देश विदेश के अलग अलग हिस्सों में भारतीय साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े तमाम कार्यक्रम होते हैं, ढेर सारी गतिविधियां होती हैं। कई ख़बरें भी होती हैं जो हम तक नहीं पहुंच पातीं। गोष्ठियां, कार्यशालाएं होती हैं, रंगकर्म की तमाम विधाओं की झलक मिलती है और लोक संस्कृति के कई रूप दिखते हैं। नए कलाकार, नई प्रतिभाएं और संस्थाएं साहित्य-संस्कृति को समृद्ध करने की कोशिशों में लगे रहते हैं लेकिन उनकी जानकारी कम ही लोगों तक पहुंच पाती है। हमारी कोशिश है कि इस खंड में हम ऐसी ही गतिविधियों और ख़बरों को शामिल करें … चित्रों और वीडियो के साथ।


साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित साहित्य मंच कार्यक्रम में 7 मई को चार रचनाकारों ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। ये रचनाकार थे - संग्राम मिश्र (ओड़िआ), रत्नोत्तमा दास (असमिया), रीता मल्होत्रा (अंग्रेज़ी) एवं राजिंदर ब्याला (पंजाबी)। कार्यक्रम की अध्यक्षता संग्राम मिश्र ने की। सर्वप्रथम रत्नोत्तमा दास ने अपनी असमिया कहानी ‘रई जावा घड़ी’ के अंग्रेज़ी अनुवाद ‘द वाच ऑन हर रिस्ट’ का पाठ किया, जो
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राष्ट्रीय नाटक विद्यालय के पूर्व निदेशक के देवेंद्र राज अंकुर ने कहा है कि अभिनेताओं को रंगमंच तभी करना चाहिए जब उन्हें "आत्मिक संतोष" मिले और निर्देशकों को नाटक करते समय कलाकारों को अत्यधिक स्वतंत्रता देनी चाहिए। श्री अंकुर ने कथा रंग समारोह के समापन के दौरान यह बात कही। उन्होंने कहा कि वह बीस बाइस देशों की यात्रा कर चुके हैं और पाया है कि विदेशों में भी निर्देशक अभिनेताओं को
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युवा कवि संध्या निवेदिता को 27 अप्रैल को यहां 18 वें शीला सिद्धांतकर सम्मान से सम्मानित किया गया। इलाहाबाद की संध्या निवेदिता इन दिनों दिल्ली में लेखा परीक्षा विभाग में कार्य कर रही हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। सुश्री निवेदिता को उनके कविता संग्रह” सुनो जोगी एवं अन्य कविताओं “ के लिए यह सम्मान दिया गया है। सम्मान के तहत उन्हें 21 हज़ार रु
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हिंदी रंगमंच में आजकल बहुत कम ऐसे नाटक देखने को मिलते हैं जिनकी प्रस्तुति पूरी तरह से हर पैमाने पर खरी उतरे और उसमें एक कसाव हो। किसी नाटक का सफल होना केवल निर्देशक पर निर्भर नहीं करता बल्कि अभिनेता और नाटक के चुस्त संवादो पर भी निर्भर करता है। कहानी के रंगमंच के 50 वर्ष पूरे होने के मौके पर “ मेलो रंग” की ओर से प्रस्तुत विजय पंडित का “जोगिया राग “ एक ऐसा ही नाटक है जो अपनी प्रस्तुत
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आपको पता होगा कि सरकार ने डाटा पर्सनल प्रोटेक्शन एक्ट बनाया है और जल्दी ही उस एक्ट के नियम लागू होने वाले हैं। अगर यह नियम लागू हो गए तो इससे पत्रकारों की आजादी पूरी तरह छिन जाएगी और उनके लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा। 21 अप्रैल की शाम प्रेस क्लब में इस गंभीर मुद्दे पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें सूचना के अधिकार की प्रसिद्ध कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज समेत कई कार्यकर्ताओं, वकी
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प्रसिद्ध समाजवादी एवं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाज विज्ञान के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर आनंद कुमार को सिटीजंस फॉर डेमोक्रेसी का नया अध्यक्ष बनाया गया है जबकि नया महासचिव दिल्ली विश्विद्यालय के सत्यवती कालेज में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर शशि शेखर सिंह को बनाया गया है। गांधी शांति प्रतिष्ठान में गत दिनों सी एफ डी की स्वर्ण जयंती पर आयोजित दो दिवसीय समारोह में डॉक्टर कु
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आज से करीब 50 साल पहले जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में नागरिक समाज की एक संस्था “ सिटीजंस फॉर डेमोक्रेसी” की स्थापना की थी क्योंकि तब उन्हें लोकतंत्र को बचाना था और लोकतंत्र को बचाने के लिए ही उन्होंने आपातकाल का विरोध किया था। उसी गांधी शांति प्रतिष्ठान से वे गिरफ्तार भी हुए थे। देश मे एमर्जेसी लगी लेकिन जे पी ने इंदिरा गांधी की तानाशाही का खुल कर विरोध करत
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क्या आप सुंदरी के श्रीधरणी को जानते हैं ? शायद नहीं जानते होंगे लेकिन जब आप दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम में कभी गए होंगे तो आपने यह जरूर सोचा होगा कि यह सुंदर कला परिसर किसने बनाया है जो देश की राजधानी का सबसे प्रतिष्ठित कला परिसर है। हां, हम बात कर रहे हैं सुंदरी के श्रीधरणी आर्ट गैलरी की जिनका यह शताब्दी वर्ष है। 7 अप्रैल 1925 को हैदराबाद (सिंध प्रांत )में जन्मी सुंदरी जी एक नृत्यांग
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कवि कई दिनों से अत्यंत प्रफुल्लित है। दिल बाग-बाग है। प्रसन्नता इतनी कि कवि हृदय बार-बार छलकने को आतुर हो जाता है। कवि जब अत्यधिक खुश होता है तो कविता नहीं लिख पाता। कविता उसे सूझती ही नहीं। वह लिखने की कोशिश अवश्य करता है लेकिन शब्द ही धोखा दे जाते हैं। वह गीत गाने का भी प्रयास करता है पर बोल ही नहीं उचरते। खुशी में कवि मधुर सुर छेड़ना चाहता है लेकिन उसके होंठ नहीं फड़कते। हां, पैर जर
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