दस अगस्त को बक्सर के विश्वमित्र कालेज में भी एक संगोष्ठी आयोजित की गयी। कालेज ने संकल्प व्यक्त किया कि वह हर साल शिवपूजन सहाय की जयंती मनाएगा।

पटना संग्रहालय में आयोजित समारोह में उपन्यासकार संतोष चतुर्वेदी, आयाम की अध्यक्ष नीलिमा सिंह और सुनील झा ने भी इस उपन्यास की ऐतिहासिकता पर अपने भाषण में कहा कि इस कृति ने ही आंचलिक लेखन का बीज बोया था जिसे रेणु ने 1954 में ‘मैला आँचल’ में विस्तार दिया। इन दोनों उपन्यासों को मिलाकर बिहार की आंचलिक संस्कृति को समझा जा सकता है।

नीलिमा जी ने इस उपन्यास को स्त्री दृष्टि से विचार किया और कहा कि यह उपन्यास स्त्रियों पर दमन, हिंसा और यौन शोषण की भी कहानी है पर इस उपन्यास की स्त्री पात्र साहसी हैं। पुरुष तो पुलिस दमन से भाग खड़े होते हैं पर स्त्रियाँ डटी रहती हैं। आश्चर्य इस बात को लेकर है कि गांव का पुरुष समाज स्त्रियों के पक्ष में खड़ा क्यों नहीं होता जबकि उनक़ा बलात्कार भी होता  है।

शिवपूजन सहाय के प्रपौत्र सीताराम शरण और प्रपौत्री लक्ष्मी सहाय ने अतिथियों का स्वागत किया। सीताराम शरण ने बताया कि शिवपूजन सहाय के निधन के उपरांत शोक सभा में उन पर एक संस्थान बनाने का निर्णय हुआ पर आज तक नही बना। जेपी ने कर्पूरी ठाकुर को इस बाबत पत्र भी लिखा।
समारोह में देहाती दुनिया पर एक लघु फ़िल्म भी दिखाई गई। बक्सर की गोष्ठी में जितेंद्र सिंह, रवींद्र कुमार राय, मृत्युंजय सिंह और महर्षि विश्वमित्र कालेज के प्राचार्य के के सिंह ने इसे एक महत्वपूर्ण आंचलिक उपन्यास बताते हुए कहा कि शिवपूजन बाबू जमींदारों और पुलिस के अत्याचार के खिलाफ थे तथा स्त्रियों को उनक़ा हक़ दिलाने के पैरोकार थे। यह उपन्यास उस जमाने में गांव के जीवन का सांस्कृतिक सामाजिक दस्तावेज है।

पटना के समारोह का संचालन जयप्रकाश ने किया। समारोह में त्रिपुरारि शरण, परवेज अख्तर, सफदर इमाम क़ादरी, शिव दयाल, जयमंगल देव, संजय कुमार, कुंदन कुमार, मुकुल, भावना शेखर, वीणा, अमृत सुमेधा पाठक ,माला सिन्हा गुंजन कुमारी, लक्ष्मी सहाय, नीति सहाय, अतुल ब्रह्मात्मज आदि मौजूद थे।

9 अगस्त 1893 में बक्सर जिले के उनवास में जन्मे शिवपूजन सहाय राष्ट्रीय आंदोलन के यशस्वी लेखक पत्रकार और हिंदी सेवी थे तथा प्रेमचंद जयशंकर प्रसाद और निराला के सहयोगी रहे। उन्हें जे पी, दिनकर और राहुल जी के साथ मानद डीलिट मिली थी। भारत सरकार ने 1960 में उन्हे काजी नजरुल इस्लाम के साथ पद्मभूषण से सम्मानित किया था। केंद्र सरकार ने 1998 में उन पर डाक टिकट निकाला तथा तीन फिल्में फिल्म्स डिवीजन औऱ दूरदर्शन से बनवाई। उनकी किताब विभूति पर तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार ने ट्रेन का नामकरण भी किया।

 

पटना से अरविंद कुमार की रिपोर्ट

Posted Date:

August 11, 2026

12:30 pm Tags: , , ,

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